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Monday, June 29, 2015

वज़ह-

" अरे यार , तलाक़ क्यूँ नहीं दे देते उसको । इतनी परेशानियाँ झेल कर भी निभाए जा रहे हो "।
वो सोच में डूब गया , सच ही तो कह रहा है ये ।
" कहीं तुम समाज के चलते तो नहीं हिचक़ रहे , ये समाज भी कहीं किसी का भला करता है "।
अचानक उसके आँखों सामने बेटी का चेहरा आ गया ।
" खैर , समाज का तो ठीक कहा तुमने , लेकिन जब तुम भी बेटी के पिता बनोगे तो समझ जाओगे "।  

Sunday, June 28, 2015

ग़ज़ल--

जिंदगी कैसे कहें , तेरे सवाल कितने हैं
आओ फिर से देखें , बाक़ी मलाल कितने हैं
गुज़र तो रही थी , अपनी ये पुरसुकूँ शामें
लगता है यूँ अब , सचमें बवाल कितने हैं
जब भी कहा , बस ग़लत ही कहा हमसे
सच के इन दिनों , आते ख़याल कितने हैं
आईना भी अब तो , मुँह झट से मोड़ लेता है
दिखता अब उसको , सच्चे ज़लाल कितने हैं !!


अमर प्रेम --

" अरे कहाँ हो स्वीट हार्ट , फ़ोन भी नहीं उठा रही आजकल "।
" कौन ? सॉरी , मेरे फोन के कॉन्टेक्ट्स डिलीट हो गए हैं "।
अभी वो कुछ और कहता कि उसको सुनाई पड़ा " दुनियाँ कहीं भी पहुँच जाये , ये लड़के नहीं सुधरने वाले । दूसरे की कार लेकर डेट पर ले जाते हैं और सोचते हैं कि हमें पता नहीं चलेगा , इनका तो !
आगे के शब्द वो नहीं सुन पाया , मोबाइल हाँथ से छूट गया ।

हौसले--

पूरी क्लास में सन्नाटा छा गया , किसी ने ये उम्मीद नहीं की थी कि वनिता ऐसा चित्र बनाएगी । कला की कक्षा में सभी छात्रों को उनके सपने को चित्र में उतार कर लाने के लिए कहा गया था और सबने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी उसे साकार करने की । 
पर बैसाखी के सहारे चलने वाली लड़की आसमान छूने की ख़्वाहिश रखती है , किसी ने ख्वाबों में भी नहीं सोचा था ।

Thursday, June 25, 2015

ग़ज़ल--

चुने लाख हों पत्थर , नहीं देखे जाते
राह में अँधेरे हों गर , नहीं देखे जाते
जलाया रातों में हमने ,बस एक दिया
चरागाँ बुझे हों अगर , नहीं देखे जाते
खाक हो जायेंगे हम , आ के सम्भालो हमको
इश्क़ में रहज़न-ओ-रहबर नहीं देखे जाते
बड़ी मुद्दत से जिनको देखा किया था हमने
उनके बदले हुए तेवर , नहीं देखे जाते
कभी होता था सभी ओर जहाँ चैनों सुकूँ
वहीँ जलते हुए मंजर , नहीं देखे जाते
इश्क़ में जिनके रहे थे , सभी ताउम्र फ़ना
उन्हीं पहलू में अब खंजर , नहीं देखे जाते !!

अखंडित ( लघुकथा )

" आज कैसे याद किया , कोई काम था क्या ?
" नहीं यार , बस यूँ ही तुम्हारी याद आई और चला आया "|
कुछ देर बात चीत चलती रही और फिर वो उठ कर चल दिया | घर पहुँचते ही पत्नी ने पूछा " बात की उनसे , क्या कहा उन्होंने !
" हाँ , कहा तो हैं , देखो क्या होता हैं "|
" जब झूठ बोल नहीं सकते तो क्यों कोशिश करते हो | उनका फोन आया था , कह रहे थे जरूर कोई बात थी लेकिन मुझे बताया नहीं | अभी भी अपने उसूलों का पक्का हैं "|
" देखो तुम्हारे इतना कहने पर मैं चला तो गया था लेकिन कहते नहीं बना | खैर कहीं न कहीं मिल ही जाएगी उसको नौकरी "|
" हाँ , कुछ न कुछ तो कर ही लेगा बेटा , लेकिन तुम्हारे उसूलों की कीमत पर नहीं " और उसने उनका हाँथ अपने हांथों में कस कर थाम लिया | उनके चेहरे पर गहरे सुकून का भाव छा गया ये सोचकर कि उनके उसूल अभी भी अक्षुण्ण थे | 

अंतिम संस्कार--

पिता की अचानक हुई मौत से वो टूट गया । एकदम ठीक ठाक थे , बस हल्का सा बुखार हुआ और दो दिन में चल बसे । आर्थिक स्थिति तो बदतर थी ही ,पहले माँ और अब पिताजी भी , एकदम से बड़ा हो गया वो । पुरे गाँव में ख़बर हो गयी थी और सब रिश्तेदारों को भी फोन कर दिया गया । चाचा , जो अलग रहते थे घर पर आ गए थे और अंतिम क्रिया की तैयारियों में लग गए थे ।
अंतिम संस्कार करके वापस चलते समय मौजूद सभी लोगों को रिवाज़ के अनुसार भरपेट नाश्ता कराकर वो भी चाचा के साथ ट्रैक्टर पर गाँव चल पड़ा । घर पहुँच कर चाचा ने उसको सारे खर्च का हिसाब दिया तो वो सर पकड़ कर बैठ गया । अभी तो अगले तेरह दिन तमाम कर्मकांड होने थे और उसके बाद ब्राह्मणभोज जिसमें पूरा गाँव और रिश्तेदारों को खिलाना था ।
शायद इन कर्मकाण्डों में उसके सर से माँ , बाप के बाद खेतों का साया भी उठ जाये, अब वो पूरी तरह से अनाथ हो गया था ।

