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Thursday, December 10, 2015

बदलते रिश्ते--

हर मिनट पर उसके विचार बदल रहे थे, कभी बेहद प्यार आता तो कभी नफरत सी होने लगती। था तो वो उसके शरीर का हिस्सा ही और अपने ही बच्चे से वो नफ़रत कैसे कर सकती थी। इन सबसे बेखबर बच्चा बगल में लेटा हुआ था, अभी कुछ ही घंटे तो हुए थे उसे इस दुनियाँ में आये हुए।
उसे वो काला दिन बार बार याद आने लगा जब उसकी अस्मत लूटी गयी थी। जब तक वो इस सदमे से बाहर निकलती, उसके गर्भ में ये बच्चा आ चुका था। सभी लोगों की राय इसे ख़त्म कर देने की थी लेकिन उसे लगा कि इसमें उस अजन्मे की क्या गलती है। उसके इस विचार का उसके सबसे अच्छे दोस्त ने जो अब उसका मंगेतर था, समर्थन किया था। बहुत वाह वाह हुई थी उसके दोस्त के फैसले की उस समय और कुछ दिन तक तो वो बराबर उसको हौसला देता रहा कि तुम्हारी या इस बच्चे की क्या गलती है इसमें, उसे इस दुनिया में आना ही चाहिए| वक़्त बीतता गया और उसे अब ये एहसास होने लगा था कि उसका मंगेतर अब बच्चे के जिक्र पर अक्सर खामोश रह जाया करता था| एकाध बार उसने पूछा भी लेकिन उसने बात टाल दिया, लेकिन फ़र्क़ साफ़ साफ़ दिख रहा था| वो भी समझ रही थी कि शुरू की वाह वाह अब अपना वज़न खो चुकी है और अब उसके मंगेतर को ये बच्चा बोझ लगने लगा है| अब उसे कोई एक रास्ता चुनना था, लेकिन दोनों ही रास्ते बेहद कठिन थे| और एक दिन उसे पता चल गया कि उसका मंगेतर किसी और लड़की के साथ घूम रहा है| शायद उसके नसीब में अकेली माँ बनना ही लिखा था|
अचानक बच्चे के रोने से उसका ध्यान टूटा और उसको उठाकर उसने अपने सीने से लगा लिया। जैसे जैसे बच्चे के गले से दूध की धार नीचे उतरने लगी, उसका ममत्व भी उसके नफ़रत पर भारी पड़ने लगा। अब उसने इस बच्चे के लिए अपनी जिंदगी अकेले जीने का फैसला ले लिए था|

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