पिता की अचानक हुई मौत से वो टूट गया । एकदम ठीक ठाक थे , बस हल्का सा बुखार हुआ और दो दिन में चल बसे । आर्थिक स्थिति तो बदतर थी ही ,पहले माँ और अब पिताजी भी , एकदम से बड़ा हो गया वो । पुरे गाँव में ख़बर हो गयी थी और सब रिश्तेदारों को भी फोन कर दिया गया । चाचा , जो अलग रहते थे और पिताजी से काफी छोटे थे , घर पर आ गए थे और अंतिम क्रिया की तैयारियों में लग गए थे । चूँकि शाम का समय हो गया तो सबने राय दी कि दाह संस्कार के लिए कल ले जाना ठीक रहेगा क्योंकि रात में रिश्तेदार भी आ जायेंगे । तबियत ज्यादा ख़राब रही होती तो शायद बहुत से रिश्तेदार आये भी होते देखने लेकिन एकदम से चले गए तो कोई देख भी नहीं पाया आखिरी वक़्त में ।
सुबह के चार बजते बजते बुआ और बहन भी आ गयीं , रोना पीटना फिर शुरू हो गया । अब घाट पर चलने की तैयारी शुरू हो गयी , शव को ट्रैक्टर पर रखा गया और कुछ लोग अपनी मोटरसाइकिल और साइकिल से ट्रैक्टर के साथ साथ चल पड़े । उसके गाँव के लोगों का अंतिम संस्कार एक पूर्व निश्चित घाट पर ही होता था और घाट गाँव से क़रीब २० किमी दूर था । पहले के ज़माने में तो लोग पैदल ही शव को कंधे पर उठाये घाट पहुँच जाते थे लेकिन अब तो साधन उपलब्ध थे इसलिए आसानी हो जाती थी । धीरे धीरे लोग शवयात्रा में जुड़ते गए और कुछ रिश्तेदार तो सीधे ही घाट पहुँच गए थे । लगभग ११ बजे ट्रैक्टर और बाक़ी वाहन घाट पर पहुंचे और शव को उतार कर गंगाजी में स्नान के लिए ले जाने लगे । रास्ते में विद्युत शवदाहगृह मौजूद था लेकिन किसी ने भी उसके लिए नहीं सोचा , पुरानी परम्पराएँ भला इतनी आसानी से कहाँ छूटती हैं | एक बोर्ड भी लगा हुआ था कि मृत्यु का पंजीकरण कराना अनिवार्य है लेकिन वो भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा था ।
घाट पर पहुँचते ही कुछ पंडो ने भी घेरा लेकिन गाँव के बुज़ुर्गों ने उन्हें समझा दिया कि गाँव में पण्डे हैं सब करने के लिए । शव को गंगाजी में डुबकी लगाकर किनारे रख दिया गया और इस बीच चाचा लकड़ियों के इंतज़ाम के लिए चले । जैसे ही चाचा लकड़ी की टाल की ओर बढे , कई दुकानदारों ने उनको घेर लिया । लकड़ियों के बारे में वे इस तरह से बता रहे थे जैसे वो जलाने के लिए नहीं बल्कि किसी की शादी में बेड बनाने के लिए उपयोग की जाने वाली हो । खैर एक लकड़ी वाले से बात तंय हुई और उसने शव के वज़न के हिसाब से कितनी लकड़ी लगेगी बताया । गाँव के कुछ बुज़ुर्ग , जिनको इन सब का अनुभव था , उन्होंने थोड़ा कम करवाया और फिर कुछ लोगों ने लकड़ियों को तौलवाना शुरू किया । अधिकांश लकड़ियाँ या तो गीली थीं या हरी , बड़ी मुश्किल से कुछ सूखी लकड़ियाँ मिलीं । साथ ही साथ चन्दन की लकड़ी के कुछ टुकड़े भी ले लिए गए । एक बोर्ड वहाँ पर भी लगा हुआ था जिसपर लकड़ी का मूल्य अंकित था लेकिन वो भी अपना मूल्य खो चुका था । शवदाह से सम्बंधित बाक़ी सब सामान भी ले लिया गया और घाट पर मौजूद नाई ने उसके सर के बाल मूड़ दिए । अब आग लेने के लिए वो चाचा के साथ चल पड़ा । आग देने के लिए भी डोमराज ने बड़ा सा मुँह खोला , पहले ५००० की मांग की फिर किसी तरह उनको ५०० में तैयार किया गया ।
