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Monday, June 22, 2015

कवच--

लक्ष्मी ने उसके सर पर प्यार से हाँथ फेरा और फिर गोद में मुन्नी को लेकर निकल गयी , वो उसे जाते हुए देखता रहा | उसे याद आया " चिंता क्यूँ करते हो मुन्नी के बापू , तुम्हारी निगाह का सुरक्षा कवच है न , कुछ नहीं होगा हमको "|
कितना गबरू जवान था वो और शादी भी इतनी सुन्दर लक्ष्मी से हो गयी | पुरे गाँव में सब उसके भाग्य से जल गया था , लेकिन उसको सुखी रखने के लिए गाँव में कहाँ कुछ था | खेतों पर खुद तो काम कर लेता था लेकिन लक्ष्मी जाये , ये बर्दाश्त नहीं होता था उससे | मालिकों की भूखी निगाहें उसने देखी थी काम करने वाली और महिलाओं पर | पहले तो खुद ही जाना पड़ता था काम की तलाश में लेकिन अब तो कोई न कोई आ ही जाता था बुलाने | फिर वो शहर आ गया रिक्शा चलाने, अपने चचेरे भाई के साथ | रहने का इंतज़ाम भी उसी के टपरी के पास हो गया और दिन भर में अच्छी आमदनी भी हो जाती थी | जिंदगी सुकून से बीत रही थी , लक्ष्मी को किसी के यहाँ काम करने नहीं जाना पड़ता था और साल भर के अंदर मुन्नी भी पैदा हो गयी | अब घर भर गया उसका और रात में मुन्नी के साथ खेलने के चलते लौट के आने की जल्दी भी रहने लगी |
लेकिन एक दिन गाड़ी ने टक्कर मार दी और वो अपाहिज हो बिस्तर पर पड़ गया | लक्ष्मी , जिसको उसने कभी बाहर काम नहीं करने दिया , अब घर सँभालने के लिए बाहर निकल गयी | वो बहुत परेशान रहने लगा था और उसकी बेचैनी लक्ष्मी से ज्यादा दिन छुप नहीं पायी | एक दिन उसने प्यार से समझाया " कितनी सारी औरतें शहरों में काम पे जाती हैं तो मेरे जाने में क्या दिक्कत है | जब तुम स्वस्थ थे तो तुमने हमें खिलाया, आज मेरी बारी है सबका ध्यान रखने की | किसी के देखने से क्या फ़र्क़ पड़ जायेगा , किसी भी बुरी नज़र से मुझे तुम अपने निगाहों के कवच से बचा लोगे "|

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