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Friday, December 11, 2015

नयी कोंपल--

सुबह वो जैसे ही बाहर निकला , पिताजी को बगीचे की घास साफ़ करते देख दंग रह गया | ये क्या हो गया उनको , अच्छे भले तो घर में रहते हैं और किसी काम को करने के लिए कहा भी नहीं जाता उनको , फिर ये अचानक क्या हुआ |
" पापा , क्या कर रहे हैं आप , किसने कहा आपको ये सब करने को | ६० साल तक तो आपने खूब काम किया , अब तो आपके आराम करने के दिन हैं , लाईये दीजिये इसे ", कहते हुए उसने उनके हाथ से खुरपा ले लिया |
" मुझे किसी ने नहीं कहा लेकिन मुझे खुद लग रहा था कि मैं अनुपयोगी होता जा रहा हूँ | बाहर जाने नहीं देते कि कहीं गिर पड़ न जाऊँ, कोई काम करने नहीं देते तुम लोग , और सब्जी तक नहीं लाने देते कि लोग क्या कहेंगे "|
" अगर ऐसी बात है तो आज से ही इस गार्डन की जिम्मेदारी आपकी , आप जो करना चाहें , कीजिये यहाँ "|
बगीचे के फूलों से कम नहीं लग रही थी पापा के चेहरे की मुस्कान , उसे लगा जैसे बगीचे के किनारे वाले बूढ़े पेड़ पर नयी कोंपलें आ गयी हैं |

Thursday, December 10, 2015

ममता की क़ुर्बानी --

उसका दिल बुरी तरह धड़क रहा था , अब समय हो गया था डिलीवरी का। नर्स ने उसे सहारा देकर उठाया और अंदर के कमरे में ले जाने लगी। वैसे ये पहला अवसर नहीं था हस्पताल के इस कमरे में आने का , लेकिन इस बार वज़ह कुछ और थी। खो गयी वो पुराने दिनों में , छोटा सा परिवार था उसका , वो , पति और दो बच्चे , किसी तरह दो वक़्त की रोटी मिल जाती थी। एक दिन वो हस्पताल आई थी तभी उसे पता चला कि किसी को अपना बच्चा पैदा करने के लिए दूसरे की कोख की जरुरत है। घर आते समय पुरे रास्ते उसके मन में ये विचार झंझावात मचाता रहा लेकिन किसी निष्कर्ष पर पहुंचना आसान नहीं था उसके लिए| घर पहुँच कर डरते डरते उसने पति को इस खबर के बारे में बताया और उसकी राय जाननी चाही| ये फैसला बहुत कठिन था , अपने रिश्तेदारों और समाज की चिंता अपनी जगह थी लेकिन उससे मिलने वाला धन बहुत पर्याप्त था उनके परिवार के भविष्य के लिए। पति ने भी कुछ सोच विचार कर हामी भर दी और उसने भी अपने आप को तैयार कर लिया इसके लिए| उसने हस्पताल जाकर अपनी सहमति बता दी और वापस आ गयी| अगले कुछ हफ्ते तमाम क़ानूनी कार्यवाही में बीत गए और फिर इस सर्रोगेसी की शुरुआत हुई। उस दूसरे परिवार की तरफ से शुरू में ही थोड़ा धन दे दिया गया था जिससे उसके खान पान का ध्यान रखा जा सके। इस पैसे से उसके पूरे परिवार का भी खर्च सुचारू रूप से चलने लगा था। जैसे जैसे बच्चा पेट में बढ़ता गया , उसके अंदर मातृत्व पनपने लगा। उसे कोई फ़र्क़ नहीं समझ आता था अपने दो बच्चों के गर्भ में पलने और इस बच्चे के पलने में। कभी कभी तो वो भूल ही जाती थी कि ये बच्चा उसका नहीं है लेकिन जैसे ही फल वगैरह खाती थी , उसे याद आ जाता था। बीच बीच में उस परिवार से कोई न कोई आ जाता था उसे और होने वाले बच्चे को देखने के लिए और तब उसे कुछ बेचैनी सी होने लगती थी। धीरे धीरे समय बीतता गया और आखिरी महीना भी आ गया , अब उसके पेट में होने वाली हलचल उसे बहुत प्यारी लगने लगी थी। उसके पेट में ही पल रहा है बच्चा लेकिन वो उसका नहीं है , इस बात को जज्ब करना जैसे अब उसके लिए मुश्किल होता जा रहा था। जब वो कमज़ोर पड़ती थी तब उसका पति उसे अपने परिवार की खुशियों की दुहाई देकर समझाने की कोशिश करता। वो भी अपने परिवार की सुधरती स्थिति को देखकर अपने को समझाने की पूरी कोशिश करती लेकिन तभी उसके पेट में मचती हलचल उसे विचलित कर देती। कभी उसे अपनी ख़ुशी , अपना मातृत्व भारी पड़ता दिखता तो कभी अपने परिवार की खुशियाँ मातृत्व पर। आज वो समय भी आ गया था जब उसके गर्भ में पलता बच्चा बाहर की दुनियाँ में आने के लिए तैयार था। अंदर प्रसव कक्ष में भी लेटने के बाद उसके दिमाग में यही चल रहा था कि जब ये बच्चा चला जायेगा तो वो कैसे रहेगी , आखिर ९ महीने अपने कोख में ही तो पाला था उसको। वहाँ बाहर उसके होने वाले माता पिता पूरी तैयारी कर के आये थे कि बच्चे के पैदा होने के बाद बचे पैसों का भुगतान करके वो बच्चे को लेकर चले जायेंगे। आधा घंटा बीता और नर्स ने बच्चा उसके पास रख दिया। एकदम से उसकी ममता उमड़ पड़ी और उसने बच्चे को सीने से लगा लिया , अब उसकी बच्चे को लौटाने की इच्छा कमजोर पड़ती जा रही थी। इतने में उसका पति और दोनों बच्चे अंदर आ गए , और उसने गौर से अपने बच्चों के कपड़ों को देखा। कितने अच्छे लग रहे थे दोनों इन कपड़ों में लेकिन कुछ महीनों पहले ये तो सिर्फ सपना ही था उसके लिए। एक बार और उसने अपने नए जन्मे बच्चे को देखा और फिर उसने अपने परिवार की खुशियों के लिए उसने अपनी ममता को क़ुर्बान करने का फैसला कर लिया| इस क़ुर्बानी की गवाही उसके आँख के किनारों से बहे आँसू दे रहे थे|