Tuesday, June 23, 2015

एक्सपायरी--

" साहब , ई सब खाने वाला समान को जलवा देंगे आपलोग ", गोदाम में रखते हुए जोखन ने पूछा |
" हाँ , इनकी एक्सपायरी हो गयी है और ये नुक़्सान पहुँचा सकते हैं लोगों को , इसलिए इनको जलाना पड़ेगा "|
" हमको दे दो साहब , जब भूख प्यास हम लोगों का कुछ नहीं बिगाड़ पाती है तो ये क्या नुक़्सान करेगा | बच्चे दुआ देंगे आपको "|
एक बार उसने जोखन की आँखों में देखा और रजिस्टर में सामान जलाये जाने की इंट्री कर दी |
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" साहब , ई सब खाने वाला समान को जलवा देंगे आपलोग ", गोदाम में रखते हुए जोखन ने पूछा |
" हाँ , इनकी एक्सपायरी हो गयी है और ये नुक़्सान पहुँचा सकते हैं लोगों को , इसलिए इनको जलाना पड़ेगा "|
" हमको दे दो साहब , जब भूख प्यास हम लोगों का कुछ नहीं बिगाड़ पाती है तो ये क्या नुक़्सान करेगा | बच्चे दुआ देंगे आपको "|
 एक बार उसने जोखन की आँखों में देखा , फिर मन में सोचा " मैं चांस नहीं ले सकता | कुछ हो गया तो ?
 थोड़ी देर में सारा सामान जल रहा था और जोखन की आँखों में कुछ देर पहले जले उम्मीदों के दिए बुझ गए थे |

Monday, June 22, 2015

समझौते--

" सॉरी सर , आज फिर लेट हूँ , कल से पूरी कोशिश करुँगी समय से आने की ", कहते हुए भाग कर वो अपनी केबिन में बैठ गयी |
" क्या बात है , उदास लग रही हो | सब खैरियत तो है न ?, लंच में उसकी कलीग रीना ने पूछा तो उसने गहरी साँस ली |
" यार मेरा प्रमोशन तो हो गया पर पतिदेव का नहीं हुआ | अब रोज़ सुबह घर के किसी भी काम में मदद करना तो दूर , उलटे परेशानी जरूर खड़ी करते हैं | समझती सब हूँ लेकिन कहती नहीं , सज़ा तो मुझे ही भुगतनी है उससे आगे निकल जाने की "|  

कवच--

लक्ष्मी ने उसके सर पर प्यार से हाँथ फेरा और फिर गोद में मुन्नी को लेकर निकल गयी , वो उसे जाते हुए देखता रहा | उसे याद आया " चिंता क्यूँ करते हो मुन्नी के बापू , तुम्हारी निगाह का सुरक्षा कवच है न , कुछ नहीं होगा हमको "|
कितना गबरू जवान था वो और शादी भी इतनी सुन्दर लक्ष्मी से हो गयी | पुरे गाँव में सब उसके भाग्य से जल गया था , लेकिन उसको सुखी रखने के लिए गाँव में कहाँ कुछ था | खेतों पर खुद तो काम कर लेता था लेकिन लक्ष्मी जाये , ये बर्दाश्त नहीं होता था उससे | मालिकों की भूखी निगाहें उसने देखी थी काम करने वाली और महिलाओं पर | पहले तो खुद ही जाना पड़ता था काम की तलाश में लेकिन अब तो कोई न कोई आ ही जाता था बुलाने | फिर वो शहर आ गया रिक्शा चलाने, अपने चचेरे भाई के साथ | रहने का इंतज़ाम भी उसी के टपरी के पास हो गया और दिन भर में अच्छी आमदनी भी हो जाती थी | जिंदगी सुकून से बीत रही थी , लक्ष्मी को किसी के यहाँ काम करने नहीं जाना पड़ता था और साल भर के अंदर मुन्नी भी पैदा हो गयी | अब घर भर गया उसका और रात में मुन्नी के साथ खेलने के चलते लौट के आने की जल्दी भी रहने लगी |
लेकिन एक दिन गाड़ी ने टक्कर मार दी और वो अपाहिज हो बिस्तर पर पड़ गया | लक्ष्मी , जिसको उसने कभी बाहर काम नहीं करने दिया , अब घर सँभालने के लिए बाहर निकल गयी | वो बहुत परेशान रहने लगा था और उसकी बेचैनी लक्ष्मी से ज्यादा दिन छुप नहीं पायी | एक दिन उसने प्यार से समझाया " कितनी सारी औरतें शहरों में काम पे जाती हैं तो मेरे जाने में क्या दिक्कत है | जब तुम स्वस्थ थे तो तुमने हमें खिलाया, आज मेरी बारी है सबका ध्यान रखने की | किसी के देखने से क्या फ़र्क़ पड़ जायेगा , किसी भी बुरी नज़र से मुझे तुम अपने निगाहों के कवच से बचा लोगे "|

