उसका दिल बुरी तरह धड़क रहा था , अब समय हो गया था डिलीवरी का। नर्स ने उसे सहारा देकर उठाया और अंदर के कमरे में ले जाने लगी। वैसे ये पहला अवसर नहीं था हस्पताल के इस कमरे में आने का , लेकिन इस बार वज़ह कुछ और थी।
खो गयी वो पुराने दिनों में , छोटा सा परिवार था उसका , वो , पति और दो बच्चे , किसी तरह दो वक़्त की रोटी मिल जाती थी। एक दिन वो हस्पताल आई थी तभी उसे पता चला कि किसी को अपना बच्चा पैदा करने के लिए दूसरे की कोख की जरुरत है। घर आते समय पुरे रास्ते उसके मन में ये विचार झंझावात मचाता रहा लेकिन किसी निष्कर्ष पर पहुंचना आसान नहीं था उसके लिए| घर पहुँच कर डरते डरते उसने पति को इस खबर के बारे में बताया और उसकी राय जाननी चाही| ये फैसला बहुत कठिन था , अपने रिश्तेदारों और समाज की चिंता अपनी जगह थी लेकिन उससे मिलने वाला धन बहुत पर्याप्त था उनके परिवार के भविष्य के लिए। पति ने भी कुछ सोच विचार कर हामी भर दी और उसने भी अपने आप को तैयार कर लिया इसके लिए| उसने हस्पताल जाकर अपनी सहमति बता दी और वापस आ गयी|
अगले कुछ हफ्ते तमाम क़ानूनी कार्यवाही में बीत गए और फिर इस सर्रोगेसी की शुरुआत हुई। उस दूसरे परिवार की तरफ से शुरू में ही थोड़ा धन दे दिया गया था जिससे उसके खान पान का ध्यान रखा जा सके। इस पैसे से उसके पूरे परिवार का भी खर्च सुचारू रूप से चलने लगा था।
जैसे जैसे बच्चा पेट में बढ़ता गया , उसके अंदर मातृत्व पनपने लगा। उसे कोई फ़र्क़ नहीं समझ आता था अपने दो बच्चों के गर्भ में पलने और इस बच्चे के पलने में। कभी कभी तो वो भूल ही जाती थी कि ये बच्चा उसका नहीं है लेकिन जैसे ही फल वगैरह खाती थी , उसे याद आ जाता था। बीच बीच में उस परिवार से कोई न कोई आ जाता था उसे और होने वाले बच्चे को देखने के लिए और तब उसे कुछ बेचैनी सी होने लगती थी। धीरे धीरे समय बीतता गया और आखिरी महीना भी आ गया , अब उसके पेट में होने वाली हलचल उसे बहुत प्यारी लगने लगी थी। उसके पेट में ही पल रहा है बच्चा लेकिन वो उसका नहीं है , इस बात को जज्ब करना जैसे अब उसके लिए मुश्किल होता जा रहा था। जब वो कमज़ोर पड़ती थी तब उसका पति उसे अपने परिवार की खुशियों की दुहाई देकर समझाने की कोशिश करता। वो भी अपने परिवार की सुधरती स्थिति को देखकर अपने को समझाने की पूरी कोशिश करती लेकिन तभी उसके पेट में मचती हलचल उसे विचलित कर देती। कभी उसे अपनी ख़ुशी , अपना मातृत्व भारी पड़ता दिखता तो कभी अपने परिवार की खुशियाँ मातृत्व पर।
आज वो समय भी आ गया था जब उसके गर्भ में पलता बच्चा बाहर की दुनियाँ में आने के लिए तैयार था। अंदर प्रसव कक्ष में भी लेटने के बाद उसके दिमाग में यही चल रहा था कि जब ये बच्चा चला जायेगा तो वो कैसे रहेगी , आखिर ९ महीने अपने कोख में ही तो पाला था उसको। वहाँ बाहर उसके होने वाले माता पिता पूरी तैयारी कर के आये थे कि बच्चे के पैदा होने के बाद बचे पैसों का भुगतान करके वो बच्चे को लेकर चले जायेंगे। आधा घंटा बीता और नर्स ने बच्चा उसके पास रख दिया। एकदम से उसकी ममता उमड़ पड़ी और उसने बच्चे को सीने से लगा लिया , अब उसकी बच्चे को लौटाने की इच्छा कमजोर पड़ती जा रही थी।
इतने में उसका पति और दोनों बच्चे अंदर आ गए , और उसने गौर से अपने बच्चों के कपड़ों को देखा। कितने अच्छे लग रहे थे दोनों इन कपड़ों में लेकिन कुछ महीनों पहले ये तो सिर्फ सपना ही था उसके लिए। एक बार और उसने अपने नए जन्मे बच्चे को देखा और फिर उसने अपने परिवार की खुशियों के लिए उसने अपनी ममता को क़ुर्बान करने का फैसला कर लिया| इस क़ुर्बानी की गवाही उसके आँख के किनारों से बहे आँसू दे रहे थे|
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