खबर--

आज गाँव में जबरदस्त गहमा गहमी थी , तमाम नेता और मंत्री आ जा रहे थे | कल रात हुए पुलिस फायरिंग में इस गाँव के एक अल्पसंख्यक की मौत हो गयी थी और उसके घर संवेदना व्यक्त करने और आर्थिक मदद करने लोगों का हुजूम चला आ रहा था | पुलिस अत्याचार के खिलाफ भी जगह जगह मोर्चा निकालने की तैयारी चल रही थी | सभी स्थानीय समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनल में इस खबर को प्रमुखता से दिखाया गया था |
इस गाँव से निकलती गाड़ियाँ कुछ ही किलोमीटर दूर के दूसरे गाँव से होकर निकल रही थीं जहाँ का एक अर्ध सैनिक बल का नौजवान भी कुछ हफ़्तों पहले बारूदी सुरंग के विस्फोट में शहीद हो गया था | कल उस शहीद की माँ ने विभाग से मिले धन से अपने गाँव के बच्चों को पढ़ाने के लिए एक विद्यालय की नींव डाली थी | किसी एक समाचार पत्र के एक कोने में ये भी एक छोटी सी खबर थी |

आँच--कहानी

बहुत बेचैनी से घूम रहे थे नेताजी घर में , लगातार फोन लगा रहे थे बाहर रहने वाली बेटी को लेकिन फोन कवरेज क्षेत्र के बाहर बता रहा था| दंगों की आंच उस प्रदेश में भी पहुँच गयी थी और उनकी बेटी जहाँ रहती थी वो क्षेत्र भी लपेट में आ गया था| अचानक फोन बजा , लपक कर देखा उन्होंने की शायद बेटी का हो , लेकिन फोन उनके पार्टी के कार्यकर्ता का था| 
" बधाई हो नेताजी , माहौल बिलकुल अपने पक्ष में बन गया है| दूसरे प्रदेशों में भी दंगे फ़ैल रहे हैं , अब कोई चिंता नहीं है| सरकार तो अपनी ही बनेगी इस बार ", बहुत उत्साहित होकर कार्यकर्ता बोल रहा था लेकिन नेताजी की आवाज़ जैसे बर्फ की तरह ठंडी थी| बिना कुछ कहे जल्दी से उन्होंने फोन काटा और फिर बेटी को फोन लगाने लगे| 
जैसे जैसे बेटी का फोन कवरेज क्षेत्र से बाहर बता रहा था , वैसे वैसे उनका कल का उत्साह खुद उनको ही काटने दौड़ रहा था| हार कर उन्होंने उस क्षेत्र के अपने पार्टी के बहुत करीबी साथी को फोन लगाया और उसको बताया| लगभग गिड़गिड़ाने के अंदाज़ में उन्होंने उससे कहा कि जैसे भी हो वो जाकर वहां से बेटी को सुरक्षित निकाले| सामने से आश्वासन तो मिला लेकिन पता नहीं क्यों उनको उस पर भरोसा करने का मन नहीं किया| आखिर खुद भी तो सबको कितने आश्वासन देते रहते थे लेकिन अमल कितनो पर किया , ये उनको भलीभांति पता था| 
अचानक फोन बजा , बेटी का नंबर था| बेटी कुछ बोले उसके पहले ही वो चिल्लाने लगे " तुम ठीक तो हो बेटी , कहाँ थी तुम्हारा फोन नहीं लग रहा था "|