Saturday, June 20, 2015

अफ़वाह-

" सर , बिलकुल वही हो रहा है जैसा आपने कहा था | लोग पागलों की तरह आगजनी और लूट पाट में लगे हैं "|
" मैंने कहा था ना , और तुम कहते थे कि लोग अब पढ़े लिखे और इंटेलेक्चुअल हो गए हैं "|
" मान गए सर , बस अफ़वाह फैलाओ और इंसान भीड़ बन हैवानियत पर उतर जाता है | अब अपनी जीत पक्की "|

Wednesday, June 17, 2015

खिलौने ( लघुकथा )

" आज के बाद ये सब खेल मत खेलना " और उसने सारे गुड्डे , गुड़िया को उठा कर फेंक दिया । बेटी सहम गयी , कुछ ही महीने पहले मम्मी ने ही इतने प्यार से ख़रीदे थे उसके लिए !
अगले दिन वो खिलौनों में बाइक्स और कार के अलावा कुछ गन भी ले आई थी और तलाक़ के नोटिस का ज़वाब भिजवा दिया था ।

Tuesday, June 16, 2015

शवदाह--

पिता की अचानक हुई मौत से वो टूट गया । एकदम ठीक ठाक थे , बस हल्का सा बुखार हुआ और दो दिन में चल बसे । आर्थिक स्थिति तो बदतर थी ही ,पहले माँ और अब पिताजी भी , एकदम से बड़ा हो गया वो । पुरे गाँव में ख़बर हो गयी थी और सब रिश्तेदारों को भी फोन कर दिया गया । चाचा , जो अलग रहते थे और पिताजी से काफी छोटे थे , घर पर आ गए थे और अंतिम क्रिया की तैयारियों में लग गए थे । चूँकि शाम का समय हो गया तो सबने राय दी कि दाह संस्कार के लिए कल ले जाना ठीक रहेगा क्योंकि रात में रिश्तेदार भी आ जायेंगे । तबियत ज्यादा ख़राब रही होती तो शायद बहुत से रिश्तेदार आये भी होते देखने लेकिन एकदम से चले गए तो कोई देख भी नहीं पाया आखिरी वक़्त में ।
सुबह के चार बजते बजते बुआ और बहन भी आ गयीं , रोना पीटना फिर शुरू हो गया । अब घाट पर चलने की तैयारी शुरू हो गयी , शव को ट्रैक्टर पर रखा गया और कुछ लोग अपनी मोटरसाइकिल और साइकिल से ट्रैक्टर के साथ साथ चल पड़े । उसके गाँव के लोगों का अंतिम संस्कार एक पूर्व निश्चित घाट पर ही होता था और घाट गाँव से क़रीब २० किमी दूर था । पहले के ज़माने में तो लोग पैदल ही शव को कंधे पर उठाये घाट पहुँच जाते थे लेकिन अब तो साधन उपलब्ध थे इसलिए आसानी हो जाती थी । धीरे धीरे लोग शवयात्रा में जुड़ते गए और कुछ रिश्तेदार तो सीधे ही घाट पहुँच गए थे । लगभग ११ बजे ट्रैक्टर और बाक़ी वाहन घाट पर पहुंचे और शव को उतार कर गंगाजी में स्नान के लिए ले जाने लगे । रास्ते में विद्युत शवदाहगृह मौजूद था लेकिन किसी ने भी उसके लिए नहीं सोचा , पुरानी परम्पराएँ भला इतनी आसानी से कहाँ छूटती हैं | एक बोर्ड भी लगा हुआ था कि मृत्यु का पंजीकरण कराना अनिवार्य है लेकिन वो भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा था ।
घाट पर पहुँचते ही कुछ पंडो ने भी घेरा लेकिन गाँव के बुज़ुर्गों ने उन्हें समझा दिया कि गाँव में पण्डे हैं सब करने के लिए । शव को गंगाजी में डुबकी लगाकर किनारे रख दिया गया और इस बीच चाचा लकड़ियों के इंतज़ाम के लिए चले । जैसे ही चाचा लकड़ी की टाल की ओर बढे , कई दुकानदारों ने उनको घेर लिया । लकड़ियों के बारे में वे इस तरह से बता रहे थे जैसे वो जलाने के लिए नहीं बल्कि किसी की शादी में बेड बनाने के लिए उपयोग की जाने वाली हो । खैर एक लकड़ी वाले से बात तंय हुई और उसने शव के वज़न के हिसाब से कितनी लकड़ी लगेगी बताया । गाँव के कुछ बुज़ुर्ग , जिनको इन सब का अनुभव था , उन्होंने थोड़ा कम करवाया और फिर कुछ लोगों ने लकड़ियों को तौलवाना शुरू किया । अधिकांश लकड़ियाँ या तो गीली थीं या हरी , बड़ी मुश्किल से कुछ सूखी लकड़ियाँ मिलीं । साथ ही साथ चन्दन की लकड़ी के कुछ टुकड़े भी ले लिए गए । एक बोर्ड वहाँ पर भी लगा हुआ था जिसपर लकड़ी का मूल्य अंकित था लेकिन वो भी अपना मूल्य खो चुका था । शवदाह से सम्बंधित बाक़ी सब सामान भी ले लिया गया और घाट पर मौजूद नाई ने उसके सर के बाल मूड़ दिए । अब आग लेने के लिए वो चाचा के साथ चल पड़ा । आग देने के लिए भी डोमराज ने बड़ा सा मुँह खोला , पहले ५००० की मांग की फिर किसी तरह उनको ५०० में तैयार किया गया ।
अगले तीन घंटे में दाह संस्कार निपट गया , डोमराज ने चिता में से बची हुई अस्थियाँ निकाल कर दे दीं और उनको उसने गंगाजी में प्रवाहित कर दिया । घाट पर उपस्थित सभी लोगों ने एक बार नदी के मटमैले पानी में डुबकी लगायी और फिर सब वापस चलने की तैयारी करने लगे । उधर गाँव के बुज़ुर्ग चाचा के साथ बहस में लगे हुए थे कि किस मिठाई की दुकान पर जलपान किया जायेगा । बात बड़ी बड़ी दुकानों से होते हुए रास्ते में पड़ने वाली एक दुकान पर तंय हुई और सबको बता दिया गया कि वहाँ पहुँच जाएँ । थोड़ी देर में सब वहां इकठ्ठा हुए और फिर लोगों ने जम कर नास्ता किया । शायद अगर वो अपना घुटा सर लेकर वहां नहीं होता तो लोग अन्दाज़ा भी नहीं लगा पाते कि ये लोग शवदाह करके नाश्ता कर रहे हैं ।
नाश्ता करके सब लोग अपने अपने वाहन से निकल पड़े , वो भी चाचा के साथ ट्रैक्टर पर गाँव चल पड़ा । घर में मौजूद लोगों के लिए भी नाश्ता ले लिया गया था , क्योंकि फिलहाल तो घर पर चूल्हा नहीं जलना था । घर पहुँच कर चाचा ने उसको सारे खर्च का ब्यौरा दिया और वो धम्म से सर पकड़ कर बैठ गया । अभी तो अगले तेरह दिन तमाम कर्मकांड होने थे और उसके बाद ब्राह्मणभोज जिसमें पूरा गाँव और रिश्तेदारों को खिलाना था । उसे लगने लगा जैसे उसके बचे हुए थोड़े से खेत भी पिताजी के साथ गुज़र गए हों और वो बिलकुल बेआसरा हो गया है ।    

