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Thursday, December 28, 2017

जड़ों की ओर--लघुकथा

उसने उठने के बाद अपने फोन को चेक किया, कोई मिस्ड काल या मैसेज नहीं था| मन फिर से उदासी के भंवर में गोते लगाने लगा, पता नहीं कितने दिन और ऐसे ही बिताना पड़ेगा| वैसे दीदी ने तो कहा था कि बाबा भी तुम्हें उतना ही याद करते हैं जितना तुम करते हो, लेकिन उसे अपनी तरफ से कहने की हिम्मत नहीं थी| आखिर पिछले कुछ महीनों में उसने बाबा की कई फोन कॉल्स को लिया ही नहीं था| लेकिन अब गुस्सा शांत हो रहा था और सबसे बड़ी चीज थी गाँव छोड़ते समय माँ का उदास चेहरा, जो उसे अब बेतरह साल रहा था|
"तुम्हारे साथ के पढ़े सभी लड़के कहीं न कहीं नौकरी कर रहे हैं लेकिन तुम क्यों गांव पर ही रहना चाहते हो? इस खेती में कुछ नहीं होगा"| बाबा के इस सवाल का जवाब देने की उसने कई बार कोशिश की लेकिन उन्होंने सुनने से इंकार कर दिया| बाबा को शायद अपना अतीत दिखता था और उसके गांव में ही रहकर कुछ करने की इच्छा उनको छलावा ही लगती थी|
"तुझे पालने में कितनी दिक्कते हुई हैं, तू चाहता है कि तेरे भी बाल बच्चे उसी तरह पलें| हमारी चिंता का बहाना बनाकर यहाँ मत रुक, जाकर कोई अच्छी भली नौकरी ढूंढ़ और फिर अपनी गृहस्थी बसा", बाबा ने अपना फैसला सुना दिया था| आखिर क्यों वह गांव पर ही रहकर कुछ नहीं कर सकता, उसे समझ नहीं आता था|
उस दिन सुबह उठते ही बाबा ने टोक दिया तो उसने अपना आपा खो दिया "आप यही चाहते हैं न कि मैं आपकी नज़रों से दूर हो जाऊँ| ठीक है, आज ही मैं निकल जाऊँगा और फिर वापस नहीं आऊँगा"| और वह उस दिन निकल गया लेकिन बाबा उसके सामने नहीं आये, शायद उसके सामने अपने आप को कमजोर नहीं करना चाहते थे|
"अब तो तू कुछ करने लगा है, एक बार गांव जाकर माँ बाबा को देख आ", दीदी के फोन ने उसे अपनी हिचक तोड़ने पर मजबूर कर दिया | अब उससे रहा नहीं गया और उसने बाबा को फोन लगा ही दिया| बाबा के फोन पर बजती हर घंटी जैसे उसे उनके पास, बहुत पास लेती जा रही थी| 

Friday, December 15, 2017

पिंजरा--लघुकथा

जैसे ही आशिया घर में घुसी उसे चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ आयी. चारो तरफ देखते हुए उसकी नज़र किनारे मेज पर रखे एक पिंजरे पर पड़ी जिसमें कई सारे रंगीन पक्षी कूद फांद कर रहे थे. उसने उछलते हुए पिंजरे की तरफ रुख किया और जब तक वह पिंजरे के पास पहुंचती, सामने से अब्बू आते दिखे.
"कितने प्यारे पक्षी हैं न आशिया, तुम्हारे लिए ही लाये हैं मैंने", अब्बू ने उसकी तरफ मुस्कुराते हुए देखा.
आशिया ने हँसते हुए अब्बू को शुक्रिया कहा और पिंजरे के पास खड़ी हो गयी. एक से एक खूबसूरत और प्यारे पक्षी, उसे लगा जैसे सारे जहाँ की खुशियां उसे मिल गयी हो. 
वह खड़ी खड़ी उनको देखकर प्रसन्न हो रही थी कि उसके कानों में अब्बू की आवाज़ आयी "इतनी देर लगती है चाय लाने में, किसी भी काम को तो ठीक से किया करो".
उसने पलट कर देखा, अम्मी मायूस सी चाय का प्याला लेकर खड़ी थीं. कल रात की बात भी उसे याद आ गयी जब अब्बू ने खाने के लिए अम्मी को बेतरह डांटा था. अम्मी हमेशा की तरह चुपचाप प्याली रखकर वापस जाने लगीं. जब से उसे याद था, कभी भी अम्मी ने अब्बू की किसी बात का विरोध नहीं किया था और उनकी हर फटकार को वह चुपचाप सह लेती थीं. एक बार उसने कहा भी था कि आप ये सब चुपचाप क्यूँ सह लेती हैं तो अम्मी ने फीकी हंसी हँसते हुए बात टाल दी थी.
उसने एक नज़र वापस पिंजरे में फड़फड़ा रही चिड़ियों को देखा और पिंजरा उठाकर बाहर निकल गयी. पिंजरे से चिड़ियों को उड़ाते हुए उसके दिमाग में अम्मी का मुस्कुराता चेहरा तैर रहा था.

Thursday, November 30, 2017

नयी मम्मी--लघुकथा

लक्ष्मी हतप्रभ खड़ी थी, उसे अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हो रहा था| आज तीसरा दिन था और अधिकांश रिश्तेदार जा चुके थे| उसके कमरे में आयी उस लड़की से उसने ऐसे ही पूछ लिया था"तुम किसकी लड़की हो?
पहले तो वह लड़की चुप रही और लक्ष्मी को अजीब सी निगाहों से देखती रही लेकिन जब दुबारा उसने पूछा तो उस लड़की ने जवाब में सवाल कर दिया "तुम हमारी नयी मम्मी हो ना?
इस बात के लिए वह बिलकुल तैयार नहीं थी, उसे इतना तो पता था कि उसके पति की यह दूसरी शादी है| लेकिन उसे यह नहीं बताया गया था कि उसके एक बेटी भी है| अभी वह इन्हीं सवालों से जूझ रही थी कि उस बच्ची ने फिर से एक सवाल किया "तुम हमें मारोगी नहीं ना, हम बिलकुल परेशान नहीं करेंगे? रानी की नयी मम्मी उसे बहुत मारती है"|
उसके सवाल ने उसे एक झटका सा दे दिया, उसे अपना घर याद आ गया| उसकी मम्मी की मौत के बाद आयी नयी मम्मी ने उसको हर कदम पर जलील किया था और यह शादी भी उसी की वजह से हुई थी| अब उसकी आँखों के सामने उसके पति की तस्वीर, जिस पर उसे बेहद क्रोध आया था, धुंधलाने लगी और उस बच्ची के चेहरे में उसे अपना अक्स नजर आने लगा|
बच्ची ने जब देखा कि उसे कोई जवाब नहीं मिल रहा है तो वह चुपचाप बाहर की तरफ जाने लगी| लक्ष्मी झटके से उठी और दौड़ कर उसने उस बच्ची को अपने सीने से लगा लिया और उसे चूमते हुए बोली "तुम मुझे मम्मी ही कहना बेटी, नयी मम्मी नहीं"|  

Tuesday, November 28, 2017

समय-- लघुकथा

सब कुछ जैसे एक फिल्म की तरह उनके जेहन में घूम रहा था, आखिर ऐसा क्यूँ हो गया| शायद उनकी परवरिश में ही कोई खोट रह गयी हो, बुझे मन से अपने आप को बस यही समझा पाए मोहसिन| एक बार फिर उन्होंने अखबार के पन्ने पर गौर से देखा, लेकिन वहां रज्जब का ही नाम लिखा हुआ था| रशीदा तो जैसे काठ हो गयी थी, लोगों की नज़रों का सामना करने की उसकी हिम्मत नहीं बची थी| 
बहुत लाड़ से पाला था उन दोनों ने रज्जब को, यहाँ तक कि यूनिवर्सिटी में भी भेजा| उसकी बातें वैसे तो बहुत अच्छी लगती थीं उनको लेकिन कभी कभी थोड़ा डर भी लगता था| खासकर जब वह अपने ही धर्म के गुरुओं की बातों की धज्जियाँ उड़ाने लगता था| कई बार उन्होंने उसे समझाया भी कि अपने विचार तो ठीक हैं लेकिन इस तरह उनको व्यक्त करना लोगों को शायद नागवार गुजरेगा|
"देखिये अब्बू, मैं उनमे से नहीं हूँ जो इनके जाहिलपन को बर्दास्त करूँ| हमें सीख देते हैं कि मजहब की तालीम लो और उसे आगे बढ़ाओ, लेकिन खुद इनके बच्चे बाहर देशों में पढ़ते हैं और इसके लिए कोई इनको नहीं पूछता"|
"ठीक है, तू मत सुन इनकी बात और जो ठीक लगता है वैसी तालीम ले| हमने तो तुम्हें कभी मना नहीं किया इसके लिए, फिर क्यूँ बेकार में इनकी नज़र में चढ़ता है", मोहसिन ने उसको समझाया|
"दरअसल ये लोग चाहते ही नहीं हैं कि अपनी कौम पढ़े लिखे, इसलिए बस मज़हब और डर की बात करते रहते हैं लोगों से| इनका एक ही जवाब है अब्बू, अपने आप को शिक्षित करना और इनके फैलाये भ्रम के जाल को तोड़ना", रज्जब अपनी दलील रखता| मोहसिन को कभी कभी थोड़ी घबराहट भी होती लेकिन फिर वह रज्जब के आत्मविश्वास से वह अपने आप को तसल्ली दे देते| 
रज्जब फिर भी वही करता जो उन धर्म के ठेकेदारों को बुरा लगता| युनिवर्सिटी से लौटने के बाद तो जैसे वह उनके पीछे ही पड़ गया था| अपने मोहल्ले के लोगों को उसने धीरे धीरे समझाना शुरू किया और लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करता रहा| मोहसिन रोज खुदा से उसकी सलामती के लिए दुआ करते और साथ साथ उसे भी समझाते रहते| 
सुबह की खबर ने तो उनको जैसे तोड़ के रख दिया, रज्जब को धार्मिक उन्माद फैलाने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया था| 

Tuesday, October 17, 2017

कार की स्पीड बहुत ज्यादा थी, इतनी बेताबी तो उसे इधर कई महीनों में नहीं हुई थी जितनी आज थी| कई महीने बाद आज गांव जा रहा था और त्यौहार नज़दीक था तो बहुत सारी चीजें भी उसने खरीद रखी थीं| परिवार कल ही गांव चला गया था, दरअसल इस बार पिताजी ने इस तरह से बुलाया था कि वह ना नहीं कर पाया|
"अब तो चला चली का बेला आ गया है, इस बार घर के पास भी हो और छुट्टी भी है| अगर हो सके तो इस बार का त्यौहार हमारे साथ ही मना लो", पिताजी के शब्दों ने जैसे उसे अंदर तक भेद दिया था|
"अरे पिताजी, आप ऐसी बात क्यों कहते हैं, हम तो आपके साथ ही त्यौहार मनाएंगे इस बार| और चली चला की बात मत कीजिये, अभी तो आपको नाती की शादी भी देखनी है", उसने जैसे अपने आप को दिलासा देते हुए कहा|
लगभग बीस साल तो हो ही गए थे उसे अपने गांव से गए, शुरू में नौकरी पास में ही थी तो शादी के पहले तो वह गांव से ही आता जाता था| फिर शादी हुई और उसके कुछ महीने बाद माँ ने ही उसे जबरदस्ती शहर की राह पकड़ा दी "अरे मेरी बहू शहर से है और उसे यहाँ दिक्कत होती है| वह कहती नहीं है लेकिन मुझे तो दिखता है सब, तू अब शहर में ही एक कमरा लेकर रह| लेकिन यहाँ भी आता जाते रहना, बाबूजी तुमको देखते हैं तो उनकी उम्र बढ़ जाती है", माँ ने समझाते हुए कहा था|
कुछ दिन के ना नुकुर के बाद वह शहर चला गया, पत्नी भी बहुत तैयार नहीं थी माँ पिताजी को अकेले छोड़ने के लिए| लेकिन माँ ने कहा कि तुम लोग हर हफ्ते आते रहना तो वह मान गयी| लेकिन शहर जाने के कुछ ही महीने के अंदर उसका तबादला बहुत दूर हो गया और फिर साल में एकाध बार ही आना होता था| माँ पिताजी बीच बीच में आते रहते थे लेकिन उनका मन तो गांव में ही रमा रहता इसलिए जल्द ही वापस चले जाते| दोनों बच्चों के समय तो माँ खूब समय साथ रही और ऐसा लगा कि अब शायद ही वापस जाए| लेकिन पिताजी को होने वाली असुविधा के चलते वह भी गांव चली गयी|
अब सड़क थोड़ी खराब हो चली थी तो उसकी स्पीड भी कम हो गयी, गांव अब कुछ ही दूर रह गया था| अचानक उसने तेजी से ब्रेक लगाया, सामने एक बुजुर्ग साइकिल लेकर सड़क पर गिर पड़े थे| ब्रेक लगाते ही कार धुंए का गुबार उड़ाते रुक गयी, वह कार से बाहर निकला और बुजुर्ग को उठाने के लिए झुका| जैसे ही उसकी नजर उनपर पड़ी, वह दंग रह गया, यह तो सजीवन काका हैं| हाथ का सहारा देकर उसने उनको सड़क के किनारे बैठाया और फिर उनकी साइकिल किनारे खड़ी कर दी|
"अरे काका, आप इस तरह साइकिल से क्यों घूम रहे हैं, मैं पानी लाता हूँ", कहते हुए उसने कार से पानी और छोटी कोल्ड ड्रिंक की बोतल निकाली और काका को देने लगा| काका ने उसे मिचमिचाती आँखों से देखा और पहचान नहीं पाने के चलते पूछ बैठे "कौन हो बबुआ, हम पहचाने नहीं, अब कम दिखता है?
"काका मैं लखन, आपके घर तो कितनी बार खाया पिया है| लीजिये पहले पानी पीजिये, फिर मैं आपको घर तक ले चलता हूँ"|
"अरे लखना, कितना बड़ा हो गया है रे| इधर कभी मिला भी तो नहीं तो कैसे पहचानते", काका के चेहरे पर चमक आ गयी जो उसको उस धुंधलाती रौशनी में भी दिख गयी|
काका ने पानी के बोतल से कुछ घूंट पानी पिया और अपने कुर्ते से मुंह पोंछते हुए बोले "तू आज ही आ रहा है या पहले से आया है, मैं तुम्हारे घर जाने वाला था एक दो दिन में| अब तो तेरे बाऊ भी बहुत कमजोर हो गए हैं"|
काका के इतना बोलते ही उसे पिताजी की याद आ गयी और वह जल्दी से घर पहुँचने के लिए बेताब होने लगा| "चलो काका तुमको घर छोड़ दूँ फिर अपने घर जाऊँ", कहकर उसने काका को कार की तरफ ले चलना चाहा|
"लेकिन हमारी साइकिल कौन लाएगा, हम आराम से चला लेते हैं इसको| वो तो तुम्हारी गाड़ी देखे तो घबरा गए हम", काका ने थोड़ी चिंता से कहा|
इस बार दीवाली के दो दिन पहले गांव आ गए थे तो कुम्हारटोला की तरफ निकल गए शम्भू| याद भी नहीं था कि कितने साल बाद इस तरफ आये थे, एक तो गांव ही आना कम हो गया है और उसपर त्यौहार तो अब शहर में मनता है| अब बीवी बच्चे शहर में हैं तो त्यौहार तो वहीँ मनेगा, यही सच है|
उनको थोड़ा थोड़ा याद था रग्घू कुम्हार का घर , बचपन में कई बार यहाँ आकर पुरवा, सुराही और मटका ले गए थे| अंदाज से टोला में घुसने के बाद वह रग्घू के घर की तरफ चले, काफी बदलाव आ गया था वहां भी| कच्चे घर तो शायद ही दिखते थे, सब तरफ बस एक या दो कमरे के बिना प्लास्टर के घर और घरों के बाहर सस्ती प्लास्टिक वाली टूटी कुर्सी| चारो तरफ नजर घुमाने के बाद भी उनको कहीं चाक नजर नहीं आया और उसी को खोजते हुए वह रग्घू के घर पहुँच गए| दरअसल उसे घर पर पिताजी ने बता दिया था कि सिर्फ रग्घू ही अब दिए वगैरह बनाता है|