" स्थिति ठीक नहीं है पापा , मैं निकलने की कोशिश कर रही हूँ यहाँ से| जैसे ही स्टेशन पहुँचूंगी , आपको फोन कर दूंगी "| 
" देखो संभल कर निकलना , अपना ख्याल रखना ", और भी जाने क्या क्या बोल रहे थे कि उधर से हल्ला सुनाई दिया और फिर फोन कट गया| वो वापस फोन लगाने लगे , घंटी बज रही थी लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आ रहा था| वापस उन्होंने अपने करीबी को फोन लगाया और उसे बेटी से हुई बात बताई , उसने फिर से कहा कि स्थिति तो गड़बड़ है लेकिन वो प्रयास कर रहा है|
अब वो फोन को हाँथ में लेकर सोफे पर धंस गए , मन में विचारों का तूफ़ान चल रहा था| उन्होंने सोचा भी नहीं था कि उनकी लगायी आग की आँच खुद उन तक पहुँच जाएगी| पत्नी के नहीं रहने पर बेटी ही उनका सहारा थी , बहुत चाहते थे वो उसको , इसीलिए उसके कहने पर उसे दूसरे प्रदेश भेज दिया था पढ़ाई के लिए| एक बार फिर फोन लगाया , जवाब नहीं मिलने पर बेचैनी में उठे और किनारे के कमरे में बने पूजा घर में चले गए| 
पता नहीं कितनी देर तक बैठे रहे वो उन मूर्तियों के सामने , मन में बस एक ही प्रार्थना कि बेटी सही सलामत घर आ जाये| दंगों में फंसे लोगों का हश्र पता था उनको और अगर लड़की हो तो , सोच कर ही उनका मन काँप उठता था| मन ही मन उन्होंने अपने किये गुनाहों की सजा मांगी उपरवाले से और भविष्य में ऐसी किसी भी घटना का हिस्सा बनने से तौबा कर ली| 
लगभग दो घंटे बीत चुके थे बेटी से बात किये , लगातार फोन लगा रहे थे लेकिन अब उसका फोन स्विच ऑफ बता रहा था| अपने फोन पर आते किसी भी कार्यकर्ता के कॉल को वो ले नहीं रहे थे| बस एक ही प्रार्थना कर रहे थे , बेटी सुरक्षित निकल जाए और घर आ जाये| इस बार घंटी बजी तो उन्होंने देखा , किसी लैंडलाइन से फोन था| डरते डरते उठाया और कुछ कहते उसके पहले ही उधर से बेटी की आवाज़ आई " पापा , मैं अपने दोस्त के घर पहुँच गयी हूँ , मेरा फोन डिस्चार्ज हो गया था इसलिए उसके लैंडलाइन से आपको कॉल किया| अब घबराने की कोई बात नहीं है , जैसे ही माहौल ठीक होगा मैं आ जाउंगी , आप बेफिक्र रहिये "| 
उनकी आँखों से अश्रुधार बह निकले , रुंधे गले से बस इतना ही कह पाये " कोई जल्दी नहीं है आने की , जब मैं बताऊँ तभी निकलना वहां से ", और सोफे पर ढह गए| सामने टी वी पर जगह जगह दंगे भड़कने की खबर आ रही थी| उन्होंने एक बार फिर भगवान को धन्यवाद दिया और जूते पहन कर बाहर निकल आए| अब किसी भी हालत में अपने क्षेत्र की स्थिति को सुधारना था उनको , आखिर अपने किये गुनाहों के लिए इससे बड़ा प्रायश्चित और क्या हो सकता था|