Sunday, June 14, 2015

अंतर्द्वंद--

" दिमाग ख़राब हो गया है इस लड़की का ", मम्मी बुरी तरह परेशान थीं । इतना अच्छा घर और वर था फिर भी मना कर दिया । अपने आप को कोस रही थीं कि क्यों सब बता दिया उसको ।
" आपको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता , इतने अस्पृह कैसे रह सकते हैं आप लोग "।
" अरे , घर में कौन काम करता है , इसमें तुम्हे क्या दिक़्क़त है "।
" माँ , जो इंसान अपने घर में एक बच्चे के काम करने पर इतना संवेदनहीन हो सकता है , वो मेरे प्रति संवेदनशील रह पायेगा "?

एक और अनुभव--

जोहानसबर्ग निवास के दौरान बहुत तरह के अनुभव हुए हैं और एक ऐसा अनुभव भी मिला , जो शायद कोई नहीं लेना चाहता , मैं भी नहीं चाहता था । २८ मई को हमेशा की तरह बैंक जा रहा था , रास्ते में ट्रैफिक थोड़ा ज्यादा था और कार की गति काम थी । अचानक सामने वाली कार ने ब्रेक लगाया और उसकी वज़ह से मैंने भी ब्रेक लगा दिया । मेरे पीछे वाला , जो शायद कुछ सोच रहा था या किसी और वज़ह से , ब्रेक नहीं लगा पाया । वैसे उसने अपनी कार को किनारे मोड़ने की कोशिश की थी लेकिन फिर भी दुर्घटना घट गयी । उसकी कार ने पीछे से टक्कर मार दी और मैं घबरा कर नीचे उतरा । कार का पीछे का बम्पर टूट गया था , लेकिन गति के काम होने की वजह से हम दोनों को ही कोई चोट नहीं आई । पिछली कार वाला भी तुरंत निकला और मुझसे आकर क्षमा माँगने लगा । खैर मैंने उसे कहा कि कोई बात नहीं , ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है । मुश्किल से ५ मिनट बीते होंगे कि पुलिस की कार भी आ गयी । उन्होंने पूछा कि कोई चोट वगैरह तो नहीं लगी और हमारे नहीं कहने पर वो निकट के पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करने की सलाह देकर चले गए । इस बीच में कुछ और गाड़ियाँ भी आ गयीं तो कि किसी भी दुर्घटना के होने पर तुरंत पहुँच जाती हैं । उनके बताने पर हमने बीमा कंपनी को तुरंत सूचित किया और एक दूसरे का डिटेल जैसे कार का न., लाइसेंस , बीमा इत्यादि का आदान प्रदान किया । इसी बीच बीमा कंपनी ने हमारी गाड़ी को ले जाने का इंतज़ाम किया और फिर मैं पुलिस स्टेशन रिपोर्ट लिखाने चल दिया । बिना किसी दिक्कत के बड़े अदब से पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट लिखी गयी और उन्होंने मुझे एक एक्नालेग्मेंट भी दिया जिसपर दिया गया नंबर बीमा कंपनी को बताना था ।
कभी कभी बहुत कायदे कानून भी परेशानी का सबब बन जाते हैं , अब मुझे उसका नमूना दिखाई पड़ने लगा । मैंने बीमा कंपनी को फोन करके बताया कि रिपोर्ट लिखवा दी गयी है और उसका न. भी दे दिया । उन्होंने बड़ी प्रसन्नता से कहा की आपकी कार को हमने मरम्मत के लिए भेज दिया है , अब मरम्मत वाली कंपनी उसको देख कर कितना खर्च आएगा , इसका एस्टीमेट देगी और इसमें चार वर्किंग डेज लगेंगे । खैर पांचवें दिन मेरे पास फोन आया कि ( ईमेल तो आता ही रहता है ) एस्टीमेट अप्प्रोवे हो गया है , आप अपना पासपोर्ट और लाइसेंस की कॉपी भेज दीजिये । मैंने तुरंत भेज दिया , फिर उनका मेल आया की कार को मरम्मत के लिए भेज दिया गया है और उसकी प्रगति से आपको अवगत करते रहेंगे । मैंने पूछा कि लगभग कितने दिन लग जायेंगे इसमें तो उनका जवाब था लगभग १५ वर्किंग डेज । आज लगभग १५ दिन हो गए हैं , दो दिन पहले फोन और मेल दोनों आया था कि पार्ट्स बदल दिए गए हैं , अब कार पैनल बीटर के पास है , इसके बाद पेंट होगा , फिर एक बार और पूरी तरह वो चेक करेंगे और फिर कहीं जाकर मेरी कार मेरे पास आएगी ।
वैसे जितना नुकसान हुआ था कार में , शायद मैं हिन्दुस्तान में होता तो ये सब तीन दिन में हो गया होता और मुझे अपनी कार मिल भी गयी होती । लेकिन इस विकसित देश में अभी और कितना समय लगेगा , पता नहीं । फिलहाल तो घूमना फिरना सब बंद है और आराम चल रहा है । 

