हमारे गांव के कल्लू भइया बसनी सरकारी हास्पिटल में नौकरी करने रोज कोरौत घाट से वरुणा नदी पार करके जाते थे । इमरजेंसी का समय था, नसबंदी का कैम्प अक्सर हास्पिटल में लगा करता था और घर लौटते समय अक्सर रात हो जाती थी । एक बार जाड़े में घाट पर पहुचते पहुचते काफी देर हो गई और नाव वाला नहीं था, काफी आवाज लगाई लेकिन नदी उस पार जिधर नाव बंधी थी वहा से कोई आवाज नही आई । अब विकल्प था कि २० किमी का चक्कर लगा कर कैंट होकर गांव आये या थोड़ी हिम्मत करके नदी पार करके 10 मिनट में घर पहुंचे । दिन भर का थका हारा शरीर मन को दूसरे विकल्प के लिये तैयार किया । बदन के कपड़े उतार कर साईकिल के हैंडिल में बांधा, साईकिल को कंधे पर लटकाया और दोनों जूते हाथ में लेकर नदी के किनारें पानी में दूसरा कदम डाला ही था कि गड़ाप से पोरसा भर नीचे चले गये । साईकिल कही छटक गई और जूते भी हाथों में नहीं थे । अब जान बचाने का संघर्ष था लेकिन सतह पर आने पर थोड़ी दूर पर पानी की लहरों पर कोई चीज तैरती दिखाई दी, लगा जैसे जूता तैर रहा है । मन में लालच आ गया , सोचा जूता ही बचा लें, कुछ ही दिन पहले बड़े शौक से तमाम जरूरतों को दरकिनार कर लहुराबीर से खरीदा था । तैर कर पास पहुचे तो देखा कुत्ते का शव लहरों में ऊपर नीचे हो रहा था, रोंगटे खड़े हो गये सारा मोह ख़त्म हो चुका था । किसी तरह तैर कर उस पार पहुँचे और जाड़े की ठिठुरती रात में भींगे और नंगे बदन कोरौत बाजार के अपने मित्र श्री दिनेश्वर लाल का दरवाजा खटखटाया । अर्धनिद्रा में दिनेश्वर जी लालटेन की रोशनी में उनको देखकर घबड़ा गये तुरंत अपना शाल और साईकिल दिए घर जाने के लिए ।
(True story taken from Facebook- Sabhar - Mr Santosh Kumar )
नाव
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