उचित फैसला--

पूरे मोहल्ले में खुसुर फुसुर हो रही थी , जितनी मुँह , उतनी बातें । आज तीसरा दिन था और बेटी घर नहीं लौटी थी , किस किस को समझाते । घर में वो तो बुरी तरह तड़प रही थी लेकिन उसके पिता का अभी भी गुस्सा ठंढा नहीं हुआ था । बस एक ही रट लगाये हुए थे कि बेटी ने उनकी इज़्ज़त का ख्याल नहीं रखा और उनके मना करने पर भी अँकुर के साथ चली गयी । 
अचानक फोन की घंटी बजी और उसने दौड़ कर उठाया , उधर से बेटी की ही आवाज़ थी । " माँ , मैं ठीक हूँ और यहाँ वर्किंग वूमेन हॉस्टल में रह रही हूँ । मेरी कोई इच्छा नहीं थी कि मैं पापा के विरुद्ध जाकर शादी करूँ , लेकिन मैं अँकुर के बगैर भी नहीं रह सकती थी । इसलिए मैंने यहाँ पर एक जॉब ढूँढ ली है और फिलहाल यहीं रहूँगी । अँकुर भी अपने घर चला गया है और वो मेरे फैसले से सहमत है । अब वक़्त के साथ शायद पापा बदल जाएँ या हम अपने को बदल लें, बस हम परिस्थितियाँ ठीक होने का इंतज़ार करेंगे "।
कुछ देर तक तो वो फोन हाँथ में लिए खड़ी रही , फिर उसे बेटी की समझदारी पर फक़्र होने लगा । उसके जेहन में बेटी की जिंदगी में खुशियों के दीप जगमगाने की उम्मीद पुख्ता हो गयी ।

ईमान--

" इस बार पटाखे कम लाये थे आप, बहुत थोड़े से बचे हैं कल के लिए", बेटे ने शिकायती लहज़े में कहा और पटाखे वहीँ छोड़ कर घर के अंदर चला गया| रात बहुत होने से दीवाली की रौनक कम होने लगी थी और मोहल्ले के बाकी लोग भी अब घरों में जाने लगे थे| उसने एक बार सोचा कि बचे हुए पटाखे अंदर रख दे, फिर ये सोचकर कि बरामदे में ही तो हैं, वहीँ छोड़ दिया| थोड़ी देर में सब सोने की तैयारी में लग गए|
अचानक उसे किसी के बरामदे में चलने की आवाज़ आई| धीरे से उसने पर्दा हटाया और बरामदे की धुँधली रौशनी में देखने की कोशिश करने लगा| थोड़ी देर में ही उसने उस बच्चे को पहचान लिया जो मोहल्ले के किनारे बने एक झोपड़े में अपनी माँ के साथ रहता था| वो कभी एक पटाखा उठाता, तो कभी दूसरा और फिर उनको रखकर तीसरा| शायद वो सोच नहीं पा रहा था कि कौन सा पटाखा ले और उसकी इस उधेड़बुन को वो अंदर से देख रहा था| लेकिन थोड़ी देर बाद ही वो लड़का बिना पटाखे लिए धीरे से चला गया|
कुछ देर सोच कर वो बाहर निकला और उसने सारे पटाखे इकठ्ठा किये| घर में रखी मिठाईयों को भी उसने निकाला और पटाखों के साथ रख दिया| सबेरे सबेरे ही ये सारी चीजें उस बच्चे के घर पर दे देगा ताकि आज तो उस बच्चे का ईमान बच गया, आगे कहीं टूट न जाए और फिर उसको किसी और घर के बरामदे में नहीं घुसना पड़े|

