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Monday, June 8, 2015

वो गुलमोहर का पेड़--

था कभी एक , गुलमोहर का पेड़ 
अपने दरवाज़े पर , फूलों से लदा 
फुदकती थीं गौरैया , गिलहरियाँ 
गूँजती थीं शाम को स्वर लहरियाँ 
नहीं थीं , आज की मोटरगाड़ियाँ
बैल थे , चलती थीं बैलगाड़ियाँ
था एक कुआँ भी दरवाज़े पर
पानी था जिसका कभी ठण्डा
कभी था गरम , जैसे मौसम
नीम भी था , रहती थीं गायें
चलती थीं सुबह शाम ठंडी हवाएँ
अब हो गए हम कितने विकसित
हैं आज ट्रैक्टर , कार और सब कुछ
नहीं हैं तो बस दरवाज़े का गुलमोहर
विकास की दौड़ में भेंट चढ़ गए सब
इनके बिना कितना आगे आ गए अब
क्यूँ न हम सब एक विचार अपनाएं
हर घर के सामने फिर से मिलकर
एक प्यारा सा , गुलमोहर लगाएं !!!

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