एक प्रयास ( ग़ज़ल )

एक प्रयास ( ग़ज़ल )
वो पत्थर था , बहुत थे फेंकने वाले
बन गए हीरे पर , उसे तराशने वाले

कब समझा है कोई वक़्त का इशारा
बन गए हैं ख़ुदा , उसे समझने वाले

ख्वाहिशें तो रखते है ज़माने में सब
और ही होते हैं ,उन्हें पूरा करने वाले

ग़ुम है बदगुमानी में ,ये सारी दुनिया
मिलते हैं कहाँ ,अब सच लिखने वाले

तलाश थी सिर्फ , एक फूल की विनय
हज़ार मिले राह में,  कांटे रखने वाले !!

Saturday, June 13, 2015

बदगुमानी ( लघुकथा )

" बहुत गुमान था तुमको सृजन पर , देखो मेरी ताक़त ", विनाश इतरा रहा था । पूरा इलाका तबाह हो गया था , दूर दूर तक कहीं जीवन का कोई नामोनिशान नज़र नहीं आ रहा था । 
लेकिन सृष्टि अभी भी मुस्कुरा रही थी " तुमने शायद पीछे मुड़ कर नहीं देखा "। 
विनाश ने पलट कर देखा , उसका दर्प चूर चूर हो गया । 
एक नन्हीं सी कोंपल सृजन की विजय पताका फहरा रही थी , जीवन पुनः जीत गया था ।

Thursday, June 11, 2015

नैतिक शिक्षा--

" मम्मी , आज तो बहुत आसान टास्क मिला था मुझे स्कूल में ", मन्नू बोला ।
" अच्छा , क्या था , जरा मैं भी सुनूँ "।
 मन्नू ने चहकते हुए कहा " घर की सबसे यूज़फुल और सबसे यूज़लेस चीज़ लिखना था "।
" सबसे यूज़फुल तो आप ही हो मम्मी "|
" और सबसे यूज़लेस चीज़ तो आपने कितनी बार बताया है ", दरवाजे पर स्तब्ध खड़े दादाजी अपनी उपयोगिता समझ गए थे ।

बचपन के दिन ( बाल गीत )

आखिर क्यूँ हम इतने बड़े हो गए
बचपन के दिन जाने कहाँ खो गए
वो खेलना जम के आइस पाईस
गुल्ली डंडा और लट्टू की ख़्वाहिश  
दोपहर में लगती लूडो की बाज़ी
खूब खेलते थे हम चोर सिपाही
खेलते खेलते , हम वहीँ सो गए
बचपन के दिन जाने कहाँ खो गए
वो टायर को ले के दोपहर में दौड़ना
वो घरों के काँच को बेहिचक तोड़ना
नहाने के लिए था पोखर का पानी
सुनना नानी से परियों की कहानी
गर्मियों की छुट्टी के , वो प्यारे पल
काश मिलता एक बार फिर वो कल
उन पलों की याद में फिर से रो दिए
बचपन के दिन जाने कहाँ खो गए !!

Wednesday, June 10, 2015

पिघलता ग्लेसियर--

" क्यों नहीं हो सकता ये , मैं रह सकती हूँ तुम्हारे घर तो तुम क्यों नहीं रह सकते मेरे घर शादी के बाद "|
" लेकिन लोग क्या कहेंगे , घर जमाई बन गया | मेरे घरवाले भी तो तैयार नहीं होंगे "|
" जब मुझसे शादी का फैसला किया था , तब क्या लोगों की परवाह की थी तुमने | और तुम्हारे घर तो भैया का परिवार है ही , मैं तो एकलौती लड़की हूँ अपने पेरेंट्स की , उनको कैसे अकेला छोड़ दूँ "|
" ठीक है , मैं घर में बात करता हूँ | क्या हम लोग आते जाते नहीं रह सकते "|
" आते जाते तो हम लोग यहाँ से भी रह सकते हैं , तुम्हें यहाँ रहने में क्या दिक्कत है । हमारी गैरहाजिरी में अगर उनको कुछ हो गया तो , आखिर उनका ध्यान रखना भी तो हमारा दायित्व है "|
" ठीक है , मैं कोशिश करता हूँ "|
" सीधे सीधे क्यों नहीं कहते कि तुम्हारा मेल ईगो आड़े आ रहा है "|
वो निरुत्तर हो गया , बात ने कहीं न कहीं गहरे असर किया था । शायद ग्लेसियर पिघल रहा था ।

