समय
सतीश ने एक बार फिर पलट कर देखा . वह राजेश ही था . सतीश के दिमाग में कुछ समय पहले की बात घूमने लगी . शायद सितम्बर का महीना था . सतीश शाम को नास्ता करने के लिए एक होटल में गया था . बिल देने के लिए जैसे ही काउंटर पर पंहुचा , काउंटर क्लर्क ने कहा की आपका बिल पे हो गया है . सतीश आस्चर्य से देखने लगा कि कौन है जिसने उसका बिल पे किया है तो पता चला कि वो आदमी राजेश है . राजेश उसके घर के पास ही रहता था और कभी कभी उसके ऑफिस में कुछ लोगो को लेकर आता था जिनका काम उसके टेबल से हो सकता था . सतीश ने पूछा कि क्यों उसने पेमेंट किया है तो उत्तर मिला कि एक ही बात है सर . बहुत कहने के बाद भी बिल वह नहीं दे पाया था .
आज राजेश सामने होते हुए भी नहीं पहचान पाने का अभिनय कर रहा था . सतीश को लगने लगा कि रिटायरमेंट ने जैसे उसका वजूद ही मिटा दिया हो .
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