अपना चेहरा- लघुकथा

"सरकार, आज अगर एक बार देख लिया जाए तो हमका तसल्ली होइ जात", लच्छू की आवाज़ बहुत घबराई लग रही थी| उसने एक बार सर ऊपर उठाया और लच्छू को गौर से देखा, दोनों हाथ जोड़े हुए उसका चेहरा बेहद कातर लग रहा था|
"किसको देखना था लच्छू?, लच्छू कई बार किसी के लिए कह रहा था, इतना तो याद आया लेकिन किसके लिए कहा था, याद नहीं आया| कितनी बार तो टाल चुके हैं इसको, फिर भी!
"सरकार, पतोहू कई दिन से बीमार है और लड़का बाहर काम करत है, एक बार आप देख लेते तो ठीक हो जात", लच्छू की आवाज़ में अब थोड़ी उम्मीद जग गयी|
एकदम से उनके अंदर आग लग गयी, अब उनको लच्छू जैसे के घरवालों को देखना पड़ेगा, वह भी बिना पैसे| उनका चेहरा सख्त पड़ने लगा और वह जलती आँखों से लच्छू को फटकार कर भगाने वाले थे कि उनकी निगाह लच्छू की निगाह से मिली| एकदम से उनको लच्छू का चेहरा अपने जैसा लगने लगा और कल का वाक़या उनके जेहन में नाचने लगा|
"अरे सर, हम लोग हर काम नियम से करते हैं और बाकायदा टैक्स चुकाते हैं", इनकम टैक्स अधिकारी के सामने बैठे वह उसको लगभग गिड़गिड़ाने हुए समझाने का प्रयास कर रहे थे|
और वह झटके से उठ खड़े हुए "चलो लच्छू, देख लेते हैं| और दवा यही से ले लेना, मैं बोल दूंगा", कहते हुए उन्होंने लच्छू का कन्धा थपथपाया और बाहर निकल गए|

Wednesday, October 11, 2017

शुभ मुहूर्त--कहानी

इनक्यूबेटर के बाहर बैठी हुई रीती गौर से अपने बच्चे को देख रही थी, कभी कभी उसकी सांस तेज चलती तो कभी लगता जैसे रुक गयी हो. और बच्चे की उठती गिरती सांस के साथ साथ ही उसकी सांस भी कभी तेजी से चलने लगती तो कभी रुकने लगती. आज तीसरा दिन था और अभी और कितने दिन लगने वाले थे, डॉक्टर भी बता पाने में असमर्थ थी. घर पर सबने कहा कि कुछ देर जाकर आराम कर ले लेकिन वह हिलने को भी तैयार नहीं थी. कहीं न कहीं वह अपने आप को भी इसके लिए जिम्मेदार मान रही थी और कुछ न कहते हुए बस बच्चे के स्वस्थ होने का इंतज़ार कर रही थी.
उसके दिमाग में तीन दिन पहले की बात घूम रही थी, "आपकी डेट तो चार दिन पहले ही थी, इतना देर क्यों किया आपने?" डॉक्टर के चेहरे पर आश्चर्य के साथ साथ गुस्से के भी भाव थे. यह उसकी दूसरी डिलीवरी थी और इस सिलसिले में वह इतनी बार मिली थी कि डॉक्टर से अच्छी जान पहचान हो गयी थी.
"पहला बच्चा भी सिजेरियन था और इसको भी इसी तरह पैदा करना था, फिर भी आप लोग इतनी लापरवाही करते हैं, नर्स, जल्दी से ओ टी में ले चलो इनको", नाराजगी जाहिर करते हुए डॉक्टर बोली और कुर्सी से उठ खड़ी हुई. जल्दी जल्दी नर्स ने उसे स्ट्रेचर पर लिटाया और अंदर ले गयी. उसे डर तो पहले से ही लग रहा था, बच्चे का मूवमेंट कल से काफी कम था लेकिन उसे पता था कि आज के पहले घरवाले उसको डिलीवरी के लिए नहीं ले जाएंगे.
काफी पढ़ा लिखा परिवार था उसका, पति का भी अच्छा व्यवसाय था. खुद वह भी ग्रेजुएट थी, लेकिन घर में सास ससुर की काफी चलती थी और हर काम शुभ मुहूर्त और दिन को देखकर ही किया जाता था. कभी कभी वह इसके लिए पति को टोकती भी थी कि वह सास ससुर को समझाए, लेकिन पति भी कुछ तो अपने दब्बूपन और कुछ खुद इन चीजों पर विश्वास के चलते उलटे उसे ही समझा देता था.
"आज जो अपनी दुकान इतनी अच्छी चल रही है उसके लिए भी पापा ने शुभ मुहूर्त निकलवाया था. अपने चाचा को देखो, बिना मुहूर्त के दुकान खुलवाई और क्या हाल हुआ उनका?, पति के इन तर्कों का वह विरोध तो करना चाहती थी लेकिन फिर टाल जाती थी. अब पता तो उसको भी था कि मुहूर्त से ज्यादा महत्त्व ससुर जी के लगाए हुए रुपयों के थे जिसके चलते उनकी किसी बात को टालना पति के बस के बाहर था. वैसे भी चाचा ने दुकान में घटिया माल रखा था और दाम भी थोड़ा ज्यादा लेते थे तो दुकान का यह हाल होना ही था, लेकिन उसकी बात को सुनने वाला कौन था.
पिछले बच्चे के समय ही उसने विरोध किया था, जब नामकरण के लिए बाबाजी को बुलाया गया था.
"घर में बच्चे के दादा दादी हैं तो बच्चे का नाम कोई बाहरी क्यों रखेगा?, उसने अपनी बात पति के आगे रखी थी.
"अरे बाबाजी भी हमारे बुजुर्ग ही हैं, हर शुभ काम में उनसे राय लिया ही जाता है", पति ने उसे समझा दिया था.
वह सहमत तो नहीं थी लेकिन उसने भी अपना विरोध दर्शाने के लिए बच्चे का घर में पुकारने का नाम अपनी मर्जी से रख लिया और फिर धीरे धीरे सभी लोग बच्चे को उसी नाम से बुलाने लगे. लेकिन कभी भी उसने अपने सास ससुर से सीधे इन चीजों के बारे में बात करना उचित नहीं समझा, कहीं न कहीं उसे डर भी था कि कहीं बात का बतंगड़ न बन जाए.
इस डिलीवरी के समय बाबाजी का तो कोई चक्कर नहीं था जो कि शायद लगातार बाबाओं के छप रहे किस्सों का असर था. लेकिन दिन बढ़िया ही हो इसी चक्कर में डिलीवरी तीन दिन आगे टाल दी गयी.
"अरे खंरवास में भी कोई शुभ काम होता है, तीन दिन बाद शुभ दिन शुरू हो रहे हैं, तब हो जायेगा. आखिर करवाना तो डॉक्टर को ही है", सास की बात को टाल पाना पति के बस में नहीं था.
"अब तीन दिन की ही तो बात है, देख लेते हैं. वार्ना कहीं कुछ उल्टा सीधा हो गया तो मुश्किल हो जाएगी", पति ने समझाते हुए कहा था.
उल्टा सीधा तो क्या होना था लेकिन इस बार बेटा ही हो, इसके लिए हर संभव उपाय किये जा रहे थे. भ्रूण परिक्षण बंद होने के चलते ससुर जी पहले से पता तो लगवा नहीं सकते थे. और पहली बेटी थी तो इस बार कुलदीपक ही पैदा होना चाहिए, अंदर से पति के मन में भी यही बात थी. सास तो दिन रात "पोते का मुंह देखकर ही संसार से जाना है" की रट लगाए रहती थी. और उसे भी इसमें कोई दिक्कत नहीं दिखती थी, आखिए एक बेटी थी ही और एक बेटा हो जाए तो शायद बेटे के लिए फिर से इस तकलीफ से नहीं गुजरना पड़े.
पिछले महीने भी डॉक्टर ने बताया था कि बच्चा एकदम ठीक है और समय पर इसकी डिलीवरी करवा देंगी. वह भी घरवालों के साथ काफी खुश थी, आखिर अपने कोख से जन्म दे रही थी. जैसे जैसे समय नजदीक आता गया, उसकी घबराहट थोड़ी बढ़ती गयी, लेकिन किसी भी अनिष्ट की आशंका नहीं थी उसके मन में. लेकिन उस दिन ओ टी में जाते समय डॉक्टर की बात सुनकर उसका बी पी थोड़ा असामान्य होने लगा था. डिलीवरी के बाद जब उसको होश आया तो बगल में बच्चे को नहीं देखकर वह सिहर गयी.
"नर्स मेरा बच्चा कहाँ है?, उसने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा. उसका मन किसी अनजानी आशंका से घबरा गया.
नर्स ने उसकी तरफ देखा और उलाहना देते हुए बोली "बेटा हुआ है तुमको लेकिन किसी ने मिठाई भी नहीं खिलाई मुझे".
बेटा हुआ है, सुनकर उसकी आँखों में ख़ुशी कौंध गयी. लेकिन फिर मेरे पास क्यों नहीं है, सोचकर उसने दुबारा नर्स से पूछा "लेकिन है कहाँ मेरा बेटा?
"अच्छा तुमको तो पता ही नहीं है, बहुत कमजोर हुआ था और उसको जॉन्डिस भी हो गया था. अभी इन्क्यूबेटर में रखा है, तीन चार दिन में ठीक हो जायेगा", नर्स ने तसल्ली देते हुए कहा.
उसको एक झटका लगा, इतने छोटे बच्चे को जॉन्डिस हो गया है, उस ए सी वाले कमरे में भी उसके चेहरे पर पसीना आ गया.
"मेरे घर से किसी को बुला दो प्लीज", उसने नर्स से विनती की. नर्स ने भी थोड़ा नाक चढ़ाते हुए बाहर जाकर आवाज लगायी और उसकी सास अंदर आयी.
"बेटा हुआ है लेकिन थोड़ा बीमार है इसलिए उसको शीशा में बंद करके रखे हैं", सास के चेहरे पर पोते का गर्व तो था लेकिन उसकी बीमारी से थोड़ी चिंतित भी थी.
"मैं कब देखूंगी उसको", उसने तुरंत ही सास से कहा. सास ने कुछ जवाब नहीं दिया और बाहर निकल गयी.
अचानक उसे लगा जैसे कि बच्चे ने उसे पुकारा हो और वह वर्तमान में लौटी. उसने बच्चे को गौर से देखा, उसकी साँसे काफी धीमे धीमे चल रही थीं. वह घबराकर एकदम से उठी और डॉक्टर को बुलाने चल दी. अभी भी कमजोरी बहुत थी और दर्द भी लेकिन बच्चे के आगे उसे यह सब महसूस भी नहीं हो रहा था.
"डॉक्टर जरा देखिये मेरे बच्चे को, उसकी सांस बहुत धीरे चल रही है", लगभग रोआँसी सूरत बनाये हुए उसने कहा.
डॉक्टर ने आकर देखा और कुछ और इंजेक्शन के लिए नर्स को बोलकर उसका कन्धा थपथपाते हुए निकल गयी. नर्स ने इंजेक्शन की तयारी शुरू की और वह फिर से सोच में डूब गयी. "कितनी लापरवाह हो तुम, इतनी देर करने से बच्चा एकदम सूख गया था और उसको जॉन्डिस ने जकड़ लिया है. इन्क्यूबेटर में रखा है, कोशिश कर रहे हैं कि जल्द ही स्वस्थ हो जाए और तुम उसे लेकर घर चली जाओ", डॉक्टर ने उसको कसके झिड़का था जब वह उसके पास आयी थी. वह डॉक्टर को चाह कर भी नहीं बता पायी कि यह लापरवाही नहीं, बल्कि शुभ मुहूर्त का चक्कर था.
पति भी इसी बीच आया और बच्चे को देखते हुए उसके पास बैठ गया. उसने पति की तरफ ध्यान भी नहीं दिया, उससे वह बहुत खफा थी. और पति को भी यह बात पता थी इसलिए वह भी उससे नजरें चुरा रहा था.
"एकदम ठीक हो जायेगा बच्चू, तुम फ़िक्र मत करो", उसको दिलासा देकर वह चला गया.
अब वह थी, हस्पताल का सन्नाटा था और उसके मन में चल रही विचारों की आँधी थी| रह रह के उसके मन में आ रहा था कि उसे कड़ाई से इसका विरोध करना चाहिए था. इन्ही सब में डूबता उतराते उसे एक झपकी आई और आंख खुली तो नजर तुरंत सामने बच्चे पर गयी. एक बार तो लगा जैसे उसकी नज़रों का भ्रम है लेकिन दुबारा उसने गौर से देखा तो लगा जैसे बच्चे की सांस बंद है. उसने चिल्लाकर नर्स को बुलाया और वहीँ अचेत हो गयी.
जल्द ही उसे होश आ गया और उसने देखा कि डॉक्टर, नर्स और उसके ससुर सभी वहां बदहवास खड़े थे. डॉक्टर बार बार उसके बच्चे को हिला डुला रही थी और उसकी सांस देखने की कोशिश कर रही थी. वह पत्थर जैसे खड़ी सबको देख रही थी तभी डॉक्टर की घबराई आवाज़ उसके कानों में पड़ी "अफ़सोस है, बच्चे को नहीं बचा पाए हम लोग".
एकदम से वहां रोना पीटना शुरू हो गया लेकिन वह जैसे जड़ हो गयी. पति ने झकझोर कर उसे हिलाया और खुद सुबक सुबक कर रोने लगा. वह आगे बढ़ी और बच्चे के शरीर को अपने सीने से लगाते हुए बोली "इसके जाने का समय भी शुभ मुहूर्त में ही था" और फिर उसके रुदन से पूरा हस्पताल हिलने लगा.   

