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Thursday, December 10, 2015

ईमान--

" इस बार पटाखे कम लाये थे आप, बहुत थोड़े से बचे हैं कल के लिए", बेटे ने शिकायती लहज़े में कहा और पटाखे वहीँ छोड़ कर घर के अंदर चला गया| रात बहुत होने से दीवाली की रौनक कम होने लगी थी और मोहल्ले के बाकी लोग भी अब घरों में जाने लगे थे| उसने एक बार सोचा कि बचे हुए पटाखे अंदर रख दे, फिर ये सोचकर कि बरामदे में ही तो हैं, वहीँ छोड़ दिया| थोड़ी देर में सब सोने की तैयारी में लग गए|
अचानक उसे किसी के बरामदे में चलने की आवाज़ आई| धीरे से उसने पर्दा हटाया और बरामदे की धुँधली रौशनी में देखने की कोशिश करने लगा| थोड़ी देर में ही उसने उस बच्चे को पहचान लिया जो मोहल्ले के किनारे बने एक झोपड़े में अपनी माँ के साथ रहता था| वो कभी एक पटाखा उठाता, तो कभी दूसरा और फिर उनको रखकर तीसरा| शायद वो सोच नहीं पा रहा था कि कौन सा पटाखा ले और उसकी इस उधेड़बुन को वो अंदर से देख रहा था| लेकिन थोड़ी देर बाद ही वो लड़का बिना पटाखे लिए धीरे से चला गया|
कुछ देर सोच कर वो बाहर निकला और उसने सारे पटाखे इकठ्ठा किये| घर में रखी मिठाईयों को भी उसने निकाला और पटाखों के साथ रख दिया| सबेरे सबेरे ही ये सारी चीजें उस बच्चे के घर पर दे देगा ताकि आज तो उस बच्चे का ईमान बच गया, आगे कहीं टूट न जाए और फिर उसको किसी और घर के बरामदे में नहीं घुसना पड़े|

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