Translate

Thursday, December 10, 2015

आँच--कहानी

बहुत बेचैनी से घूम रहे थे नेताजी घर में , लगातार फोन लगा रहे थे बाहर रहने वाली बेटी को लेकिन फोन कवरेज क्षेत्र के बाहर बता रहा था| दंगों की आंच उस प्रदेश में भी पहुँच गयी थी और उनकी बेटी जहाँ रहती थी वो क्षेत्र भी लपेट में आ गया था| अचानक फोन बजा , लपक कर देखा उन्होंने की शायद बेटी का हो , लेकिन फोन उनके पार्टी के कार्यकर्ता का था| 
" बधाई हो नेताजी , माहौल बिलकुल अपने पक्ष में बन गया है| दूसरे प्रदेशों में भी दंगे फ़ैल रहे हैं , अब कोई चिंता नहीं है| सरकार तो अपनी ही बनेगी इस बार ", बहुत उत्साहित होकर कार्यकर्ता बोल रहा था लेकिन नेताजी की आवाज़ जैसे बर्फ की तरह ठंडी थी| बिना कुछ कहे जल्दी से उन्होंने फोन काटा और फिर बेटी को फोन लगाने लगे| 
जैसे जैसे बेटी का फोन कवरेज क्षेत्र से बाहर बता रहा था , वैसे वैसे उनका कल का उत्साह खुद उनको ही काटने दौड़ रहा था| हार कर उन्होंने उस क्षेत्र के अपने पार्टी के बहुत करीबी साथी को फोन लगाया और उसको बताया| लगभग गिड़गिड़ाने के अंदाज़ में उन्होंने उससे कहा कि जैसे भी हो वो जाकर वहां से बेटी को सुरक्षित निकाले| सामने से आश्वासन तो मिला लेकिन पता नहीं क्यों उनको उस पर भरोसा करने का मन नहीं किया| आखिर खुद भी तो सबको कितने आश्वासन देते रहते थे लेकिन अमल कितनो पर किया , ये उनको भलीभांति पता था| 
अचानक फोन बजा , बेटी का नंबर था| बेटी कुछ बोले उसके पहले ही वो चिल्लाने लगे " तुम ठीक तो हो बेटी , कहाँ थी तुम्हारा फोन नहीं लग रहा था "|
" स्थिति ठीक नहीं है पापा , मैं निकलने की कोशिश कर रही हूँ यहाँ से| जैसे ही स्टेशन पहुँचूंगी , आपको फोन कर दूंगी "| 
" देखो संभल कर निकलना , अपना ख्याल रखना ", और भी जाने क्या क्या बोल रहे थे कि उधर से हल्ला सुनाई दिया और फिर फोन कट गया| वो वापस फोन लगाने लगे , घंटी बज रही थी लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आ रहा था| वापस उन्होंने अपने करीबी को फोन लगाया और उसे बेटी से हुई बात बताई , उसने फिर से कहा कि स्थिति तो गड़बड़ है लेकिन वो प्रयास कर रहा है|
अब वो फोन को हाँथ में लेकर सोफे पर धंस गए , मन में विचारों का तूफ़ान चल रहा था| उन्होंने सोचा भी नहीं था कि उनकी लगायी आग की आँच खुद उन तक पहुँच जाएगी| पत्नी के नहीं रहने पर बेटी ही उनका सहारा थी , बहुत चाहते थे वो उसको , इसीलिए उसके कहने पर उसे दूसरे प्रदेश भेज दिया था पढ़ाई के लिए| एक बार फिर फोन लगाया , जवाब नहीं मिलने पर बेचैनी में उठे और किनारे के कमरे में बने पूजा घर में चले गए| 
पता नहीं कितनी देर तक बैठे रहे वो उन मूर्तियों के सामने , मन में बस एक ही प्रार्थना कि बेटी सही सलामत घर आ जाये| दंगों में फंसे लोगों का हश्र पता था उनको और अगर लड़की हो तो , सोच कर ही उनका मन काँप उठता था| मन ही मन उन्होंने अपने किये गुनाहों की सजा मांगी उपरवाले से और भविष्य में ऐसी किसी भी घटना का हिस्सा बनने से तौबा कर ली| 
लगभग दो घंटे बीत चुके थे बेटी से बात किये , लगातार फोन लगा रहे थे लेकिन अब उसका फोन स्विच ऑफ बता रहा था| अपने फोन पर आते किसी भी कार्यकर्ता के कॉल को वो ले नहीं रहे थे| बस एक ही प्रार्थना कर रहे थे , बेटी सुरक्षित निकल जाए और घर आ जाये| इस बार घंटी बजी तो उन्होंने देखा , किसी लैंडलाइन से फोन था| डरते डरते उठाया और कुछ कहते उसके पहले ही उधर से बेटी की आवाज़ आई " पापा , मैं अपने दोस्त के घर पहुँच गयी हूँ , मेरा फोन डिस्चार्ज हो गया था इसलिए उसके लैंडलाइन से आपको कॉल किया| अब घबराने की कोई बात नहीं है , जैसे ही माहौल ठीक होगा मैं आ जाउंगी , आप बेफिक्र रहिये "| 
उनकी आँखों से अश्रुधार बह निकले , रुंधे गले से बस इतना ही कह पाये " कोई जल्दी नहीं है आने की , जब मैं बताऊँ तभी निकलना वहां से ", और सोफे पर ढह गए| सामने टी वी पर जगह जगह दंगे भड़कने की खबर आ रही थी| उन्होंने एक बार फिर भगवान को धन्यवाद दिया और जूते पहन कर बाहर निकल आए| अब किसी भी हालत में अपने क्षेत्र की स्थिति को सुधारना था उनको , आखिर अपने किये गुनाहों के लिए इससे बड़ा प्रायश्चित और क्या हो सकता था|

No comments:

Post a Comment