Tuesday, October 10, 2017

कटा हुआ सर-- कहानी

गायत्री बहुत परेशान थी, उसके लिए तो यह सोच भी पाना नामुमकिन था. सुबह उसने रचना को दामादजी से बात करते सुन लिया था और वह लगभग गिरते गिरते बची थी. उसके नहीं रहते कुछ भी होता तो उसे पता भी नहीं चलता और फ़र्क़ नहीं पड़ता लेकिन उसके रहते ही यह हो, उसका मन जैसे बैठा जा रहा था. वह तो रचना के बार बार बुलाने पर चली आयी थी उससे मिलने, वर्ना बेटी के घर जाना उसकी सोच के हिसाब से ठीक नहीं था. पूरा दिन वह बहुत तनाव में रही, अपनी जिंदगी, बेटे की जिंदगी का पिछला आठ साल और अब बेटी का ये निर्णय, सब उसके जेहन में पूरे दिन तक घूमता रहा.
शादी के कई साल बाद कितने मुश्किल से बेटा पैदा हुआ था. घर में उनकी सास ने तो कहना भी शुरू कर दिया था कि अब दूसरी शादी की तैयारी करनी पड़ेगी. कितने तनाव के दिन थे वह और उसपर कोई भी नहीं था जिससे अपना दुःख बाँट सके. डॉक्टर से लेकर ओझा और बाबा के भी चक्कर लगाने के बाद कहीं जाकर उसकी गोद हरी हुई थी. फिर दस साल बाद रचना हुई थी. बेटे ने भी शुरू शुरू में बच्चा नहीं चाहा लेकिन बाद में उसको भी कई साल लग गए पिता बनने में.
पिछले कुछ दिनों में उनको यहाँ की दिनचर्या पता चल गयी थी, रोज पहले रचना ऑफिस से आती थी, फिर दामाद रिशू आते थे. उन्होंने घड़ी देखी, उसके हिसाब से रचना के आने का समय हो चला था. वह अपने आप को भरसक संयत करने की कोशिश में सोफे पर अखबार लेकर बैठ गयीं. वैसे तो निगाह अखबार पर थी लेकिन दिमाग कहीं और ही था उसका. दरवाजा खुलने की आवाज आयी, रचना ने अंदर आकर अपना बैग टेबल पर रखा और गायत्री के पास जाकर बैठ गयी. रोज तो गायत्री उसको देखकर खिल जाती थी और अक्सर तो मेज पर पानी का गिलास और कुछ मिठाई वगैरह भी रखी रहती थी. लेकिन आज तो ऐसा लगा जैसे उसका चेहरा उतरा हुआ है, उसने घबराकर गायत्री का माथा छुआ, लेकिन वह गरम नहीं था.
"तबियत ठीक नहीं है क्या माँ, बुखार तो नहीं लगता है", रचना ने चिंतित होकर पूछा.
"नहीं रे ठीक हूँ", उसने कह तो दिया लेकिन उसके बोलने के ढंग ने उसकी चुगली कर दी.
"रोज तो तू इतना ख़ुशी ख़ुशी मेरा इंतज़ार करती है, आज क्या हो गया. लगता है अपने नाती की बहुत याद आ रही है", रचना ने कारण समझने का प्रयास करते हुए कहा.
उसने एक बार अपने फीके चेहरे से उसकी तरफ देखा और फिर उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए बोली "याद तो उसकी रोज ही आती है, पता नहीं कैसे अकेले रहता होगा. लेकिन अभी उसकी चिंता नहीं है मुझे", उसने बात को टालने की गरज से कहा.
रचना ने उसका चेहरा अपने हाथ में ले लिया और चिंतित होते हुए बोली "फिर क्या बात है माँ, बताएगी नहीं मुझको?
 "अच्छा, एक बात बता, तू मेरा कहना मानेगी, सच सच बता".
"ओह, अब समझी, वापस भैया के पास जाना है इसलिए ये सब कह रही है. अभी अभी तो आयी है, कुछ दिन तो साथ रह ले ना, प्लीज़", रचना ने माँ की गोद में लेटते हुए कहा. आज भी माँ की गोद में उसे जो सुकून मिलता था, वह कहीं और नहीं मिलता.
गायत्री ने झुक कर बेटी का चेहरा चूम लिया, लेकिन आंसू का एक कतरा भी साथ साथ रचना के चेहरे पर टपक गया. अब उसे थोड़ी चिंता हुई और वह उठकर माँ का चेहरा अपने हाथ में लेकर सहलाते हुए बोली "क्या हुआ माँ, अच्छा बता क्या कह रही थी. अब भला तेरी बात नहीं मानूंगी तो और किसकी मानूंगी".
गायत्री ने उसको गहरी नजर से देखा और सोच में पड़ गयी कि कैसे कहे. लेकिन बेटी के सवालिया निगाह को देखकर उसने सोचा कि अब कह ही देना चाहिए.
"अच्छा तू मेरी कसम खा कि मेरी बात टालेगी नहीं", गायत्री ने अपने आप को और आस्वस्त करने के लिहाज से कहा.
"बोला तो नहीं टालूँगी, तू पहले बता तो मुझे", अब रचना की उत्सुकता और चिंता दोनों बहुत बढ़ गयी थी.
"तुझे पता है ना कि तेरा भाई और तू कितनी मुश्किल से पैदा हुए थे". गायत्री ने अपनी बात अधूरी छोड़ कर एक गहरी सांस ली और बेटी की आँखों में देखा.
बेटी को अभी भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था, लेकिन उसने बात ख़त्म करने की गरज से कहा "हाँ मुझे सब पता है, कितनी बार तो तूने बताया था. तू अब बता भी कि बात क्या है", रचना ने माँ का चेहरा प्यार से सहलाया.
"और फिर कितने साल के इंतज़ार के बाद तेरे भाई के घर बाबू हुआ था, कितना परेशान थे सब लोग", माँ ने एक और बात समझाने के अंदाज से कही.
"अरे कहीं बाबू की तबियत तो नहीं खराब हुई, तू बताती क्यों नहीं?
"नहीं नहीं, बाबू एकदम ठीक है, उसको कुछ नहीं हुआ है", गायत्री ने तुरंत कहा. उसके चेहरे पर एकदम से घबराहट सी फ़ैल गयी बाबू के तबियत खराब होने के बारे में सोचकर.
"तब आखिर बात क्या है, तू फिर आज उदास क्यों है, कुछ बताएगी भी?
"ठीक है बताती हूँ, तू कहेगी तो मैं तेरे घर कई महीने रह जाउंगी लेकिन तू ऐसा मत कर", गायत्री अभी भी असली बात सीधे सीधे कह नहीं पा रही थी.
"तो मैंने कब कहा कि तू जल्दी चली जा, तूही तो कहती रहती है कि ज्यादा दिन नहीं रुकूंगी तेरे घर, अब बता भी कि बात क्या है".
"अच्छा यह बता, तुझे पता है, एक औरत के लिए सबसे ख़ुशी की बात क्या होती है", गायत्री ने पूछा.
रचना थोड़ी देर सोचती रही और फिर हँसते हुए बोली "हां, पता है, जब उसकी माँ उसके पास रहती है".
गायत्री भी मुस्कुरा पड़ी, उसे इस जवाब की उम्मीद नहीं थी. फिर उसने रचना का सर सहलाते हुए कहा "सही सही बता, तू जानती है ना".
"इसमें पूछने की क्या बात है, एक औरत ही क्या किसी को भी सबसे ज्यादा ख़ुशी अपनों में मिलती है", रचना ने कुछ सोचते हुए कहा.
गायत्री को लगा कि इसे कैसे समझाए, फिर उसने एक और सवाल पूछा "जानती है, जब बच्चा पहली बार पेट में आता है तो एक औरत के लिए कितना सुखदायी होता है".
रचना को अब कुछ अंदेशा हुआ, कहीं माँ को पता तो नहीं चल गया. लेकिन उसने तो किसी से भी बताया नहीं था. तो क्या राकेश ने बता दिया माँ को, लेकिन राकेश तो ऐसा नहीं करेगा? उसके चेहरे पर तमाम भाव आ जा रहे थे और गायत्री उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही थी.
'जानती है, जब एक औरत के पेट में और उसकी जिंदगी में किसी नए के आने की आहट होती है ना तो उससे ज्यादा सुकूनदायी उसके लिए कुछ भी नहीं होता. जब बच्चे का पहला एहसास होता है, जब बच्चा पेट में पहला लात चलाता है और जब वह अंदर घूमना शुरू करता है, तब उसकी माँ को जो सुख मिलता है, वह दुनियाँ का सबसे बड़ा सुख होता है".
रचना एकटक माँ को देखे जा रही थी, माँ के चेहरे को देखते हुए उसे एहसास हो रहा था जैसे यह सब बताते हुए माँ खुद उसे अपने पेट में महसूस कर रही हो. उसे एक पल के लिए लगा जैसे कि वह एक बड़ी भूल करने जा रही है, लेकिन फिर उसने सँभलते हुए कहा "ये तो सच ही होगा माँ, आखिर तुम्हारा अनुभव है".
"एक औरत के लिए उसका माँ बनना सबसे गर्व और ख़ुशी का पल होता है बेटी. और यह मुझसे बेहतर और कोई नहीं जानता है. कभी सोचा है तुमने कि जो लोग कई कई वर्ष संतान सुख के लिए तरसते हैं, उनके दिल पर क्या बीतती है! जब बच्चा नहीं होने पर लोगों के ताने सुनने पड़ते हैं तो कलेजा फट जाता हैं", गायत्री अपनी रौ में बोलती जा रही थी.
"इतना तो मैं भी जानती हूँ माँ कि बच्चे से ही एक औरत का जीवन सम्पूर्ण होता है. लेकिन यह सब तुम मुझसे क्यों कह रही हो?, रचना ने अनजान बनने का एक और प्रयास किया.
"अच्छा तो तू समझती है यह, फिर ऐसा क्यों सोच रही है, बोल", गायत्री ने रचना का हाथ अपने हाथ में इस तरह ले लिया, जैसे रचना आज भी एक छोटी सी बच्ची हो.
"मैं क्या सोच रही हूँ माँ", रचना के शब्द थोड़े लड़खड़ाने लगे. अब उसे पूरा आभास हो गया था कि माँ को पता है लेकिन एक आखिरी बार उसने नहीं समझने की कोशिश की.
"तुझे पैदा करने के लिए कितना साल इंतज़ार करना पड़ा था हमको, और तू अपनी अजन्मे बच्चे को इस दुनिया में आने से ही रोक रही है. तू ऐसा सोच भी कैसे सकती है, अरे एक बार भी नहीं सोचा किसी की जान लेने में", गायत्री की आँखों से आंसू टप टप करके गिरने लगे.
रचना अवाक् रह गयी, उसे नहीं पता था कि माँ इस तरह भी रिएक्ट कर सकती है. उसने गायत्री का चेहरा अपने हाथ में लिया और उसके आंसू पोंछने लगी.
कुछ देर तक माँ उससे सटी हुई बैठी रही फिर अपना चेहरा पोंछते हुए बोली "अच्छा बता, तू ऐसा नहीं करेगी ना".
वो सोचने लगी कि माँ को कैसे समझाए, लेकिन अब बात तो करनी ही पड़ेगी. उसने माँ की पनीली आँखों में ऑंखें डाल कर देखा.
"अच्छा तू ये बता कि तू मुझे खुश और तरक्की करता देखना चाहती है ना, सही सही बोल", रचना ने थोड़ा जोर देकर पूछा.
"तेरी और सबकी ख़ुशी के लिए ही तो कह रही हूँ, और तेरी तरक्की से मुझसे ज्यादा और कौन खुश होगा", गायत्री ने कहकर उसका चेहरा चूम लिया.
"तो फिर इतनी जल्दी बच्चा आ गया तो मेरे कैरियर का क्या होगा माँ? आज के गलाकाट युग में कितना मुश्किल होता है आगे बढ़ना और उसमे बच्चा आ गया तो मुश्किल में पड़ जाऊँगी मैं", उसने गायत्री को समझाना चाहा.
गायत्री ने उसे गौर से देखा और उदास लहजे में बोली "यह सब तो पहले सोचना था, लेकिन अब यह मत कर. आज भले तुमको सही लग रहा हो लेकिन कुछ साल बाद तुम्हीं को अपने इस निर्णय पर अफ़सोस होगा".
"देखो माँ, अब तुम लोगों वाला ज़माना तो रहा नहीं कि पति कमाए और बाकी सब खाएं. और फिर मेरी भी कुछ तमन्नाएँ हैं, आखिर मैंने भी पढ़ाई इसीलिए तो की है कि मैं भी कुछ करूँ. अब ऐसे में बच्चे के चलते या तो मैं नौकरी छोडूं, या लम्बी छुट्टी लूँ, दोनों ही तरफ से मेरे कैरियर का नुक्सान ही होना है".
गायत्री ने तुरंत कहा "तू नौकरी मत छोड़, मैं हूँ न बच्चे के देख रेख के लिए. लेकिन एक बार अगर इसको गिराने का सोच लिया तो आगे पता नहीं क्या हो, मेरा अनुभव तो तू जानती ही है".
रचना को अब समझ में नहीं आ रहा था कि माँ को कैसे समझाए, इसलिए उसने फिलहाल बात को टालना ही उचित समझा. उसने गायत्री के हाथ को अपने हाथ में लेते हुए कहा "ठीक है माँ, तू जैसा कहती है वही करुँगी मैं, अब तो तू खुश है ना".
गायत्री को जैसे अपने कानों पर यकीन ही नहीं हुआ, उसने एक बार फिर पूछा "सच में तू मेरी बात मान लेगी?
"हां माँ, अब चल जल्दी से कुछ खाने को दे", कहते हुए उसने पेट पर हाथ फेरा जैसे बहुत भूख लगी हो. गायत्री की नजर भी पड़ी और वह यह सोचकर पूरी तौर से आस्वस्त हो गयी कि रचना ने पेट पर हाथ फेरकर उस अजन्मे बच्चे को पैदा करने का वादा कर दिया हो.
रात को बिस्तर पर जैसे ही रिशू आया, रचना ने उसको एकदम से पकड़ लिया. "क्या हुआ रचना, सब ठीक तो है?, उसने पूछा.
"सब ठीक नहीं है रिशू, माँ को पता चल गया कि मैं अबोर्सन करवाना चाहती हूँ और वह बेहद दुखी हो गयी थीं. उन्होंने मुझे तब तक नहीं छोड़ा जब तक मैंने उनसे यह झूठा वादा नहीं कर दिया कि मैं यह अबोर्सन नहीं करवाऊँगी", रचना ने एक सांस में ही कह दिया.
रिशू भी सोच में पड़ गया, वह भी रचना के निर्णय से सहमत था. इतनी जल्दी बच्चा दोनों नहीं चाहते थे लेकिन अब अबोर्सन के सिवा कोई चारा भी नहीं था.
"लेकिन करवाना तो पड़ेगा ही, कहीं तुम सचमुच तो बच्चे के लिए नहीं सोचने लगी", रिशू ने रचना को सहलाते हुए कहा.
"बेकार की बात मत करो, लेकिन अब माँ का क्या किया जाए. उनको समझाना संभव नहीं है और बाद में जब उनको पता चलेगा अबोर्सन के बारे में तो वह कितना दुखी होंगी, मैं अंदाजा लगा सकती हूँ. और सबसे बड़ी बात कि फिर मैं उनसे आंख कैसे मिलाऊँगी", रचना बेहद परेशान थी.
रिशू भी सोच में डूबा था, वैसे भी वह रचना की माँ से बहुत बात नहीं करता था, इसलिए उनको समझाने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था. अब इस समस्या का हल उसकी निगाह में कुछ दिख नहीं रहा था. उसने रचना को समझाने के हिसाब से कहा "चलो सो जाओ, कल सोचेंगे क्या करना है, कभी कभी समय भी समाधान सुझा देता है".
रचना बिस्तर पर निढाल हो गयी, उसके दिमाग में शाम को माँ से हुई सारी बातचीत घूम रही थी. आखिर माँ ने जो अपने जीवन में देखा और झेला है, उसके हिसाब से तो वह सही ही कह रही है. लेकिन जरुरी तो नहीं कि उसे आगे चलकर बच्चे के लिए दिक्कत ही हो. फिर अपना कैरियर भी तो देखना है, अगर उसने लम्बी छुट्टी ली तो पता नहीं कितने लोग उससे आगे निकल जायेंगे और फिर उसके बाद यही नौकरी बची रहेगी, इसकी भी क्या गारंटी है. नहीं, अभी उसे बच्चे के चक्कर में नहीं पड़ना है, माँ को फिलहाल झूठ बोलकर काम चलाना पड़ेगा, आगे देखेंगे.
अचानक रिशू के दिमाग में कुछ कौंधा और उसने रचना को अपनी तरफ घुमाते हुए कहा "इतना आसान तरीका है और हम झूठमूठ परेशान हो रहे हैं. अरे माँ को बोल देंगे कि मिसकैरेज हो गया और नहीं होगा तो डॉक्टर से भी कहलवा देंगे, बस छुट्टी".
रचना का चेहरा भी खिल गया, इतना आसान उपाय है और वह इतना परेशान थी. उसने रिशू को चूम लिया और मुस्कुराते हुए आंख मूदकर लेट गयी.
सुबह रचना की नींद एक सपने से खुली, उसका पूरा शरीर पसीने से तरबतर था. उसे पूरा तो नहीं याद था लेकिन उसने देखा कि वह अपने कंपनी की प्रेसिडेंट बन गयी है और उसी समारोह में एक बच्चा उसको एक गुलदस्ता भेंट कर रहा है जिसका सर गायब है. उसने घबराकर दूसरी तरफ देखा तो एक टेबल पर बच्चे का कटा सर पड़ा था जिसकी ऑंखें उसे ही लगातार देख रही थीं.
वह घबरा कर कमरे से भागी और जाकर माँ से लिपटकर रोने लगी. गायत्री भी हड़बड़ाकर उठ गयी और परेशान होकर उसको सहलाने लगी.
"क्या हुआ बेटी, तबियत तो ठीक है ना", गायत्री ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए पूछा. कुछ पल बाद रचना ने सर हिलाकर उसे आस्वस्त किया कि वह ठीक है और फिर उसने अपनी सोच में उस बच्चे के कटे हुए सर को उसके धड़ से जोड़ दिया.
अब उसे वापस नींद आने लगी और वह अपनी माँ से लिपटकर उसकी गोद में एक बच्चे की तरह सो गयी.