अगले तीन घंटे में दाह संस्कार निपट गया , डोमराज ने चिता में से बची हुई अस्थियाँ निकाल कर दे दीं और उनको उसने गंगाजी में प्रवाहित कर दिया । घाट पर उपस्थित सभी लोगों ने एक बार नदी के मटमैले पानी में डुबकी लगायी और फिर सब वापस चलने की तैयारी करने लगे । उधर गाँव के बुज़ुर्ग चाचा के साथ बहस में लगे हुए थे कि किस मिठाई की दुकान पर जलपान किया जायेगा । बात बड़ी बड़ी दुकानों से होते हुए रास्ते में पड़ने वाली एक दुकान पर तंय हुई और सबको बता दिया गया कि वहाँ पहुँच जाएँ । थोड़ी देर में सब वहां इकठ्ठा हुए और फिर लोगों ने जम कर नास्ता किया । शायद अगर वो अपना घुटा सर लेकर वहां नहीं होता तो लोग अन्दाज़ा भी नहीं लगा पाते कि ये लोग शवदाह करके नाश्ता कर रहे हैं ।
नाश्ता करके सब लोग अपने अपने वाहन से निकल पड़े , वो भी चाचा के साथ ट्रैक्टर पर गाँव चल पड़ा । घर में मौजूद लोगों के लिए भी नाश्ता ले लिया गया था , क्योंकि फिलहाल तो घर पर चूल्हा नहीं जलना था । घर पहुँच कर चाचा ने उसको सारे खर्च का ब्यौरा दिया और वो धम्म से सर पकड़ कर बैठ गया । अभी तो अगले तेरह दिन तमाम कर्मकांड होने थे और उसके बाद ब्राह्मणभोज जिसमें पूरा गाँव और रिश्तेदारों को खिलाना था । उसे लगने लगा जैसे उसके बचे हुए थोड़े से खेत भी पिताजी के साथ गुज़र गए हों और वो बिलकुल बेआसरा हो गया है ।
सुबह के चार बजते बजते बुआ और बहन भी आ गयीं , रोना पीटना फिर शुरू हो गया । अब घाट पर चलने की तैयारी शुरू हो गयी , शव को ट्रैक्टर पर रखा गया और कुछ लोग अपनी मोटरसाइकिल और साइकिल से ट्रैक्टर के साथ साथ चल पड़े । उसके गाँव के लोगों का अंतिम संस्कार एक पूर्व निश्चित घाट पर ही होता था और घाट गाँव से क़रीब २० किमी दूर था । पहले के ज़माने में तो लोग पैदल ही शव को कंधे पर उठाये घाट पहुँच जाते थे लेकिन अब तो साधन उपलब्ध थे इसलिए आसानी हो जाती थी । धीरे धीरे लोग शवयात्रा में जुड़ते गए और कुछ रिश्तेदार तो सीधे ही घाट पहुँच गए थे । लगभग ११ बजे ट्रैक्टर और बाक़ी वाहन घाट पर पहुंचे और शव को उतार कर गंगाजी में स्नान के लिए ले जाने लगे । रास्ते में विद्युत शवदाहगृह मौजूद था लेकिन किसी ने भी उसके लिए नहीं सोचा , पुरानी परम्पराएँ भला इतनी आसानी से कहाँ छूटती हैं | एक बोर्ड भी लगा हुआ था कि मृत्यु का पंजीकरण कराना अनिवार्य है लेकिन वो भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा था ।