Tuesday, June 9, 2015

अंधी उड़ान -

अचानक मीडिया के सुर बदल गए , कल जो अखबार , न्यूज़ चैनल उसके सफलता के कसीदे पढ़ रहे थे , वो आज उसे कठघरे में खड़ा कर चुके थे |
कुछ दिन पहले ही जब वो पोडियम पर खड़ा विजेता का मेडल लहरा रहा था , पूरा देश उसके साथ झूम रहा था | लेकिन उसके शॉर्टकट ने उसे गर्त में धकेल दिया | कोच के लाख समझाने पर भी वो नहीं माना और उसने वो दवा ले ही ली |
डोप टेस्ट में उसकी असलियत सामने आ गयी थी |  

राजनीति--

कितनी ही बार बापू ने समझाया था कि वो तेरा इस्तेमाल कर रहा है , लेकिन उसने हमेशा बापू को ही गलत समझा |
आज उसके घर पहुंचा ही था कि बैठक से आवाज़ सुनाई दी " अरे किसुनवा को थोड़ा इज़्ज़त दे देता हूँ इसका मतलब ये थोड़े ही है कि जात भूल गया हूँ उसका | यही तो राजनीति है , समझे " और ठहाकों का समवेत स्वर उसके कानों में पड़ा |
अब उसे लगने लगा कि लोग ज्यादा मत उड़ो किसे कहते हैं .

Monday, June 8, 2015

मटमैले सपने--

उसका सपना था कि वो अंतरिक्ष में जाये , उस धवल और खूबसूरत चाँद को छुए जिसके बारे में वो पढ़ती रही थी | आखिरकार उसे दाखिला मिल गया विदेश की एक यूनिवर्सिटी में |
लेकिन पैसों का इंतज़ाम , ऐसे में याद आया वो |
" तुझे चाँद छूने से कोई नहीं रोक सकता ", वादे पर ऐतबार करके उसके साथ निकल गयी बत्तियों से जगमगाते महानगर की ओर |
अब उस सीलन भरे कोठे में रातों को चाँद , सपनों की तरह बहुत मटमैला दिखता था |  

वो गुलमोहर का पेड़--

था कभी एक , गुलमोहर का पेड़ 
अपने दरवाज़े पर , फूलों से लदा 
फुदकती थीं गौरैया , गिलहरियाँ 
गूँजती थीं शाम को स्वर लहरियाँ 
नहीं थीं , आज की मोटरगाड़ियाँ
बैल थे , चलती थीं बैलगाड़ियाँ
था एक कुआँ भी दरवाज़े पर
पानी था जिसका कभी ठण्डा
कभी था गरम , जैसे मौसम
नीम भी था , रहती थीं गायें
चलती थीं सुबह शाम ठंडी हवाएँ
अब हो गए हम कितने विकसित
हैं आज ट्रैक्टर , कार और सब कुछ
नहीं हैं तो बस दरवाज़े का गुलमोहर
विकास की दौड़ में भेंट चढ़ गए सब
इनके बिना कितना आगे आ गए अब
क्यूँ न हम सब एक विचार अपनाएं
हर घर के सामने फिर से मिलकर
एक प्यारा सा , गुलमोहर लगाएं !!!

कठपुतली--

कल ही पापा मम्मी उसे लेकर बाहर गए थे , बहुत खुश हुई थी वो कठपुतली का खेल देखकर ।
आज रात में एक बार फिर वो देख रही थी कठपुतली का खेल , बस उसके पात्र अलग थे । पापा मम्मी जीवन के कुछ कड़वे पल जी रहे थे और वो एक बार फिर खुश हो रही थी परदे के दूसरे ओर से ।

यक़ीन--

बहुत शान्त थी हवा 
मन कर देती थी शीतल 
बिलकुल बचपन के सपनो 
जैसी थी आबोहवा 
हमारे देश की
जाने किसकी लगी नज़र
न तो बची शान्ति
न ही बची शीतलता
है अब भी एक गंध
बस बारूदी हो गयी है
सपने अब भी आते हैं
बस दिखते हैं धमाके
बचपन खो गया है कहीं
गुमराह हो गयी है जवानी
है फिर भी यक़ीन
हम फिर देखेंगे सपने
फिर लौटेंगी शीतल हवाएँ
फिर खिलेंगे चेहरे फूलों जैसे
है फिर भी यक़ीन हमें !!