Monday, October 9, 2017

परंपरा और गुलामी-- लघुकथा

"कल की फोटो देखी मैंने, बहुत सुंदर दिख रही थीं आप", उसने ऑफिस में अपनी कलीग से कहा|
"अरे कल वो व्रत था ना, उसमें तो सजना बनता था", मुस्कुराते हुए वह बोली|
"अच्छा, तो आप भी यह सब मानती हैं, मुझे लगा कि आप आजाद ख्याल की हैं", उसके लहजे में व्यंग्य था या सहानुभूति, वह समझ नहीं पायी|
"ऐसी बात नहीं है, मैं तो बस परंपरा निभाने के लिए ऐसा कर लेती हूँ| वैसे इसी बहाने थोड़ी शॉपिंग भी हो जाती है, पति से गिफ्ट भी मिल जाता है", थोड़ी सफाई सी देती हुए वह बोली|
"मतलब परंपरा की आड़ में सब कुछ ठीक है, तो फिर तो आप दिन भर भूखी प्यासी भी रही होंगी", उसने एक और तंज किया|
वह थोड़ा सकपकायी और कुछ सोच के बोली "अरे फास्टिंग करने से तो स्वास्थ्य सुधरता ही है, अब एक दिन इसी बहाने से ही सही| वैसे मैं इन सबसे उम्र बढ़ने में विश्वास नहीं करती"|
"ओह, खैर आप की तक़रीर मुझे अब तक याद है जब कोर्ट का फैसला तीन तलाक के बारे में आया था, कितनी उत्साहित और खुश थीं आप नारी स्वतंत्रता को लेकर",उसने एक और सवाल किया|
"वह तो ऐतिहासिक फैसला था, आखिर कोई कब तक औरतों को पांव की जूती बना कर रखेगा", उसके आवाज में अब थोड़ी हिम्मत आ गयी|
"मतलब दूसरे मज़हब की परंपरा और संस्कार हों तो गलत और आपके हों तो ठीक", उसने पूछा|
"और कुछ महिलाएं तो उनके यहाँ भी इसे परंपरा और धर्म की दुहाई देकर सही ठहरा रही थीं, वो सही था क्या", उसके प्रश्न लगातार चुभते जा रहे थे|
"देखिये, नारी को मानसिक गुलामी ने इतना जकड रखा है कि वह अपना सही और गलत सोच ही नहीं पाती| भला इसे कैसे सही ठहराया जा सकता है", उसकी आवाज फिर कमजोर सी पड़ती प्रतीत हुई|
"ओह, तो पति के उम्र के लिए भूखे प्यासे रहना मानसिक तरक्की की निशानी है? तब तो मेरी पत्नी बहुत पिछड़ी हुई है", उसके चेहरे पर मुस्कान छा गयी|
"अब यह अपनी अपनी सोच है, मैंने कहा ना कि उम्र बढ़ने में मेरा कोई विश्वास नहीं है"|
"अच्छा, कभी आपने अपने पति से कहा कि वह भी आपके लिए यूँ ही व्रत रखे, मतलब उम्र बढ़ने के लिए नहीं, बस ऐसे ही", उसने एक और सवाल किया|
वह अभी सोच ही रही थी कि उसने फिर कहा "या कभी आप के पति ने ही कहा हो कि वह आपके लिए व्रत रखेगा"|
वह सोच में पड़ गयी, ऐसा तो कभी नहीं हुआ| एक थकी निगाह से उसने सामने देखा और फींकी मुस्कराहट फेंकते हुए बोली "ऐसा तो कभी सोचा ही नहीं, ये पुरुष तो कभी महिलाओं के लिए व्रत नहीं रखते"|
"खैर आपको ठेस पहुंचाने का कोई इरादा नहीं था मुझे, उस दिन नारी स्वतंत्रता पर आपके विचार सुनकर मुझे अच्छा लगा था| लेकिन कल की आपकी छुट्टी और फोटो देखकर थोड़ा अफ़सोस हुआ इसलिए मैंने ऐसा कहा, माफ़ कीजियेगा", उसने हाथ जोड़ते हुए कहा और आगे बढ़ गया|
उसने अपना फोन उठाया और कल की डाली हुई सेल्फी और बाकी फोटो डिलीट करने लगी|

अपने अपने जज़्बात- लघुकथा

"हाय मम्मी, कैसी है, तबियत ठीक है ना तुम्हारी और दवा रोज ले रही हो ना", रोज के यही सवाल होते थे सिम्मी के और उसका रोज का जवाब।
"अब वीडियो काल किया है तो देख ही रही है मुझे, मैं एकदम ठीक हूँ। अच्छा अभी कितना बज रहा है वहाँ पर", उसने अपनी दीवाल घड़ी को देखते हुए पूछा।
"रोज तो बताती हूँ, बस साढ़े तीन घंटे आगे चलती है घड़ी यहाँ, अभी शाम के सिर्फ सात ही बजे हैं"।
"मुझे याद नहीं रहता, हमेशा उलझ जाती हूँ कि हमारी घड़ी आगे है या तुम्हारी। और मेहमान आए कि नहीं अभी, छोटू कैसा है", उसने भी सवाल किया, वह आज भी दामाद को मेहमान ही कहती है, भले पिछले दस साल से शहर मे रह रही है।
"सब लोग बढ़िया है, तुम मेहमान कहना कब छोड़ोगी, सुनते हैं तो हंसते हंसते लोट पोट हो जाते हैं", सिम्मी ने भी एक ठहाका लगाया।
वह भी मुस्कुरा दी, और पानी पीने लगी।
"अच्छा है हम व्रत नहीं रखते हैं, अब तो यहाँ जोबर्ग मे भी हिंदुस्तानी महिलाएं ये सब खूब करने लगी हैं। मुझे भी सब हर बार टोकती हैं", सिम्मी बोली।
उसको अब याद आया, कल तो व्रत है और कामवाली भी नहीं आएगी। कितना मार खाती है यह कामवाली अपने आदमी से लेकिन फिर भी उसी की लम्बी उम्र के लिए व्रत भी रखती है|
"जिसकी मरने की भी दुआ नहीं करती, उसके उम्र का क्या सोचना। अच्छा तुम बताओ सिम्मी, सच में कभी तुम्हारा मन नहीं करता यह सब करने का", उसने गहरी सांस लेते हुए पूछा|
एक ठहाका लगाया सिम्मी ने और मुस्कुराते हुए बोली "कमाल की बात करती हो मम्मी, मैं और यह सब| पापा का किस्सा न तो तुम भूल सकती हो और न मैं, किस हाल में छोड़ कर भाग गए थे हमको और क्या क्या नहीं कहा था तुम्हारे चरित्र के बारे में| और तुम तो हर पूजा और हर व्रत करती थी उनके लिए"|
"लेकिन हर आदमी एक जैसा तो नहीं होता ना, अब मेहमान को ही देख लो| मेरी तरफ से कोई पाबन्दी नहीं है इसकी, बाकी तुम खुद ही समझदार हो", उसने कुछ सोचते हुए कहा|
"छोडो इन बातों को, वैसे कल तो मैं चिकेन बना रही हूँ, तुम क्या खाओगी", सिम्मी ने पूछा|
"अरे कामवाली कल नहीं आएगी, उसने व्रत रखा हुआ है| लगता है ऐसे ही कुछ खा कर दिन बिताना होगा", उसने मुस्कुराते हुए कहा|
"देखना कहीं बिना खाये ही मत रह जाना वर्ना किसी की उम्र बढ़ जाएगी", सिम्मी ने भी कस के ठहाका लगाया|
मुस्कुराते हुए उसने कहा "मेहमान को मेरा आशीर्वाद कहना और छोटू को प्यार देना| अब एक बार यहाँ कुछ दिनों के लिए आने का भी सोचो"|
"जरूर मम्मी, अपना ध्यान रखना", कहते हुए सिम्मी ने फोन रख दिया| वह भी सर के नीचे हाथ रख कर आंखे मूंदे बिस्तर पर लेट गयी|