अर्थ का अनर्थ --

अर्थ का अनर्थ कैसे हो सकता है , इसका एहसास मुझे भी हुआ है जिंदगी में । बात १९९३ की है , मैं उस समय करही , जो कि मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में एक गाँव है , में नौकरी कर रहा था । निमाड़ का क्षेत्र था और महाराष्ट्र के नज़दीक होने के चलते निमाड़ी के साथ साथ मराठी भी काफी प्रचलित थी उस तरफ । एक दिन मैं शाखा में रोजमर्रा के काम में लगा हुआ था तभी एक ग्राहक मेरे पास आया । उसका चेहरा थोड़ा उतरा हुआ था , जबकि सामान्यतया वो खुशमिज़ाज इंसान था । मैंने यूँ ही उत्सुकता वस पूछ लिया कि क्या हुआ ? उसने थोड़े उदास लहज़े में कहा ," मेरे पिताजी शांत हो गए "।
मुझे लगा कि शायद मैंने गलत सुन लिया इसलिए मैंने उससे कहा " आपके पिताजी शांत हो गए ?, तो उसने हाँ में सर हिला दिया । थोड़ी देर बाद वो तो चला गया लेकिन मैं उधेड़बुन में डूबा रहा । मैं सोच रहा था कि क्यों और कैसे शांत हो गए होंगे उसके पिताजी । मेरे शब्दकोश में शांत होने का मतलब था खामोश हो जाना , और कोई यूँ अचानक खामोश कैसे हो सकता है ।
इतने में शाखा का दफ्तरी मेरे पास आया और उसने कहा " अभी जो आदमी आया था आपके पास , उसके घर चलना है हमको "। मेरे कारण पूछने पर उसने भी वही बताया " उसके पिताजी शांत हो गए हैं न , इसीलिए जाना जरुरी है "। अब मुझसे रहा नहीं गया और मैं पूछ बैठा " अरे अगर उसके पिताजी शांत हो गए हैं तो हम लोग जाकर क्या करेंगे ?
उसने बड़े आश्चर्य से मुझे देखा और बोला " अरे ऐसे में तो जाते ही हैं सब लोग , इसलिए हमें भी जाना चाहिए "।
मैंने अब अपनी शंका व्यक्त कर ही दी उससे " अरे भाई , अगर उसके पिताजी चुप हो गए हैं तो हम लोग जाकर वहाँ क्या करेंगे "।
अब दफ्तरी को बात समझ में आई और उसने बड़ी गंभीरता से मुझे समझाया " अरे जनाब , शांत हो जाने का मतलब होता है गुजर जाना "। अब बात मेरी भी समझ में आई और मैं काफी देर तक हँसता रहा अपनी सोच पर । लेकिन मुझे अपने शब्दकोश के लिए एक नया शब्द मिल गया ।

तोहफ़े --

" देखो श्यामू , ये सब गिफ्ट जिनके नाम लिखे हैं , उनके घर पर पहुँचा देना । तुम तो सबको जानते ही हो , और हाँ , एक बात का विशेष ख्याल रहे , कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए ", साहब ने गिफ्ट्स और लिस्ट दोनों उसे पकड़ाया और केबिन में चले गए । कई लोग उनका इंतज़ार कर रहे थे , सबके हाथ में कोई ना कोई गिफ्ट था जो उनकी हैसियत और पड़ने वाले काम के हिसाब से था । 
श्यामू ने एक नज़र तोहफ़ों पर डाली और रिक्शे पर डालकर चल दिया । इतने शानदार गिफ्ट्स , काश वो भी एक ले सकता , उसने एक ठंडी साँस ली । चलते चलते वो सोचने लगा कि ये नए साहब अच्छे हैं , कम से कम उसे इस लायक तो समझते हैं , पुराने वाले तो तोहफ़ों के पास भी नहीं फटकने देते थे । काफी देर हो गयी थी बांटते हुए और उसका घर भी पास आ गया था तो उसने सोचा कि बाकी तोहफ़े कल बाँट देगा और घर आ गया ।
उसके बेटे ने गिफ्ट देखते ही उसे खोल दिया , उसे लगा कि शायद अपने लिए ही है । अभी वो उसे पूरा देख भी पाता कि एक जोरदार थप्पड़ खाकर वो नीचे गिर गया । रोते हुए वो तो वहाँ से भाग ही गया , लेकिन श्यामू भी तोहफ़े को वापस पैक करते हुए अपनी बेबसी पर रो पड़ा । दूसरी तरफ साहब के घर में उनकी पत्नी और बच्चों ने कई गिफ्ट बेकार कहकर फेंक दिया था ।

तृप्ति--

धरा बहुत उदास थी , आकाश से उसकी उदासी देखी नहीं गयी | उसने धरा से उदासी का कारण पूछा तो धरा ने अपने प्यासे और दरार भरे शरीर की ओर इशारा कर दिया और फिर से मायूस हो गयी |
" इसमें तुम्हारा क्या दोष है , अब अगर इंसान इतना भी नहीं समझता तो तुम क्या कर सकती हो "| 
" मुझे दुःख इस बात का नहीं है कि इंसान प्रगति की आड़ में अपने लिए अन्धकार ला रहा है , दुःख तो होता है मासूम बच्चों को देखकर | कैसे बैठा पाएंगे वो सामंजस्य आने वाली विषम परिस्थिति से ?" 
तभी आकाश की नज़र एक नन्हे से बच्चे पर पड़ी जो धरा में बने दरारों में मिटटी भरने की कोशिश कर रहा था | वो मुस्कुराया और धरा पर पानी बरसाने लगा | धीरे धीरे धरा को तृप्ति की अनुभूति होने लगी |