घाट पर पहुँचते ही कुछ पंडो ने भी घेरा लेकिन गाँव के बुज़ुर्गों ने उन्हें समझा दिया कि गाँव में पण्डे हैं सब करने के लिए । शव को गंगाजी में डुबकी लगाकर किनारे रख दिया गया और इस बीच चाचा लकड़ियों के इंतज़ाम के लिए चले । जैसे ही चाचा लकड़ी की टाल की ओर बढे , कई दुकानदारों ने उनको घेर लिया । लकड़ियों के बारे में वे इस तरह से बता रहे थे जैसे वो जलाने के लिए नहीं बल्कि किसी की शादी में बेड बनाने के लिए उपयोग की जाने वाली हो । खैर एक लकड़ी वाले से बात तंय हुई और उसने शव के वज़न के हिसाब से कितनी लकड़ी लगेगी बताया । गाँव के कुछ बुज़ुर्ग , जिनको इन सब का अनुभव था , उन्होंने थोड़ा कम करवाया और फिर कुछ लोगों ने लकड़ियों को तौलवाना शुरू किया । अधिकांश लकड़ियाँ या तो गीली थीं या हरी , बड़ी मुश्किल से कुछ सूखी लकड़ियाँ मिलीं । साथ ही साथ चन्दन की लकड़ी के कुछ टुकड़े भी ले लिए गए । एक बोर्ड वहाँ पर भी लगा हुआ था जिसपर लकड़ी का मूल्य अंकित था लेकिन वो भी अपना मूल्य खो चुका था । शवदाह से सम्बंधित बाक़ी सब सामान भी ले लिया गया और घाट पर मौजूद नाई ने उसके सर के बाल मूड़ दिए । अब आग लेने के लिए वो चाचा के साथ चल पड़ा । आग देने के लिए भी डोमराज ने बड़ा सा मुँह खोला , पहले ५००० की मांग की फिर किसी तरह उनको ५०० में तैयार किया गया ।
अगले तीन घंटे में दाह संस्कार निपट गया , डोमराज ने चिता में से बची हुई अस्थियाँ निकाल कर दे दीं और उनको उसने गंगाजी में प्रवाहित कर दिया । घाट पर उपस्थित सभी लोगों ने एक बार नदी के मटमैले पानी में डुबकी लगायी और फिर सब वापस चलने की तैयारी करने लगे । उधर गाँव के बुज़ुर्ग चाचा के साथ बहस में लगे हुए थे कि किस मिठाई की दुकान पर जलपान किया जायेगा । बात बड़ी बड़ी दुकानों से होते हुए रास्ते में पड़ने वाली एक दुकान पर तंय हुई और सबको बता दिया गया कि वहाँ पहुँच जाएँ । थोड़ी देर में सब वहां इकठ्ठा हुए और फिर लोगों ने जम कर नास्ता किया । शायद अगर वो अपना घुटा सर लेकर वहां नहीं होता तो लोग अन्दाज़ा भी नहीं लगा पाते कि ये लोग शवदाह करके नाश्ता कर रहे हैं ।
नाश्ता करके सब लोग अपने अपने वाहन से निकल पड़े , वो भी चाचा के साथ ट्रैक्टर पर गाँव चल पड़ा । घर में मौजूद लोगों के लिए भी नाश्ता ले लिया गया था , क्योंकि फिलहाल तो घर पर चूल्हा नहीं जलना था । घर पहुँच कर चाचा ने उसको सारे खर्च का ब्यौरा दिया और वो धम्म से सर पकड़ कर बैठ गया । अभी तो अगले तेरह दिन तमाम कर्मकांड होने थे और उसके बाद ब्राह्मणभोज जिसमें पूरा गाँव और रिश्तेदारों को खिलाना था । उसे लगने लगा जैसे उसके बचे हुए थोड़े से खेत भी पिताजी के साथ गुज़र गए हों और वो बिलकुल बेआसरा हो गया है ।
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