Friday, October 6, 2017

प्रश्नचिन्ह-- लघुकथा

एक बार फिर उसकी आंख खुल गयी, जून महीने की बेहद जला देने वाली गर्मी की दोपहर में कमरे में लेटे हुए वह तपिश से लड़ने का असफल प्रयास कर रही थी| इसी क्रम में कभी झपकी आ जाती थी और कभी नहीं, तभी यह दूसरी बार हुआ कि बाहर से आते छोटे बच्चे के रोने की आवाज़ सुनकर उसकी आंख खुली| इतनी भयानक गर्मी में कौन बच्चा बाहर रो रहा है देखने के लिए उसने कमरे का दरवाज़ा धीरे से खोला| गर्म हवा के थपेड़े लगता था जैसे उसके इंतज़ार में ही बाहर थे और एकदम से उसे अपना चेहरा जलता महसूस हुआ| एक बार तो उसकी इच्छा हुई कि दरवाज़ा बंद करके वापस कमरे में चली जाये लेकिन तभी बच्चे के रोने की आवाज़ एक बार फिर सुनाई पड़ी|
बरामदे को पार करते हुए उसने मेन गेट खोला और बाहर झाँका, बाहर के एकलौते पेड़ की कमजोर छाया में दो
बच्चियां एक छोटे से लड़के के साथ बैठी थीं| बड़ी बच्ची शायद आठ साल की और उससे छोटी लगभग छह साल की थी और बड़ी के गोद में एक बहुत छोटा बच्चा लेटा हुआ था जो शायद तीन चार महीने का ही था| एक पल को उसके होश उड़ गए, वह कमरे में भी इस गर्मी को झेल पाने में असमर्थ थी और ये बच्चियां इतने छोटे से बच्चे को लेकर इस पेड़ के नीचे बैठी हैं| लपक कर वह उनके पास पहुंची और पूछा "तुम लोग यहाँ क्यों बैठी हो और यह छोटा बच्चा किसका है"|
उसकी आवाज़ सुनकर छोटा बच्चा चुप हो गया और बड़ी लड़की ने कहा "यह हमारा भाई है"|
"लेकिन तुम लोग इसको यहां क्यों लेकर बैठी हो, इतनी गर्मी है और लू भी चल रही है”, उसने फिर पूछा|
"मम्मी हमको यहाँ बैठाकर गयी हैं, आएँगी तो हम लोग चले जायेंगे", बड़ी बच्ची ने बच्चे को झुलाते हुए कहा|
उसे समझ नहीं आया कि क्या करे, फिर उसने उनको कहा "तुम लोग अंदर चलो, छाये में बैठो";, और उनको लेकर वह गेट के अंदर बरामदे में आ गयी| बच्चा उसे भूखा लगा तो अंदर से लाकर आधा ग्लास दूध ले आयी और बड़ी बच्ची को पकड़ा दिया| दूध पीने के बाद उसने दो ग्लास पानी भी दिया और छोटा बच्चा उसे भी गटागट पी गया| फिर वह उन दोनों के लिए भी कुछ खाने का ले आयी और खाना देने के बाद उसने पूछा "तुम्हारी मम्मी क्या करती है?
"कूड़ा बीनती है";, बड़ी बच्ची ने बताया|
"और पापा?
खाना खाते हुए बच्ची बोली "पापा कहीं चले गए हैं, हमको मालूम नहीं है"|
वह इन बच्चो के बारे में सोचते हुए कुछ समय तक वहीँ बैठी रही, इतने में बड़ी बच्ची बोली कि मम्मी आ गयी और गेट खोलकर बाहर निकली| फिर उसके पीछे पीछे उसकी मम्मी भी आयी और सबको चलने के लिए कहने लगी|
उसने उसकी तरफ देखते हुए पूछा "इतनी गर्मी में इस छोटे बच्चे को ऐसे ही बाहर छोड़कर चली गयी थी?
उस औरत ने उसकी तरफ देखते हुए कहा "तो क्या करें, काम तो करना पड़ता है ना नहीं तो इनको रोटी कैसे
खिलाऊंगी"|
उसने सोचा कि इसको थोड़ा समझा दिया जाए तो बोली "इतने बच्चे क्यों पैदा करती हो जब संभाल नहीं सकती इनको?
उस औरत ने उसकी तरफ देखा और कहा "अब इ लड़कियां बड़ी हो गयी हैं, इनको छोड़ देंगे, ये भी कूड़ा बीनेंगी और अपना खाएंगी पियेंगी"|
उसे एकदम से धक्का लगा, इतनी छोटी लड़कियों को छोड़ देगी| "अरे इतनी छोटी लड़कियों को तुम कैसे छोड़ दोगी, उनको कुछ हो गया तो?
उस औरत ने उसकी तरफ देखा और बोली "इतना ही फिकर है तो तुम ही रख लो इनको| हम भी इतने ही बड़े थे जब इस काम में लग गए थे", और फिर उसने छोटा बच्चा अपनी गोद में लिया और गेट के बाहर निकल गयी| उसके पीछे पीछे दोनों लड़कियां भी उसके लिए एक बड़ा सा प्रश्नचिन्ह छोड़ती हुई चली गयी| 

Tuesday, September 26, 2017

दर्द का एहसास-- लघुकथा

"मैडम, इस तरह कैसे चलेगा, बिना छुट्टी लिए आप गायब हो जाती हैं| यह ऑफिस है, ध्यान रखिये, पहले भी आप ऐसा कर चुकी हैं", जैसे ही वह ऑफिस में घुसी, बॉस ने बुलाकर उसे झाड़ दिया| उसने एक बार नजर उठाकर बॉस को देखा, उसकी निगाहों में गुस्सा कम, व्यंग ज्यादा नजर आ रहा था| बगल में बैठी बॉस की सेक्रेटरी को देखकर उसको उबकाई सी आ गयी|
लगभग तीन महीने हो रहे थे उसको इस ऑफिस में, पूरी मेहनत से और बिना किसी से लल्लो चप्पो किये वह अपना काम करती थी| ऑफिस में कुछ महिलाएं भी थीं जिनके साथ वह रोज लंच करती थी लेकिन उनके सोच के स्तर को देखकर उसने उनसे ज्यादा बात करना लगभग छोड़ दिया था| इसी बात को लेकर कुछ महिलाओं ने उसे नीचा दिखाने का सोच लिया था| कई बार उनकी बातों का वह मुंहतोड़ जवाब भी दे चुकी थी और इनको नज़रअंदाज करना भी उसने धीरे धीरे सीख लिया था|
पिछले कई सालों से उसे कम से कम महीने में एक दिन बिस्तर पकड़ना ही पड़ता था| इतना भयानक दर्द होता था कि काम करना तो दूर, वह ठीक से चल फिर भी नहीं पाती थी| दवा से बस इतना होता कि आराम से लेट लेती थी लेकिन घर से निकलना तो सोच भी नहीं सकती थी| अगले दिन भी बहुत दिक्कत होती थी लेकिन किसी तरह दिन बीत जाता था| पिछले महीने ही उसने बॉस की सेक्रेटरी और साथ की महिलाओं को बता भी दिया था कि उस एक दिन वह किसी भी हालत में काम पर आने लायक नहीं रहती|
उसने एक बार सोचा कि बात ख़त्म की जाए और वह मुड़कर जाने को हुई| लेकिन तभी बॉस और सेक्रेटरी की हंसी ने उसके मन में आग लगा दी| पलटकर उसने बॉस की आँखों में ऑंखें डालते हुए कहा " शायद आपको इसके बारे में पता हो यही सोचकर तो मैंने आपकी सेक्रेटरी को अपने तकलीफ के बारे में बता दिया था| मैंने सोचा था कि वह आपको बता देगी और आप समझ जाएंगे| आपकी पत्नी तो शायद इस दर्द के बारे में आपसे बात नहीं करती होगी लेकिन मैं अब आपको हर महीने बता दिया करुँगी और उस एक दिन नहीं आ पाऊँगी"|
वह बॉस के केबिन से बाहर निकल गयी और पीछे बंद हुए दरवाजे की आवाज पूरे ऑफिस को सुनाई पड़ रही थी|  

Friday, September 22, 2017

जरुरत- लघुकथा

"सुबह मैंने शैम्पू लाने के लिए कहा था, फिर भूल गए", जैसे ही वह घर में घुसा, पत्नी बोली|
"एकदम दिमाग में ही नहीं आया, अच्छा कल जरूर लेता आऊंगा| छुटकी जगी नहीं अबतक", कहते हुए वह बैग रखकर कमरे में भागा| जैसे ही उसने जेब से चॉकलेट निकालकर उसके सिरहाने रखा, पत्नी ने नाराजगी दिखाते हुए कहा "बेटी के लिए चॉकलेट लाना नहीं भूले, लेकिन मेरा कहा याद नहीं रहा"|
"चाय पिलाओ ना, थोड़ी थकान लग रही है", उसने छुटकी के पास ही लेटते हुए कहा|
"ठीक है, पहले कपडे तो बदल लो", बोलती हुई पत्नी किचन में चली गयी| चाय पैन गैस पर चढ़ाकर जब पत्ती डालने चली तो याद आया कि चाय की पत्ती तो ख़त्म है|
ओह, सुबह ही सोचा था लेकिन दुकान पर ध्यान नहीं रहा| अब क्या करे सोचते हुए उसने आवाज़ लगायी "जरा चाय की पत्ती तो लेते आओ, ख़त्म हो गयी है"|
"कितनी भुलक्कड़ हो गयी हो आजकल, कुछ याद ही नहीं रहता बेटी के आगे", मुस्कुराते हुए उसने कहा|
"और तुम्हें सब याद रहता है", कहकर दोनों हंस पड़े|
"कुछ देर बाद ले आऊंगा चाय की पत्ती, अब थकान कम लग रही है", उसने बेटी के पास लेटे लेटे ही कहा| पत्नी भी आकर वहीँ बैठ गयी, दोनों की प्यार भरी निगाहें बेटी पर टिकी हुई थीं| 

कुछ खूबसूरत पल-- लघुकथा

अब से मैं पूरा ध्यान रखूंगी मुकुल का, बहुत परेशान हो जाते हैं आजकल, उसके दिमाग में पूरे दिन यही घूम रहा था| जब से बेटी पैदा हुई थी, उसे एकदम व्यस्त रख रही थी, समय तो जैसे पंख लगा कर उड़ जाता था| बेचारे मुकुल खुद ही सब कुछ करते रहते थे, कभी कुछ कहते नहीं थे लेकिन उसे तकलीफ होती थी| आखिर कभी भी मुकुल को कुछ करने जो नहीं दिया था उसने|
"कपडे आयरन नही हैं, ओह फिर याद नहीं रहा", कहते हुए आज सुबह जब मुकुल ने सिकुड़े कपडे पहने तो उसे थोड़ी खीझ हुई| जल्दी से उसने नाश्ता निकालने का सोचा तभी बच्ची रोने लगी|
"नाश्ता किचन से लेकर खा लेना", बोलती हुई वह भागी|
"तुम मेरी चिंता मत करो, बेटी को देखो", और मुकुल ने नाश्ता लिया और आकर उसे देखने लगे| उसे पता ही नहीं चला कि कब वह आया और उसे देखने लगा, वह तो बेटी में ही खोयी थी|
"चलता हूँ, शाम को कुछ लाना तो नहीं है", मुकुल ने पूछा तो उसे उसके आने का एहसास हुआ|
"नहीं ठीक है, मैं दिन में ले आउंगी, तुम जल्दी आने की कोशिश करना", उसने मुस्कुराते हुए कहा| जाते जाते एक बार फिर पलटकर मुकुल ने बेटी को देखा और मुस्कुराते हुए निकल गए|
शाम को किसी तरह उसने नाश्ता बनाया और चायपैन गैस पर रखकर वह अभी बैठी ही थी कि बेटी जग कर रोने लगी| उसे लेने कमरे में गयी थी कि घंटी बजी| गोद में बेटी को लिए हुए उसने दरवाजा खोला और बैग रखकर मुकुल ने बेटी को लेना चाहा| लेकिन बेटी चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी, उधर चाय भी गैस पर चढ़ी हुई थी|
"तुम इसे चुप कराओ, शायद भूखी है, मैं कपडे बदल लेता हूँ तब तक", बोलता हुआ मुकुल कमरे में चला गया|
थोड़ी देर बाद उसे लगा कि कमरे में कोई है तो सामने मुकुल ट्रे में नाश्ता और चाय लेकर खड़ा था| उसे अपने आप पर एक बार फिर झेंप आयी और वह खड़ा होना चाह रही थी कि मुकुल ने उसे रोका और ट्रे रखकर बैठ गया|
"तुम नहीं जानती कि तुम्हें इस तरह देखना कितना सुखकर होता है मेरे लिए", कहकर मुकुल ने उसके बाल सहला दिए और बेटी के गाल पर धीरे धीरे हाथ फेरने लगा| वह धीरे से मुकुल के गोद में सर रखकर लेट गयी, बेटी भी सोते सोते मुस्कुरा रही थी और चाय ट्रे में ठंडी हो रही थी|  

