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Monday, June 8, 2015

यक़ीन--

बहुत शान्त थी हवा 
मन कर देती थी शीतल 
बिलकुल बचपन के सपनो 
जैसी थी आबोहवा 
हमारे देश की
जाने किसकी लगी नज़र
न तो बची शान्ति
न ही बची शीतलता
है अब भी एक गंध
बस बारूदी हो गयी है
सपने अब भी आते हैं
बस दिखते हैं धमाके
बचपन खो गया है कहीं
गुमराह हो गयी है जवानी
है फिर भी यक़ीन
हम फिर देखेंगे सपने
फिर लौटेंगी शीतल हवाएँ
फिर खिलेंगे चेहरे फूलों जैसे
है फिर भी यक़ीन हमें !!

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