Sunday, June 7, 2015

अनुत्तरित प्रश्न--

रात में धमाका हुआ , पूरा ट्रक उड़ गया , कोई नहीं बचा ।
सारी टोली अगले दिन टी वी पर चिपकी थी , अपने विजय का दृश्य और उसका असर देखने के लिए ।
उन समाचारों में बस उसी विस्फ़ोट की गूँज थी और सारे देश में उसी पर चर्चा हो रही थी । लेकिन फिर टी वी पर आये उस दृश्य को देखकर वो सब निशब्द रह गए जिसमे तीन साल की बच्ची विस्फोट में मृत अपने पिता के शरीर से लिपट कर रो रही थी ।
उसने कोई सवाल नहीं पूछा लेकिन उसके सवालों का उनके पास कोई ज़वाब नहीं था ।

असर--

आज ट्रैफिक का बुरा हाल था और उसे देर हो रही थी । ड्राइवर ने शॉर्टकट रास्ते से निकलने के लिए कहा तो उसने हामी भर दी । अचानक रास्ते में उस लम्बी कतार को देख कर वो चौंक गया , इतने लोग , महिलाएँ , बच्चे सब हाथों में घड़े , बाल्टियाँ लेकर खड़े थे उस पानी के टैंकर के पीछे । इतनी क़िल्लत होती है पानी की , इसका उसे सपने में भी गुमान नहीं था ।  
अगले दिन पिता आश्चर्य में थे कि उसने ड्राइवर को पानी के पाइप से कार धुलने से मना कर दिया था । 

Friday, June 5, 2015

पर्यावण संरक्षण--

सभा कक्ष में सन्नाटा था , औचक़ मीटिंग बुलाई गयी थी । सभी कयास लगा रहे थे कि क्या वज़ह हो सकती है इसकी । इतने में जिलाधिकारी महोदय ने प्रवेश किया , पीछे पीछे मुख्य विकास अधिकारी और अन्य अधिकारीगण भी अंदर आये । बिना समय जाया किया जिलाधिकारी साहब मुद्दे पर आ गए ।
" अभी अभी मुख्यमंत्री सचिवालय से फोन आया है कि मुख्यमंत्री महोदय परसों पर्यावरण दिवस पर वृक्षारोपण के लिए अपने जिले में आ रहे हैं । किस जगह पर ये कार्यक्रम करवाना ठीक रहेगा , आप लोग अपनी राय दें "।
अभी उनकी बात ख़त्म भी नहीं हुई थी कि एक अधिकारी खड़े हो गए " सर पिछली बार भी तो हुआ था वृक्षारोपण कार्यक्रम अपने कार्यालय के पास , वहीँ करवा देते हैं "।
" नहीं , वहां नहीं , पिछली बार लगाये गए पेड़ तो सूख गए हैं । अगर उन्होंने पूछ लिया तो , हम रिस्क नहीं ले सकते ", जिला विकास अधिकारी साहब ने तुरंत टोका ।
" तो ठीक है, कोई और जगह बताईये , लेकिन जगह ऐसी हो जहाँ आसानी से जा सकें उनको लेकर और रास्ता भी बढ़िया हो ", मुख्य विकास अधिकारी साहब के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ़ दिखाई पड़ रही थी ।
थोड़ी देर शांति रही , फिर एक कनिष्ठ अधिकारी खड़े हुए और गला खँखारते हुए बोले " सर अगर बुरा न मानें तो मैं कुछ कहूँ "।
" कहिये ", सक्षिप्त उत्तर आया जिलाधिकारी साहब का ।
" क्यों न हम उनको अपने आदर्श ग्राम में ले चलें , बिलकुल शहर से सटा हुआ है और वहाँ हेलीकाप्टर भी उतर सकता है । पिछले मुख्यमंत्री महोदय तो सीधे वहां हेलिकॉप्टर से ही चले गए थे , सड़क वगैरह के झंझट से भी मुक्ति मिल जाएगी । पेड़ तो चाहे जितने लगा लेंगे वहाँ पर "।
मुख्य विकास अधिकारी के चेहरे पर मुस्कान फ़ैल गयी , उन्होंने जिलाधिकारी महोदय की ओर देखा । उनका चेहरा भी संतुष्ट लग रहा था ।
" तो ठीक है , वही जगह उचित रहेगी । आप तुरंत वहां जाकर देख लीजिये और हेलीकॉप्टर उतरने की जगह भी ठीक करा दीजिये ", जिलाधिकारी साहब ने मुख्य विकास अधिकारी को सम्बोधित करते हुए कहा और उठ गए । सारे लोग उठ खड़े हुए और उनके पीछे पीछे निकल गए ।
मुख्य विकास अधिकारी ने उस कनिष्ठ अफ़सर को बुलाया और अपने कक्ष में चले गए । थोड़ी देर बाद उनकी गाड़ी आदर्श ग्राम की ओर चल पड़ी । रास्ते भर कार्यक्रम के बारे में बात होती रही और वो अफ़सर सब नोट करता गया । गाँव पहुँच कर मुख्य विकास अधिकारी को राहत मिली , जगह ठीक थी और आबादी भी बहुत पिछड़े लोगों की नहीं थी । पेड़ लगाने की जगह का चुनाव किया उन्होंने और फोन पर जिलाधिकारी महोदय को सूचित कर दिया । फिर वो लोग उस जगह की तरफ़ चले जहाँ हेलीकॉप्टर को उतरना था । रास्ते में साहब ने पेड़ों को देखा , शीशम के खासे बड़े-बड़े पेड़ थे. उनके नए बने घर में इस शीशम का फर्नीचर हो तो बस मज़ा आ जाये , यहीं उनके मन में घूम रहा था । उन्होंने गाड़ी रुकवाई और उतर कर देखने लगे , अफ़सर को बात समझ में आ गयी । उसने उनको आश्वस्त कर दिया कि सब हो जायेगा और रास्ता भी साफ़ रहेगा । मुख्य विकास अधिकारी संतुष्ट हो गए और फिर वो लोग वापस कार्यालय चल दिए ।
दफ्तर पहुँच कर वो जिलाधिकारी महोदय के कक्ष में गए और स्थिति की जानकारी दी । अब सारे कार्यक्रम की रुपरेखा फाइनल होने लगी और कुछ ही देर में तमाम अधिकारियों और ठेकेदारों को काम पर लगा दिया गया । गाँव की साफ़ सफाई के लिए टीम तैयार हो गयी और उस अफ़सर के नेतृत्व में टीम गॉँव की ओर चल पड़ी । इधर गाँव में सफाई जोरों पर थी और दूसरी तरफ़ वो अफ़सर एक ठेकेदार के साथ पेड़ों के पास पहुँचा । डालियों की छँटाई की बात सुनते ही ठेकेदार ने अफ़सर को धीरे से समझाया " अरे साहब , क्या छँटाई करना , पेड़ ही कटवा देता हूँ । रास्ता भी साफ़ हो जायेगा और लकड़ियाँ भी मिल जाएँगी "। बात उनकी समझ में आ गयी लेकिन हिदायत देते हुए बोले " देखो , पता नहीं चले कि यहाँ कोई पेड़ भी था , बाक़ी ईमानदारी से लकड़ियाँ हमारे यहाँ पहुँचवा देना "।
अगले दिन रात होते होते गाँव चमक गया था , हेलिपैड से गाँव पहुँचने का रास्ता एकदम साफ़ था और उस रास्ते में पड़ने वाले दो पेड़ सफाई से काट दिए गए थे । फिर दो भरे पूरे पेड़ों की बलि लेकर और कुछ अगले साल तक सूख जाने वाले पौधे लगाकर इस वर्ष का वृक्षारोपण का कार्यक्रम भी सकुशल संपन्न हो गया  और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक और क़दम बढ़ा दिया गया ।    