Thursday, September 21, 2017

खबर--कहानी

बीस साल बाद आज जोखन लौटा था गाँव, कितनी बार घरवालों ने बुलाया, कितने प्रयोजन पड़े, लेकिन जोखन ने कभी भी गाँव की तरफ जाने का नाम नहीं लिया था| लोगों ने बहुत बार पूछा, लेकिन कभी उसने वजह नहीं बताया| आज गाँव में आकर उसे सब कुछ बदला बदला लग रहा था, कुछ भी पहचाना नहीं लग रहा था| पिताजी से हाल चाल करके वह गाँव में घूमने निकला और कुछ ही देर में गाँव के बाहर खेतों में खड़ा था| खेत भी अब खेत कम, प्लाट ज्यादा लग रहे थे| खेतों को पार करता हुआ वह बगल के गाँव के रास्ते पर चल पड़ा| कभी पगडण्डी जैसा रास्ता अब कंक्रीट का बन गया था लेकिन उसपर से गुजरने वाले कदम अब कम हो गए थे|
बगल के गाँव में पहुँच कर उसने उस घर की तरफ कदम बढ़ाया जहाँ बीस साल पहले वह आखिरी बार आया था| उस आखिरी बात के बाद कि "हमारा साथ संभव नहीं है, अपनी अलग जिंदगी बसा लो| हाँ मेरी दुआएं हमेशा साथ रहेंगी और तुम जितना आगे बढ़ोगे, मैं भी उतना ही खुश रहूंगी", जोखन ने कभी पलट कर नहीं देखा| इस बात का पता उन दोनों ने आज तक किसी किसी को भी नहीं लगने दिया था|
इस बीच उसे खबर मिलती रही कि रंजू की शादी हो गयी और वह किसी और गाँव में चली गयी| वह भी अपनी जिंदगी में व्यस्त होता गया और अपनी हर तरक्की उसे यह सुकून जरूर देती रही कि रंजू को भी ख़ुशी मिल रही होगी| लेकिन पिछले हफ्ते जो खबर उसे मिली उसने उसके होश उड़ा दिए|
अब तो बस मन में एक इच्छा थी कि एक बार पता चल जाए कि जो खबर उसने सुनी थी वह सच है कि नहीं| बड़ी जद्दोजहद के बाद उसने गाँव आकर एक बार रंजू के घर जाकर पता लगाने का फैसला लिया था| घर में तो वह किसी से पूछ नहीं सकता था इसलिए मन ही मन वह मनाता आया था कि खबर गलत ही हो| आखिर उसकी बात गलत कैसे हो सकती थी, उसकी तरक्की से तो रंजू की खुशियाँ बढ़नी थी| बस दो ही घर बाद उसकी गली आने वाली थी और जोखन का दिल बुरी तरह धड़क रहा था कि किसी आवाज ने उसको रोका "अरे जोखन, कैसे हो और कब आये, बहुत साल हो गया था तुमको देखे"|
उसने पलट कर देखा, रंजू के पिताजी थे| ऐसा लगा जैसे उसने किसी बहुत ही बुजुर्ग व्यक्ति का चेहरा देख लिया हो, उदास ऑंखें, पीला पड़ा चेहरा और उलझे बाल| कहाँ उनका नाम लेकर रंजू उसे चिढ़ाती थी कि काश तुम भी पापा की तरह स्मार्ट होते तो तुमको कोई भी पसंद कर लेता| उनका चेहरा देखते ही उसे सब समझ आ गया, क्या कहे, क्या पूछे, उसके दिमाग ने जैसे काम करना बंद कर दिया| बस किसी तरह इतना कह कर कि "आज ही आया था चाचा, ठीक हूँ", पलट कर अपने गाँव की तरफ चल पड़ा| रंजू को ससुराल वालों ने जला दिया था, इस खबर को अब किसी से भी पूछने की हिम्मत नहीं थी उसमें | पीछे से आती आवाज उसे जैसे सुनाई ही नहीं पड़ रही थी और कुछ भी सोचने की ताक़त जोखन गँवा चुका था| 

बढ़ता धुआं-- लघुकथा

खाला अपने रसोई में लगी हुई थीं, अब रमजान महीने के बस दो ही दिन तो बचे थे और अलीम बड़के शहर से आज ही आ रहा था. सबेरे सबेरे उन्होंने पड़ोसी मियां की दूकान से एक बार फिर लगभग गिड़गिड़ाते हुए सामान ख़रीदा था. अभी पिछले महीने का भी पूरा पैसा दिया नहीं था उन्होंने तो उम्मीद कम ही थी कि सामान मिल ही जायेगा. लेकिन एक तो उन्होंने बेटे के आने की खबर सुना दी थी और दूसरे आने वाली ईद, मियां ने थोड़े ना नुकुर के बाद सामान दे दिया.
"देखो खाला, इस बार अगला पिछला सब हिसाब चुकता हो जाना चाहिए, मेरे भी बाल बच्चे हैं".
"इस बार अल्लाह की दुआ से सब चुकता कर दूंगी मियां, बेटा आ रहा है ना" कहते कहते उनका चेहरा जैसे रोशन हो उठा.
जल्दी जल्दी पूरे टपरी में उन्होंने झाड़ू लगाया और धूल के चलते उनकी पुरानी खांसी फिर उभर आयी. अब मुआं इस खांसी को भी अभी ही उभरना था, सोचते हुए वह दो मिनट के लिए दम लेने बैठ गयीं.
"अम्मी, इस बार आऊंगा तो तुमको डाक्टर को दिखा दूंगा, तुम्हारी खांसी नहीं जा रही है", एक दिन वह फोन पर कह रहा था. दरअसल जब भी उसका फोन आता, बगल वाली रशीदा अपने टपरी से ही आवाज लगाती कि खाला आओ, तुम्हारे अलीम का फोन है, और वह भागते हुए जातीं. अब इस उम्र में भागने से उनकी सांस फूल जाती और वह खांसने लगतीं.
"अरे मुझे कुछ नहीं हुआ है रे, तू अपना ख्याल रखिओ. खाना पीना तो ठीक से करता है कि नहीं", और अलीम को इससे ज्यादा कुछ पूछने का मौका नहीं देती थीं वह.
जब तक उसके अब्बा जिन्दा थे, ज्यादा कुछ सोचने के लिए नहीं था उनके पास. एक बड़ी बेटी थी जिसका निकाह करवाकर वह बहुत सुकून से थीं. दामाद राजमिस्त्री था और वह बेटी को लेकर बड़े शहर चला गया था . लेकिन अलीम के अब्बा के इंतकाल के बाद तो जैसे एकदम से उनकी समझ बढ़ गयी थी. अलीम भी १० वीं पास कर चुका था और काम के सिलसिले में बड़े शहर निकल गया. पिछले एक साल में एक बार ही आया था और इस ईद पर उसके आने की खबर ने जैसे उनको फुर्तीला बना दिया था.
कड़ाही से निकलती सालन की खशबू ने उनको वर्तमान में ला खड़ा किया. अब तो अलीम के आने का समय भी हो रहा है और इफ्तार का समय भी, उनके हाथ जल्दी जल्दी कड़ाही में चलने लगे. कितना कुछ बनाना है बेटे के लिए, सोचकर उनके चेहरे पर मुस्कराहट फ़ैल गयी.
बाहर गली में हो रहे कुछ शोर सुनकर उनको लगा की अलीम आ गया लगता है. इतने में उनके दरवाजे की कुण्डी जोर जोर से खड़खड़ाने की आवाज आने लगी.
"आती हूँ, क्यों इस कुण्डी की जान ले रहा है तू", कहकर उन्होंने कमर को हाथ लगाया और खड़ी होकर उन्होंने दरवाजा खोला.
"अलीम, कहाँ छुपा है रे, सामने क्यों नहीं आता? सामने पड़ोसियों की भीड़ देखकर उनको लगा कि शैतानी में अलीम इनके बीच छुपा हुआ है. लेकिन भीड़ में से लोगों के उतरे चेहरे को देखकर उनको अजीब सा लगा. अभी वह कुछ और सोच पाती कि रशीदा ने रोते हुए उनको अपने बाँहों में भर लिया.
"क्या हुआ, क्यों रो रहे हो तुम सब, मेरा अलीम कहाँ है?, खाला को यह सब देखकर जैसे लकवा मार गया. वह गिरने को हुईं तभी रशीदा ने उनको पकड़कर फर्श पर बैठा दिया और बोली "अभी फोन आया था खाला, कुछ लोगों ने हाथापाई में अलीम की जान ले ली", और भी बहुत कुछ कहती जा रही थी रशीदा लेकिन खाला को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था.
कड़ाही में पकता सालन जलने लगा था और उससे उठता धुआं टपरी में फैलने लगा था|

बाप-- लघुकथा

घर के बाहर ही जब उसने अपने चचेरे भाई रग्घू को देखा तो उसका माथा ठनका| आज यह घर क्यों आया था, जरूर कुछ गड़बड़ होगी, वर्ना पिताजी को गुजरे इतने साल हो गए, कभी हाल पूछने भी नहीं आया था| उसकी मुस्कराहट को नजरअंदाज करते हुए वह भागती हुई घर में घुसी|
"माँ, माँ, कहाँ है तू", सामने माँ नजर नहीं आयी तो वह बेचैन हो गयी| जल्दी से उसने पिछले कमरे में प्रवेश किया तो माँ को खाट पर बैठे पाया|
"तू यहाँ बैठी है और जवाब भी नहीं दे रही है, मैं तो घबरा गयी थी| आज रग्घू क्यों आया था घर, तूने तो नहीं बुलाया था ना ?, वह एक ही सांस में सब पूछ बैठी|
"अरे सब ठीक है, बस यूँ ही आया था मिलने", माँ ने उठते हुए कहा|
"यह पैसे कैसे रखे हैं, किसने दिए, रग्घू ने दिए क्या माँ?, एक बार फिर उसका माथा घूम गया|
"कहीं तुमने वह सड़क वाली जमीन का टुकड़ा तो नहीं बेच दिया उसको", अब वह गुस्से से हांफने लगी थी|
"अरे नहीं, मैंने कुछ नहीं बेचा", अभी माँ की बात ख़त्म भी नहीं हुई थी कि वह फिर बोल पड़ी "मैंने कहा था ना कि मुझे अभी नहीं करनी शादी, फिर तूने ऐसा क्यों किया", उसके अंदर से जैसे क्रोध का ज्वालामुखी फूट पड़ा|
"तू बिना मतलब परेशान हो रही है, ऐसा कुछ भी नहीं है", माँ ने उसे समझाना चाहा लेकिन वह फिर बोल पड़ी|
"पिताजी के नहीं रहने पर किस तरह से तूने मुझे पाला पोसा और आज तूने यह कर दिया| और उस रग्घू ने या चाचा ने कभी पलटकर देखा भी नहीं था और अब एक आखिरी जमीन भी हड़पकर बैठ गया"|
"उसने कोई जमीन नहीं हड़पी और न मैंने उसे बेचा", माँ के इतना कहते ही वह बिफर पड़ी "मुझसे झूठ क्यों बोल रही है, बताती क्यों नहीं कि उसने पैसे क्यों दिए तुझे"|
"अब उसकी बेटी भी बड़ी हो गयी है, बाप है ना", कहते हुए माँ ने उसे पुचकारा|
वह वहीँ खाट पर धम्म से बैठ गयी, माँ उसके लिए पानी लेने चली गयी थी| 

सुख और दुःख-- लघुकथा

"लकवा मार गया है, अब बिस्तर पर ही रहना पड़ेगा इसको| शायद मालिश और दवा से कुछ फायदा हो और चलने फिरने लायक हो जाए कुछ दिन में", डॉक्टर ने एक कागज पर कुछ दवा लिखा और बाहर निकलने लगा|
"हस्पताल में भर्ती कराने से कुछ फायदा होगा क्या डॉक्टर साहब", बिटिया ने पूछा|
"कह नहीं सकता, हो भी सकता है", कहकर डॉक्टर निकल गया|
"माँ, बापू को हस्पताल ले चलते हैं, शायद ठीक हो जाए", बिटिया ने माँ की तरफ देखते हुए कहा|
उसने एक बार खाट पर पड़े लल्लू को देखा और फिर अपनी कमर में बंधे गांठ से कुछ रुपये निकाले|
"जा जरा पंसारी के यहाँ से टमाटर और प्याज तो ले आ", उसने बिटिया को रुपये पकड़ाते हुए कहा| बिटिया अचरज से उसका मुंह देखने लगी "अरे तू पगला गयी है, बापू खटिया पर पड़ा है और तुमको सब्जी की पड़ी है| बापू को कल हस्पताल ले चलते हैं किसी तरह"|
"रहने दे उसको ऐसे ही, कम से कम अब मुझे लात घूंसे तो नहीं लगाएगा| खाने के लिए तो वैसे भी मैं ही कमाती थी, यह तो सिर्फ दारू और मारपीट के लिए कमाता था| जा जल्दी से सामान लेकर आ, आज ठीक से खाना खाएंगे", कहकर उसने एक बार अपने पल्लू से आंसू पोंछा और जाकर लल्लू के सिरहाने बैठ गयी| बिटिया ने थोड़ी देर उसको और बापू को देखा और धीरे से किवाड़ भिड़काकर बाहर निकल गयी|