संकल्प--

पूरी रात सो नहीं पायी थी वो, बहुत कठिन मोड़ पर ला खड़ा किया था ज़िन्दगी ने। बहुत सी जिम्मेदारियाँ थीं जिनका निर्वाह करना बाक़ी था और अपने संस्कार भी थे जिनसे दूर होना एक तरह से उसकी आत्मा की मौत थी। एक बार फिर मैसेज का टोन बजा फोन में और वो वर्तमान में आ गयी। हिम्मत नहीं पड़ रही थी फोन देखने की, उसे पता था कि मैसेज या तो बहन का होगा या बॉस का और दोनों ही स्थितियों के लिए वो निर्णय नहीं कर पायी थी।
कई दिनों से वो दोनों को टाल रही थी, जब भी बहन का मैसेज आता तो कमज़ोर पड़ने लगती थी। घर के एकलौते कमाऊ सदस्य होने के चलते उसकी पढ़ाई लिखाई की जिम्मेदारी उसको उठाना अपना कर्तव्य लगता लेकिन कहाँ से करे इंतज़ाम। बड़ी मुश्किल से थोड़े पैसे बचते थे जिसे वो बिला नागा घर भेज देती थी, लेकिन घर वालों को, या तो उसकी हालत का इल्म ही नहीं था, या वो यक़ीन नहीं करना चाहते थे। बॉस उसे व्यवहारिक बनने की सलाह देता और साथ ही साथ उसकी समस्याओं के हल का आश्वासन भी।
आख़िरकार उसने फोन उठाया, मैसेज बहन का ही था और दो दिन में ही पैसे भेजने के लिए लिखा था। वो फिर से कमज़ोर पड़ने लगी और उसे लगने लगा कि अब दोनों को ही हाँ बोलने के सिवा कोई चारा नहीं बचा था। अचानक उसकी नज़र सिरहाने रखी पिता के तस्वीर पर पड़ी और उसे उनके आखिरी समय में लिया गया संकल्प याद आ गया कि जिम्मेदारियाँ जरूर उठाना लेकिन अपने संस्कारों और इच्छाओं की कीमत पर नहीं।
उसने अपना पहला संकल्प पूरा करते हुए दोनों को हाँ का जवाब भेज दिया और फोन रखते हुए उसने पिता की तस्वीर उल्टी कर दी।

बदलाव --

घर की तरफ जाते हुए दिमाग भन्नाया हुआ था उसका, आज तो सीमा पार हो गयी। सहने की भी कोई सीमा होती है, अब और नहीं सहेगा और जैसे भी हो, बदला जरूर लेगा इस अपमान का। सोचते सोचते उसने मोबाइल निकाला और अपने उस दोस्त को फोन लगाया जिससे सामान्य हालात में वो बात भी नहीं करता।
" कुछ जरुरी काम है , तुम्हारी मदद चाहिए , कल बात करूँगा", कहकर उसने फोन जेब में रखा और कल की योजना उसके दिमाग में चलने लगी।
इसी उधेड़ बुन में कब घर पहुँच गया, पता ही नहीं चला उसको। घर में घुसते ही उसकाकुत्ता दौड़ कर आया और उसके हाथ को चाटते हुए उसके ऊपर चढ़ने लगा। बहुत बार उसने उसको हटाया लेकिन वो उसके आस पास ही घूमता रहा। आखिरकार वो सोफे पर बैठा और कुत्ता उसके गोद में चढ़कर उसके मुँह को चाटने का प्रयास करने लगा।
कुछ मिनटों में ही उसका गुस्सा काफ़ूर हो चुका था, अब उसका मन प्रसन्न था और उसके दिमाग में प्यार उमड़ रहा था। उसे अंदर से कुछ ग्लानि महसूस होने लगी और उसने फोन उठाया और अपने दोस्त को कल के काम को रद्द होने का मैसेज भेज दिया।
अब उसे बहुत हल्का महसूस ह रहा था, कुत्ता अभी भी उसके गोद में खेल रहा था।

