मेरी पहली रचना - मुंशी प्रेमचंद ( मुंशी प्रेमचंद की कहानी का फलकीकरण का प्रयास )
१३ वर्ष कि उम्र और उर्दू के उपन्यास पढने का शौक | तमाम लेखकों की रचनाये मैंने पढ़ डाली थी और फिर बुद्धिलाल बुकसेलर की दुकान पर जाता रहता था ताकि और भी उपन्यास पढ़ सकूँ | इनका स्टॉक ख़तम होने के बाद पुराणों के उर्दू अनुवाद भी पढ़े और "तिलस्मी होशरुबा" के कई भाग भी |
हमारे रिस्ते के एक मामू थे जिनकी शादी किसी वजह से नहीं हुई थी , और वो सभी रिस्तेदारो के यहाँ इस उम्मीद से की कोई तो शादी करा देगा , घूमा करते थे | अंत में एक निचली जाति की लड़की के मोहब्बत में गिरफ्तार हो गए | होली पर उसे काफी महंगी साडी और ढेर सारा नेग दिया और धीरे धीरे उसने मामू को इश्क़ में निकम्मा बना दिया | लेकिन बात फैलने लगी और उसकी जात वालो ने तय किया कि मामू को रंगे हाथ पकड़ा जाये | एक दिन जब मामू ने उसको घर के अंदर बंद किया था तभी लोगों ने घर को घेर कर किवाड़ पीटना शुरू कर दिया | लड़की ने भी कोसना शुरू कर दिया और मामू की तो सिट्टी-पिट्टी ग़ुम | दरवाजा तोड़ कर जिसको जो मिला उसी से उसने मामू की जम के कुटम्मस की | बेहोश मामू को छोड़ कर सब चले गए और पट्टीदार खुश कि मामू तो अब यहाँ मुह नहीं दिखाएंगे और उनको मामू की ज़मीन मिल जायेगी |
इस घटना की खबर मुझे भी मिल गयी थी | मामू ठीक होते ही हमारे यहाँ आ गए और मुझे पढ़ने के लिए डाँटने लगे | लेकिन अब मुझसे ये कहाँ बर्दास्त होता और मैंने वो सारी घटना नाटक के रूप में लिखी और उसे मामू के बिस्तर पर रख के स्कूल चला गया | शाम को घबराते हुए घर आया की पता नहीं क्या हो लेकिन मामू जरुरी काम का बहाना बना कर गायब हो गए थे |
विनय
१३ वर्ष कि उम्र और उर्दू के उपन्यास पढने का शौक | तमाम लेखकों की रचनाये मैंने पढ़ डाली थी और फिर बुद्धिलाल बुकसेलर की दुकान पर जाता रहता था ताकि और भी उपन्यास पढ़ सकूँ | इनका स्टॉक ख़तम होने के बाद पुराणों के उर्दू अनुवाद भी पढ़े और "तिलस्मी होशरुबा" के कई भाग भी |
हमारे रिस्ते के एक मामू थे जिनकी शादी किसी वजह से नहीं हुई थी , और वो सभी रिस्तेदारो के यहाँ इस उम्मीद से की कोई तो शादी करा देगा , घूमा करते थे | अंत में एक निचली जाति की लड़की के मोहब्बत में गिरफ्तार हो गए | होली पर उसे काफी महंगी साडी और ढेर सारा नेग दिया और धीरे धीरे उसने मामू को इश्क़ में निकम्मा बना दिया | लेकिन बात फैलने लगी और उसकी जात वालो ने तय किया कि मामू को रंगे हाथ पकड़ा जाये | एक दिन जब मामू ने उसको घर के अंदर बंद किया था तभी लोगों ने घर को घेर कर किवाड़ पीटना शुरू कर दिया | लड़की ने भी कोसना शुरू कर दिया और मामू की तो सिट्टी-पिट्टी ग़ुम | दरवाजा तोड़ कर जिसको जो मिला उसी से उसने मामू की जम के कुटम्मस की | बेहोश मामू को छोड़ कर सब चले गए और पट्टीदार खुश कि मामू तो अब यहाँ मुह नहीं दिखाएंगे और उनको मामू की ज़मीन मिल जायेगी |
इस घटना की खबर मुझे भी मिल गयी थी | मामू ठीक होते ही हमारे यहाँ आ गए और मुझे पढ़ने के लिए डाँटने लगे | लेकिन अब मुझसे ये कहाँ बर्दास्त होता और मैंने वो सारी घटना नाटक के रूप में लिखी और उसे मामू के बिस्तर पर रख के स्कूल चला गया | शाम को घबराते हुए घर आया की पता नहीं क्या हो लेकिन मामू जरुरी काम का बहाना बना कर गायब हो गए थे |
विनय
No comments:
Post a Comment