Tuesday, September 19, 2017

समझ-- लघुकथा

जैसे ही वह ऑफिस से लौटी एक बार फिर वही नज़ारा उसके आँखों के सामने था| कितना भी समझा ले, न तो बेटा समझता था और न ही बाप, दोनों अपने आप को ही समझदार मानते थे| उसके घर में घुसते ही कुछ पल के लिए दोनों खामोश हो गए और उसकी तरफ फीकी मुस्कान फेंकते हुए देखने लगे|
"कब समझोगे तुम विक्की, मान क्यों नहीं लेते कि वह तुमसे ज्यादा समझते हैं| आखिर पिता हैं तुम्हारे, तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है उन्होंने", कहते हुए बैग उसने टेबल पर रखा और सोफे पर अधलेटी हो गयी|
राजन ने उसकी तरफ आश्चर्य से देखा, अक्सर तो इसके विपरीत ही होता था, आज ऐसा क्या हो गया| तब तक विक्की बोल पड़ा "उम्र या अनुभव ज्यादा होने से अगर व्यक्ति समझदार होता तो अपना माली काका हम सबसे समझदार होता माँ"|
बात बहुत तीखी थी और उसके दिल पर लग गयी| लेकिन उसने इसको नज़रअंदाज करते हुए कहा "तुलना करते समय लोगों की परिस्थिति और उनके बौद्धिक स्तर को भी ध्यान में रखना चाहिए विक्की"|
"यही तो मैं भी कहता हूँ, पापा जब तब अपने दोस्तों के बेटों से मेरी तुलना करते रहते हैं| मैं उनकी तरह एम बी ए करके इनके बिज़नेस में लग गया होता तो इनकी नज़र में मैं बेहतर होता", विक्की ने अपने पिता की तरफ देखते हुए कहा|
"तो क्या तुम ही समाज सुधार का काम करने के लिए पैदा हुए हो| जब पेट भरा हो तो मुँह से ऐसी बातें खूब निकलती हैं, दो निवाले के लिए तरसते तब समझ में आता", राजन का लहज़ा भी बहुत तल्ख़ हो गया था|
विक्की ने एक बार उसकी तरफ देखा, वह सोच नहीं पा रही थी कि अब किसे समझाए|
विक्की अपने पिता की तरफ मुड़ा और बेहद संयत स्वर में बोला "आप जो सोच रहे हैं, वह ठीक नहीं है पिताजी| मैं भी अगर निवाले को तरस रहा होता तो यह सब सोच भी नहीं पाता, भरे हुए पेट से जब मैं उन भूखे लोगों के बीच में जाता हूँ तो उनको बेहतर समझ पाता हूँ, आप नहीं समझेंगे"|
उसके राजन की तरफ देखा, राजन भी शायद समझ रहे थे लेकिन उनका पिता भाव उनको यह मान लेने से रोकता था| वह सोफे से उठी, राजन की तरफ मुस्कुरा कर देखा और विक्की के सर पर हाथ फेरते हुए किचन की तरफ बढ़ गयी|

एक छोटी सी बात-- लघुकथा

बहुत परेशान थे मिसिरजी, अब इस उम्र में पिताजी को समझाना चीन को समझाने जैसा था| पिछले कुछ महीनों की घटनाएं भी उनकी परेशानियों में इज़ाफ़ा ही कर रही थीं| जितना ही वह सोचते कि माहौल थोड़ा सुधरे तो पिताजी को समझायें उतना ही सब उल्टा हो रहा था| एक ही मोहल्ले में रहते हुए उन्होंने कभी फ़र्क़ महसूस नहीं किया लेकिन पिताजी तो जैसे अलग ही सोचने लगे थे|
हर त्यौहार और हर सुख दुःख उन्होंने साथ ही मनाया और बांटा था| पहले तो पिताजी ही उनको भेजते थे कि जाओ और उनके साथ मिल कर खेलो, लेकिन अब तो जैसे उस घर की तरफ देखना भी नहीं चाहते थे| उस दिन तो रफ़ीक चाचा ने भी कहा "अमां नाहक ही परेशान हो रहे हो, अब इस उम्र में तो ऐसा होता ही है| तुम्हारे पिताजी तो फिर भी ठीक हैं, हमारे अब्बाजान तो इस उम्र में आते आते इतने बड़े नमाजी हो गए थे कि उनका बस चलता तो हम सब को सिर्फ इबादत में ही बैठा के रखते| अल्लाह उनको सुकून अता फरमाए"|
लेकिन उनको तो महसूस होता ही था कि अब रफ़ीक़ चाचा या उनके परिवार के लोग पहले की तरह बेधड़क उनके घर नहीं आते थे, हाँ उनका परिवार पिताजी से नजर बचाकर गाहे बगाहे उनके घर जरूर हो आता था|
मिसिरजी को लग रहा था कि अब कुछ नहीं हो सकता और इसी उधेड़बुन में खोये ऑफिस चले गए| शाम को अचानक घर से फोन आया कि जल्दी घर आओ, पिताजी बहुत बीमार हैं तो वह भागते हुए घर पहुंचे| घर में घुसते ही पत्नी मिल गयी और उनके कुछ पूछने से पहले ही उनका हाथ पकड़कर पिताजी के कमरे की तरफ ले चली| कमरे में पिताजी बिस्तर पर लेटे हुए थे और आरिफ चाचा का पोता उनको रामायण पढ़कर सुना रहा था|
आहट सुनकर पिताजी ने उनकी तरफ देखा और उनकी निगाहें बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह गयीं| 

जड़ें-- लघुकथा

घर में घुसते ही उसे लग गया कि आज भी पिताजी कुछ अनमने से हैं, अब यह बात उसे परेशान करने लगी थी| कमरे में पहुँच के उसने शर्ट उतारी तब तक मिन्नी भी आ गयी| जब मिन्नी के बढ़े हुए हाथ से उसने पानी का ग्लास नहीं लिया तो मिन्नी को भी खटका|
"क्या बात है, आज परेशान हो, कुछ खास वजह?, मिन्नी ने ग्लास मेज पर रखते हुए कहा|
"पता नहीं मैं सच सोच रहा हूँ या गलत, लेकिन मुझे लगता है जैसे पिताजी आजकल कुछ उदास रहने लगे हैं", उसने पानी का ग्लास उठाते हुए कहा|
"मैं तो हमेशा उनसे बात करती रहती हूँ, अक्सर उनसे पूछ कर ही खाना बनाती और खिलाती हूँ, कहीं तुम कुछ और तो नहीं सोच रहे?, मिन्नी के माथे पर चिंता की लकीरें फ़ैल गयीं|
"अरे तुम तो उनका जितना ख्याल रखती हो, उतना तो मैं भी नहीं रखता| लेकिन उनकी उदासी की वजह जानना जरुरी है, आज ही पूछता हूँ", कहकर वह ड्राइंग रूम में चल दिया| मिन्नी भी पीछे पीछे आयी और खड़ी हो गयी|
"क्या बात है पिताजी, आप आजकल थोड़े उदास लग रहे हैं? माँ की याद आ रही है क्या आजकल", उसने पिताजी के मन को हल्का करने की कोशिश करते हुए कहा|
पिताजी इस अचानक हुए सवाल से चौंक गए और संभलते हुए बोले "अभी तू थका मांदा ऑफिस से आ रहा है और ये सब क्या बात करने लगा| अरे बेटी तूने इसे पानी वानी दिया कि नहीं", बात टालने की गरज से पिताजी ने कहा|
"नहीं पिताजी, सच सच बताईये, पहले तो आप बहुत मजे में मुझसे बात करते थे लेकिन आजकल कुछ कम बात करते हैं| बेटी को भी नहीं बताएँगे आप?, मिन्नी ने भी पिताजी के पास बैठते हुए कहा| 
"कोई बात नहीं है, अब इस बंगले में किसी चीज की कमी भी तो नहीं है, हर सुख सुविधा तो है यहाँ| बस ऐसे ही कभी कभी हो जाता है, अब उम्र भी तो हो चली मेरी", पिताजी ने स्नेह से मिन्नी के सर पर हाथ फेरा|
"तो फिर आप पहले जैसे खुश रहा कीजिये ना, हमारे लिए ही सही", मिन्नी ने एक बार फिर उनसे मनुहार किया|
"अरे तू चिंता मत कर, मैं बहुत खुश रहता हूँ| बस तू एक काम कर सकता है क्या, बंगले के पिछवाड़े का फर्श हटाकर वहां मिट्टी की एक क्यारी बनवा दे, मिट्टी से बहुत दूर हो गया हूँ आजकल", पिताजी ने जैसे कुछ याद करते हुए कहा|
अब उसे समझ में आ गया था, किसान पिता को मिट्टी से दूर करके वह कैसे खुश रख सकता है| उसने मिन्नी की तरफ देखा और दोनों मुस्कुरा पड़े|
पिताजी इन सबसे बेखबर दूर कहीं अपने गांव और खेतों में खो गए थे|

Monday, September 11, 2017

सिंदूर-- लघुकथा

बगल वाली खोली से हंसने की आवाज़ आ रही थी और रानू के बड़े बेटे की आवाज़ भी "आज नौकरी की चिट्ठी मिल गयी माई, बहुत जल्दी यहाँ से निकल जायेंगे"| उसके हाथ झाड़ू लगाते हुए रुक गए और वह सोचने लगी कि जाकर रानू को बधाई दे या नहीं| उसकी नज़र एक कोने में पड़े अपने पति पर पड़ी जो दारू पीकर बेसुध सोया पड़ा था और उसके मुंह से लार बहकर चेहरे पर फ़ैल गया था|
कुछ ही दिन पहले वह कितना खुश थी कि उसका पति उस गटर में नहीं गया था| उस दिन भी वह इसी तरह दारू पीकर पड़ा हुआ था और रानू का पति चला गया था गटर साफ़ करने| फिर कुछ ही घंटों में उसका शव बाहर निकला और उसने अपने सिंदूर की सलामती के लिए भगवान को ढेर सारा धन्यवाद दिया|
बाद में जैसे जैसे खबर आती गयी कि रानू को बड़ा मुवावज़ा मिलेगा और उसके बेटे को नौकरी भी मिलेगी, उसका दिल बैठने लगा| पुरे दिन हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी उसे दो जून की रोटी मुश्किल से मिलती थी और उसपर निकम्मा पति दारू पीकर मारपीट करता और घर में पड़ा रहता| बेटा भी अब अपने बाप के नक़्शे पर चलने लगा था और कभी कभी वह भी दारू पीकर आता था|
यही सब सोचते विचारते वह भारी मन से रानू के खोली में पहुंची| रानू के बेटे ने उसे ख़ुशी ख़ुशी एक मिठाई खिलाई और उसने भी फीकी हंसी हँसते हुए उसको आशीर्वाद दिया| रानू की सूनी मांग को देखकर एक बार फिर उसे अपना सिंदूर अच्छा लगने लगा लेकिन उसके घर में आये बदलाव को वह देखती रह गयी|
हाथ में मिठाई लिए वह वापस अपनी खोली में पहुंची और पति को जगाने लगी| पति के उठते ही एक बदबू का झोंका उसके आस पास तैर गया और वह उबकाई लिए हुए नल की तरफ चली गयी| मुंह धुलने के बाद नल के ऊपर लगे आईने में उसको अपना चेहरा दिखा, माथे का सिंदूर काफी धुल चुका था| एक बार फिर उसने अपने शराबी पति को हताशा से देखा और फिर थोड़ा सा पानी लेकर अपने माथे का पूरा सिंदूर पोंछ दिया|

फंदा-- लघुकथा

"मैं उसे मारना नहीं चाहता था सर, बस उसका मुंह दबा कर उसे किडनैप करना चाहता था| मुझसे अनर्थ हो गया, अब जो चाहे सजा दिलवा दीजिये", बोलते बोलते सोनू फूट फूट कर रोने लगा|
"बस किडनैप करने के चक्कर में तूने उस मासूम का खून कर दिया, पैसों के चक्कर में तुम लोग कुछ भी कर सकते हो| तुझ जैसे दरिंदों को तो समाज में जिन्दा रहने का कोई हक़ नहीं है", इन्स्पेक्टर ने शब्दों को चबाते हुए कहा| पुलिस स्टेशन में काफी भीड़ इकठ्ठा हो गयी थी और तब तक बच्चे के पिता डॉ सरकार भी पहुँच गए|
"इसे जिन्दा मत छोड़ना सर, हत्यारा है यह, अरे क्या बिगाड़ा था मेरे बच्चे ने तेरा", कहते हुए डॉ वहीं रखी कुर्सी पर लुढ़क गए| पास खड़े एक व्यक्ति ने उनके चेहरे पर पानी छिड़का और कुछ और लोग उनको सँभालने लगे|
सोनू हाथ जोड़े खड़ा था और पुलिस उसके खिलाफ रिपोर्ट लिख रही थी| तब तक डॉ फिर से बिफर पड़े "अरे तेरे जैसे हत्यारों को तो चौराहे पर फांसी दे देनी चाहिए"|
सोनू ने एक बार डॉ की तरफ देखा और फिर हाथ जोड़े हुए ही उसने कहा "डॉ साहब मेरे बच्चे का क्या कसूर था, क्यों आपने सिर्फ पैसे के लिए उसे अपने यहाँ भर्ती करने से मना कर दिया था?
डॉ सरकार ने उसे गौर से देखा और उनको कुछ दिन पहले का वाकया याद आ गया| इसी का बच्चा था जिसे उन्होंने भर्ती करने से मना कर दिया था और वहीँ बच्चे की मौत हो गयी थी| वह धीरे से कुर्सी से उठे और वापस मुड़ गए, रास्ते में हर चौराहे पर उनको फांसी का फंदा लटकता नज़र आ रहा था|