जिजीविषा--

" अरे , उस ग्रह का तो चित्र ही कुछ अलग रंग का दिख रहा है अब, पहले तो बिलकुल भूरा भूरा दिखता था सब ", एक प्राणी ने चिल्लाकर कहा।
" हाँ, अब तो इसका रंग हरा हो गया है, कैसे ये चमत्कार हो गया " दूसरा प्राणी भी आश्चर्यचकित था उस ग्रह को देखते हुए।
इस ग्रह के सभी प्राणी भागते हुए अपने गुरु के द्वार पर पहुंचे और घबराये हुए शब्दों में उन्होंने सारा हाल सुना डाला।
" अब क्या होगा गुरुदेव, अब हमारा उस ग्रह पर बसने का स्वप्न कैसे पूरा होगा, अब तो लगता है वहाँ जीवन के लक्षण फिर पनप रहे हैं "।
" दरअसल उस ग्रह का जो मानव नामका दोपाया प्राणी है, वो हमारे समझ के बाहर है। हमें लगा था कि वो अपना विनाश करके ही मानेगा लेकिन उसी में से कुछ लोगों की जिजीविषा ने वापस हरियाली पैदा कर दी। अब हमें कुछ और सहस्त्र वर्ष इंतज़ार करना होगा वहाँ बसने के लिए ", गुरूजी ने गम्भीरता से कहा|
इस ग्रह के प्राणी हैरान परेशान अपने अपने कार्य में लग गए और गुरूजी वापस कुछ नयी तरकीब सोचने में व्यस्त हो गए।

मानवता--

ख़बर जंगल की आग की तरह फ़ैल गयी और कुछ ही देर में लोगों की भीड़ जुट गयी। कुछ घटनाओँ के चलते कुछ दिनों से माहौल तनावपूर्ण चल रहा था। लोग क़यास लगा रहे थे, कोई इस धर्म का बताता, कोई उस धर्म का। सड़क के किनारे बेहोश पड़े उस आदमी के बदन से खून बहकर सूख चला था लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं थी कि उसे उठाकर हस्पताल पहुँचाये।
" ये हमारे मज़हब पर हो रहे हमले का ताज़ा उदाहरण है, हम चुप नहीं बैठेंगे ", एक नेतानुमा सज्जन ने माहौल का रुख भाँप कर तीर चलाया।
" नहीं, ये उस धर्म के लोगों का काम है और उन्होंने अपनी आदत के अनुसार ये कायराना हरक़त की है", दूसरे सज्जन की आवाज़ थोड़ी और तेज थी।
थोड़ी देर में ही आवाज़ें शोर में और फिर ललकार में बदल गयीं। उस घायल को होश आ गया था लेकिन उसकी पानी पिलाने की विनती को सुनने वाला किसी भी मज़हब का इंसान वहाँ नहीं था।

बदलते रिश्ते--

हर मिनट पर उसके विचार बदल रहे थे, कभी बेहद प्यार आता तो कभी नफरत सी होने लगती। था तो वो उसके शरीर का हिस्सा ही और अपने ही बच्चे से वो नफ़रत कैसे कर सकती थी। इन सबसे बेखबर बच्चा बगल में लेटा हुआ था, अभी कुछ ही घंटे तो हुए थे उसे इस दुनियाँ में आये हुए।
उसे वो काला दिन बार बार याद आने लगा जब उसकी अस्मत लूटी गयी थी। जब तक वो इस सदमे से बाहर निकलती, उसके गर्भ में ये बच्चा आ चुका था। सभी लोगों की राय इसे ख़त्म कर देने की थी लेकिन उसे लगा कि इसमें उस अजन्मे की क्या गलती है। उसके इस विचार का उसके सबसे अच्छे दोस्त ने जो अब उसका मंगेतर था, समर्थन किया था। बहुत वाह वाह हुई थी उसके दोस्त के फैसले की उस समय और कुछ दिन तक तो वो बराबर उसको हौसला देता रहा कि तुम्हारी या इस बच्चे की क्या गलती है इसमें, उसे इस दुनिया में आना ही चाहिए| वक़्त बीतता गया और उसे अब ये एहसास होने लगा था कि उसका मंगेतर अब बच्चे के जिक्र पर अक्सर खामोश रह जाया करता था| एकाध बार उसने पूछा भी लेकिन उसने बात टाल दिया, लेकिन फ़र्क़ साफ़ साफ़ दिख रहा था| वो भी समझ रही थी कि शुरू की वाह वाह अब अपना वज़न खो चुकी है और अब उसके मंगेतर को ये बच्चा बोझ लगने लगा है| अब उसे कोई एक रास्ता चुनना था, लेकिन दोनों ही रास्ते बेहद कठिन थे| और एक दिन उसे पता चल गया कि उसका मंगेतर किसी और लड़की के साथ घूम रहा है| शायद उसके नसीब में अकेली माँ बनना ही लिखा था|
अचानक बच्चे के रोने से उसका ध्यान टूटा और उसको उठाकर उसने अपने सीने से लगा लिया। जैसे जैसे बच्चे के गले से दूध की धार नीचे उतरने लगी, उसका ममत्व भी उसके नफ़रत पर भारी पड़ने लगा। अब उसने इस बच्चे के लिए अपनी जिंदगी अकेले जीने का फैसला ले लिए था|

