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Thursday, December 10, 2015

उचित फैसला--

पूरे मोहल्ले में खुसुर फुसुर हो रही थी , जितनी मुँह , उतनी बातें । आज तीसरा दिन था और बेटी घर नहीं लौटी थी , किस किस को समझाते । घर में वो तो बुरी तरह तड़प रही थी लेकिन उसके पिता का अभी भी गुस्सा ठंढा नहीं हुआ था । बस एक ही रट लगाये हुए थे कि बेटी ने उनकी इज़्ज़त का ख्याल नहीं रखा और उनके मना करने पर भी अँकुर के साथ चली गयी । 
अचानक फोन की घंटी बजी और उसने दौड़ कर उठाया , उधर से बेटी की ही आवाज़ थी । " माँ , मैं ठीक हूँ और यहाँ वर्किंग वूमेन हॉस्टल में रह रही हूँ । मेरी कोई इच्छा नहीं थी कि मैं पापा के विरुद्ध जाकर शादी करूँ , लेकिन मैं अँकुर के बगैर भी नहीं रह सकती थी । इसलिए मैंने यहाँ पर एक जॉब ढूँढ ली है और फिलहाल यहीं रहूँगी । अँकुर भी अपने घर चला गया है और वो मेरे फैसले से सहमत है । अब वक़्त के साथ शायद पापा बदल जाएँ या हम अपने को बदल लें, बस हम परिस्थितियाँ ठीक होने का इंतज़ार करेंगे "।
कुछ देर तक तो वो फोन हाँथ में लिए खड़ी रही , फिर उसे बेटी की समझदारी पर फक़्र होने लगा । उसके जेहन में बेटी की जिंदगी में खुशियों के दीप जगमगाने की उम्मीद पुख्ता हो गयी ।

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