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Thursday, December 10, 2015

तृप्ति--

धरा बहुत उदास थी , आकाश से उसकी उदासी देखी नहीं गयी | उसने धरा से उदासी का कारण पूछा तो धरा ने अपने प्यासे और दरार भरे शरीर की ओर इशारा कर दिया और फिर से मायूस हो गयी |
" इसमें तुम्हारा क्या दोष है , अब अगर इंसान इतना भी नहीं समझता तो तुम क्या कर सकती हो "| 
" मुझे दुःख इस बात का नहीं है कि इंसान प्रगति की आड़ में अपने लिए अन्धकार ला रहा है , दुःख तो होता है मासूम बच्चों को देखकर | कैसे बैठा पाएंगे वो सामंजस्य आने वाली विषम परिस्थिति से ?" 
तभी आकाश की नज़र एक नन्हे से बच्चे पर पड़ी जो धरा में बने दरारों में मिटटी भरने की कोशिश कर रहा था | वो मुस्कुराया और धरा पर पानी बरसाने लगा | धीरे धीरे धरा को तृप्ति की अनुभूति होने लगी |

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