स्टोरी-


खबर बहुत भयानक थी, लोग भूख के चलते कुछ भी खाने या कुछ नहीं खाने को मजबूर थे। चैनल प्रबन्धक ने उसे तुरंत वहाँ जाकर कुछ सनसनीखेज ख़बर लाने को कहा और उसके साथ कैमरा मैन और कुछ सहयोगी भी जाने को तैयार हो गए। सबने खाने पीने के लिए काफी सामान रख लिया था, वज़ह साफ़ थी कि पता नहीं वहां खाने को कुछ मिलेगा भी या नहीं। 
जैसे जैसे उनकी कार उस गाँव के नज़दीक पहुँच रही थी, वैसे वैसे उनको सिर्फ सूनी, धूल उड़ाती सड़कें, सूखे खेत और कहीं कहीं कुछ कमज़ोर पशु नज़र आ रहे थे। गाँव पहुंचकर उन्होंने घर घर जाकर लोगों से भूख और सूखे के बारे में पूछना शुरू किया। जितना उसने सोचा था उससे कहीं बहुत ज्यादा भयावह स्थिति थी वहाँ की, गाँव में सिर्फ महिलाएं और बच्चे ही बचे थे। अधिकांश मर्द गाँव छोड़कर रोज़गार की तलाश में बाहर चले गए थे। गर्मी बहुत थी और वो बार बार लायी हुई मिनरल वाटर की बोतल खाली कर रही थी। लगभग तीन घंटे में उसने काफी लोगों से बातचीत की और एक बढ़िया स्टोरी तैयार थी। उसने फोन निकाला और हँसते हुए बॉस को भूख के सजीव चित्रण की स्टोरी के बारे में बताया। अब उन सब को भी भूख लग चुकी थी और उन्होंने एक पेड़ के नीचे चटाई बिछायी और खाने का सामान निकालकर बैठ गए। 
अभी उसने खाने के लिए पहला कौर उठाया ही था कि उसकी नज़र थोड़ी दूर खड़े कुछ बच्चों पर पड़ी। उनका मुँह खुला हुआ था और लग रहा था जैसे वो सब उसके साथ साथ खाना खाने वाले थे। उसने एक कौर मुँह में डाला और देखा कि बच्चे भी उसके साथ मुँह चला रहे थे, मानो वो सब भी दूर से ही खाने का स्वाद लेने का प्रयास कर रहे थे। जिंदगी में पहली बार उसे खाना इतना मुश्किल लग रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे वो उन बच्चों का निवाला छीन कर खा रही हो। एक बार और उसने उन बच्चों की तरफ देखा और फिर उसने अपना सारा खाने का सामान उठाया और बच्चों की तरफ चल दी। 
बच्चों को पास बैठाकर उसने उन्हें खिलाना शुरू कर दिया| बच्चे इतनी प्रसन्नता से खाना खा रहे थे कि उसकी आत्मा भी तृप्त हो गयी। ये देखकर उसके बाकी साथी भी अब अपना खाना लेकर बच्चों की तरफ आ गए। एक तरफ बच्चे भर पेट खाना खा रहे थे , दूसरी तरफ ये सब उनके कैमरे में दर्ज हो रहा था। अब ये स्टोरी उसे पूरे समाज को दिखानी थी और बताना था कि ऐसे क्षेत्र में सिर्फ स्टोरी बनाने के लिए नहीं , बल्कि उन्हें मदद पहुँचाने के लिए जाने की जरुरत है। आज उसे पहली बार अपने प्रोफेशन पर गर्व हो रहा था और साथ ही साथ उसकी पूरी टीम को ज्यादा खाना और पैसा साथ नहीं लाने का अफ़सोस हो रहा था।