योगदान--

" आज कोई भी परमिशन जारी नहीं की जाएगी पेड़ काटने की "।
" लेकिन सर , बहुत से प्रार्थनापत्र आये हैं आज "।
" आज पर्यावरण दिवस पर हम इतना तो योगदान तो कर ही सकते हैं "।
सारे प्रार्थनापत्र किनारे रख दिए गए ।
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पूरा कार्यालय हैरान था । आज उसने पेड़ काटने के सारे प्रार्थनापत्र ख़ारिज़ कर दिए थे ।
शायद आज पर्यावरण दिवस पर ये उसका योगदान था ।
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बदलाव --
कल तक़ कुछ ले दे कर किसी भी आवेदन को स्वीकृत कर देने वाले अधिकारी ने आज पेड़ काटने के सारे प्रार्थनापत्र ख़ारिज़ कर दिए थे ।
पूरा कार्यालय हैरान था इस बदलाव पर ।
संभवतः आज पर्यावरण दिवस पर ये उसका अपना योगदान था । 

Thursday, June 4, 2015

गुरुमंत्र --

" डॉक्टर साहब , बच्चा बच तो जायेगा न ", उसके दोनों हाँथ जुड़े थे ।
" देखो हम लोग पूरी कोशिश करेंगे , आगे ऊपरवाले की मर्ज़ी । बस पैसों का इंतज़ाम कर लेना "।
सुबह जूनियर डॉक्टर ने फोन किया " सर , स्पेशलिस्ट का फोन आया था कि वो नहीं आ पाएंगे , इसको डिस्चार्ज कर देते हैं । कहीं और करवा लेगा ऑपरेशन "।
" क्यों , ऑपरेशन क्या असफ़ल नहीं होते ", डॉक्टर साहब ने समझाया । ऑपरेशन की तैयारियाँ होने लगीं ।

Wednesday, June 3, 2015

नफ़ा नुक़्सान--

" तो क्या हुआ अगर वो केमिकल इसमें मानक से ज्यादा है , सैंपल तो पास हो ही गया है । समाजसेवा का काम नहीं कर रहे हैं हम लोग , बस अब बाजार को पाट दो इससे । सभी माध्यमों से धुआँधार प्रचार करो और लोगों की जरुरत बना दो इसे "।
अगले तीन महीनों में बाज़ार पटा पड़ा था , बच्चे तो कुछ ज्यादा ही पसंद कर रहे थे । एक दो अख़बारों में , एकाध न्यूज़ चैनल में भी खबर आई उसके नुक्सान के बारे में , लेकिन फिर सब दब गयी ।
धंधा बदस्तूर चल रहा था , मुनाफ़ा भी जम के हो रहा था ।
लेकिन उसके बच्चे के पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक उसके शरीर में उसी केमिकल की मात्रा ज्यादा थी ।

Tuesday, June 2, 2015

बदरंग उजाले--

अब उनकी दुनिया में उजाले शामिल हो गए थे , आखिरकार उनकी आँखों का ऑपरेशन जो हो गया था । अभी तक जिंदगी के अँधेरे ही उनके साथी थे लेकिन हर चीज एक ही रंग की थी । पर अब दुनियाँ के तमाम रंग दिखने लगे ।
शायद उनको अपनी आँखों के ठीक होने पर अफ़सोस हो रहा था ।   

Monday, June 1, 2015

ग़ज़ल--

बढ़ जाती है रौनक, नज़र आता है नूर
बस अंदाज़ में रवानी है , क्या कहिये ,
दिल में उठती हैं , लहरें अब पुरज़ोर ,
सब उनकी निगहबानी है , क्या कहिये,
मौसम का क्या , ये तो बदल जाता है,
जीवन तो बहता पानी है , क्या कहिये ,
जब भी देखा उन्होंने , हमको जी भरके
लगा नज़रें भी पहचानी हैं , क्या कहिये !!