Sunday, June 4, 2017

आज का समय-- लघुकथा

"क्या क्या सहूलियत नहीं दी थी पढ़ने के लिए और नतीजा सिफर", एकदम आपा खो बैठी थी वह बेटे का रिजल्ट देखकर|
"पर माँ नंबर तो ठीक ही आये हैं और पास भी हो गया हूँ", बेटे ने प्रतिकार करना चाहा|
"क्या खाक नंबर आये हैं, जिसको देखो व्ही अपने बच्चे का १० सीजीपिए बता रहा है| आजकल किसी अच्छे कालेज में मिलता है दाखिला इन नंबर से", वह अभी भी उतने ही गुस्से में थी|
"मैंने तो पहले ही कहा था कि मेरा मन पढ़ने में बहुत नहीं लगता, फिर भी मैंने अपनी तरफ से पूरी मेहनत कि थी", बेटे ने एक बार और अपनी बात रखनी चाही|
"अब लोग पूछेंगे तो क्या बताउंगी इसके बारे में" कहते हुए वह सोफे पर धंस गयी|
"लोगों ने कभी मेरे बारे में पूछा है तुमसे, मैं तो हमेशा द्वितीय श्रेणी में ही पास हुआ| और ऐसे वक़्त में तो हमारे सहारे कि जरुरत है उसको, न कि इस तरह से हतोत्साहित करने की", उसने पत्नी के कंधे पर हाथ रखा|
"वो समय और था, आज कितना कम्पटीसन है आपको तो पता ही है", पत्नी का स्वर अब थोड़ा मद्धिम था|
"यह जीवन का अंत नहीं है, बस एक पड़ाव है, उसे अपने हिसाब से आगे बढ़ने दो| और तुम सच कह रही हो, अब समय बदल गया है, आज के बच्चे अपना भविष्य खुद सोच सकते हैं", कहते हुए उसने बेटे को अपने आगोश में भर लिया|
उसने भी बेटे को अपनी बाँहों में भींच लिया और उसके ललाट पर चुम्बन जड़ दिया| 

Friday, March 31, 2017

अनकहे सवाल-- लघुकथा

सुबह से ही उसका दिल बुरी तरह धड़क रहा था, कितने ही प्रकार की आशंका उसके मन में उमड़ घुमड़ रही थी| रह रह कर उसके दिमाग में उसके मित्र की बात आ रही थी "सिर्फ सही लिख देने से ही नहीं हो जाता सब कुछ, और भी बहुत कुछ करना पड़ता है इसके लिए| वैसे तुम कहो तो कुछ बात करूँ मैं, रेट तो सबको पता है और सही आदमी को मैं जानता हूँ"|
उसने सर हिलाकर इनकार कर दिया, कहना और भी बहुत कुछ चाह रहा था लेकिन उसने अपने अंदर ही जज्ब कर लिया| क्या इतनी जी तोड़ मेहनत उसने इसीलिए की थी कि अंत में यह भी करना पड़े, पैसे तो वैसे भी नहीं थे उसके पास|
दोपहर जैसे जैसे नजदीक आ रही थी, उसका घर में रहना कठिन होने लगा| एक तो माँ की नजर हमेशा कुछ सवाल करती रहती थी, हालाँकि कहती कुछ भी नहीं थी वह| दूसरे कहीं भाभी से आमना सामना हो गया तो कुछ न कुछ सुनना ही पड़ जाता था| उसने वही पुरानी वाली जीन्स पहनी और फोन लेकर चुपचाप निकल गया, पता नहीं क्यों उसको लगने लगा था कि जब भी वह इस जीन्स को पहनता था, कुछ बेहतर होने की सम्भावना लगती थी|
अपनी पुरानी चाय की दूकान वाले अड्डे पर आकर वह बैठ गया और कब उसके पास चाय आ गयी और वह पी भी गया, उसे पता नहीं चला| चाय वाले ने उसको टोका "क्या बात है भैया, आज कुछ बोल नहीं रहे" तो उसने अपने आप को यथासंभव सामान्य करते हुए मुस्कुराने की नाकाम कोशिश की|
"कुछ नहीं चाचा, आज रिजल्ट है ना, उसी के चलते थोड़ा सोच रहा था", और उसने एक बार अपने फोन में समय देखा| अब तक तो रिजल्ट आ गया होगा, सोचकर उसका दिल बैठने लगा| अगर उसका नाम होता तो जरूर फोन आता, आज भी वह खुद रिजल्ट देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था| तभी फोन बजा, स्क्रीन पर दोस्त का ही नाम था, उसने तुरंत उठाया और बात करने लगा|
कुछ ही मिनटों बाद वह सर झुकाये वापस जा रहा था, माँ की आँखों के सवालों का जवाब आज भी उसके पास नहीं था|

Tuesday, March 14, 2017

चुन्नूलाल की होली-- लघुकथा

और फिर चुन्नूलाल निकल पड़े जेब में रंग की पुड़िया लेकर, आज तो मौका भी था होली का तो फिर क्या सोचना| पिछले एक साल से जब जब उसको देखते, उनके दिल में रंग ही रंग उमड़ने लगते| लेकिन सामने पड़ते ही हिम्मत जवाब दे देती, कहाँ  वह बला की खूबसूरत और कहाँ चेचक के दाग वाला उनका चितकबरा मुँह| कभी कभी तो उसको देखने के बाद पूरा पूरा दिन अपनी शक्ल ही आईने में नहीं देखते थे|
एक बार तो बस में सामने ही बैठी दिख गयी थी तो उस दिन अपना स्टॉप उनको याद ही नहीं रहा| बस से उतर कर वापसी की बस पकड़ी और ऑफिस पहुंचे और तमाम बहाने बनाने के बाद भी काफी जलालत झेली थी उन्होंने| खैर अब ऐसे हाल में कहाँ फ़र्क़ पड़ना था तो नहीं पड़ा और चुन्नूलाल मौके ढूंढते रहे| लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी चुन्नूलाल पिछले कई महीनों में उससे बात करने का कोई मौका नहीं पा सके थे| लेकिन वह इस बात से भी बेखबर थे कि उनके इस दीवानगी की भनक उसको लग चुकी थी| और इसी वजह से अब उनको कोई भी मौका नहीं मिल पा रहा था उसके आस पास भी पहुँचने का|
आज चुन्नूलाल जैसे ही उसके दरवाजे के सामने पहुंचे, उसने देख लिया| इधर चूनूलाल जेब से रंग की पुड़िया निकाल कर उसके सामने पहुंचे, उधर उसके दोस्तों ने चूनूलाल को पकड़ कर उठाया और कीचड़ के ढेर में पटक दिया| किसी तरह कीचड़ से निकलकर चुन्नूलाल भागे, लेकिन पीछे से आती हंसी ऐसा लगता था जैसे उनके साथ साथ ही चल रही थी|     

Monday, March 6, 2017

गुलाल-- कहानी

और एकदम से लहुरी पंडित के हाथ से गुलाल की पुड़िया खुली और सुगनी के सर से लेकर चेहरे पर अब रंग ही रंग नजर आ रहा था| अचकचा तो वह भी गए और सुगनी भी, लेकिन अब तो रंग चढ़ चुका था और लहुरी के दिल में भी कुछ रंग आने लगे| कितने ही महीनों से सोच रहे थे लहुरी, गाहे बगाहे अहिरान के इस तरफ चले भी आते, लेकिन ना तो कभी हिम्मत पड़ी और ना कभी कुछ कह पाए|
याद तो उनको भी नहीं पड़ता था कि कब सुगनी उनके मन में उतर गयी| छोटपने में तो जब मर्जी वह अहिराने चले जाते थे और उनके दरवाजे पर भी सुगनी अपने माई के साथ आ जाती थी| कई पीढ़ी से यही चलन था कि लहुरी पंडित के घर की गइया को दुहने का काम अहिराने में सगुनी के घर वाले ही करते थे| अच्छी खासी खेती भी थी और कई गाय बैल भी दरवाजे पर शोभा बढ़ाते थे| धीरे धीरे समय के साथ बैल नहीं रहे लेकिन गायें तो अभी भी थीं और उनके दूध के लिए अहिराने वाले आते रहे| उम्र में भी ज्यादे फ़र्क़ नहीं था उनके और सगुनी के, इसलिए भी दोनों साथ साथ खेल भी लेते थे| कुछ ही सालों में उनको लगने लगा कि सगुनी के साथ बतियाना और खेलना उनको बहुत अच्छा लगता था| बस उनकी छोटपन से ही बदमासी की आदत थी और किसी को भी मार देते थे| शुरू शुरू में तो सगुनी रोते हुए उनकी शिकायत घर पर कर देती या अपनी माई से कहती लेकिन कुछ बड़े होने पर उन्होंने महसूस किया कि अब सुगनी उनसे मार खाकर भी किसी से शिकायत नहीं करती थी| उनको थोड़ा अजीब तो लगता था, लेकिन फिर तुरंत भुला भी देते थे|
एकदिन तो उन्होंने गुस्से में सुगनी का सर गइया के नाद से कस के लड़ा दिया| सुगनी चीखी और उसके सर से खून बह निकला, लहुरी की हालात ख़राब हो गयी कि आज तो बहुत डांट पड़ेगी| अभी वह यह सब सोच ही रहे थे कि सुगनी की माई सामने से आती दिखी| लहुरी के पैर वहीँ जम कर रह गए, कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि कहाँ भागें| सुगनी की माई भी बहते खून को देखकर घबरा गयी लेकिन सुगनी ने कह दिया कि वह फिसलकर नाद पर गिर गयी थी| अगले कुछ दिन तक लहुरी सुगनी से आंख नहीं मिला पाए थे, कुछ तो अंदर से कचोटता था उनको|
धीरे धीरे उनको लगने लगा था कि सुगनी उनको बहुत अच्छी लगती है| उसके आस पास भी होते तो उनको दुनियां बहुत सुंदर लगने लगती| कई बार कुछ कहना चाहते लेकिन समझ नहीं पाते कि क्या कहें| हाँ, सुगनी ने जरूर कई बार उनको छेड़ा "का पंडित, आजकल बहुत सज धज के रहते हो, कौनो पसंद आ गयी है का?
लहुरी शर्मा जाते, कुछ कहने का सोचते लेकिन तब तक सुगनी आँखों के सामने से ओझल हो जाती| उनको पता भी नहीं चला कि कब वह लहुरी से पंडित हो गए सुगनी के लिए|
उधर उन दोनों के विचारों से अनजान सुगनी के घरवालों ने एक रिश्ता ढूँढ लिया उसके लिए| वैसे भी ना तो लहुरी की हिम्मत थी कि कुछ कहें और ना ही सुगनी ने सोचा था| बस कुछ महीनों के अंदर ही सुगनी के दरवाजे पर बारात आयी और वह अपने घर चली गयी| शादी के लिए वह लहुरी को कहने भी आयी थी लेकिन लहुरी जा नहीं पाए| "पंडित आओगे ना हमारी शादी में", कई बार पूछा सुगनी ने लेकिन लहुरी का सर हामी के लिए नहीं हिला| लहुरी का पूरा परिवार सुगनी की शादी में गया, सबने उनको भी कहा लेकिन सर दर्द का बहाना बना कर लेटे ही रहे लहुरी|
शादी बीत गयी, रात मे बजता गाजा बाजा उनको तकलीफ देता रहा, वह चाह कर भी अनसुना नहीं कर पाए. समय के साथ साथ टीस थोड़ी कम तो हुई लेकिन पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुई. अब तो अहिरान की तरफ जाने से भी कतराने लगे लहुरी पंडित, कुछ काम भी पड़ता तो महटिया जाते| 

हार या जीत--लघुकथा

"ऊ कोने वाली ज़मीन हमारे नाम लिख दो नहीं तो बहुत पछताओगे", दुक्खू के कान में रज्जू के शब्द एक बार फिर गूंज रहे थे| सालों से उसकी नजर थी उस ज़मीन पर, लेकिन दुक्खू बेचने के लिए तैयार नहीं था|
"वही तो एक ठो ठीक ज़मीन है हमारे पास, उसको कैसे दे दें| और आपके पास ज़मीन की कौन सी कमी है", दुक्खू ने जवाब दिया था और आगे बढ़ गया|
रोड से सटे उस कोने वाली ज़मीन के चलते रज्जू का प्लाट टेढ़ा था, और उसने कई बार समझाने का प्रयास किया दुक्खू को| आखिरकार उसने धमकी भी दे डाली लेकिन दुक्खू ने कान नहीं दिया|
होलिका दहन के समय इस बार रज्जू ने खूब मेहनत की, सारे गाँव को बुलाया और दुक्खू के घर भी गया बुलाने| इधर सारा गाँव होलिकादहन के लिए इकठ्ठा हुआ और उधर दुक्खू के घर की तरफ कुछ साये लपके|
थोड़ी देर बाद ही एक जगह होलिका जल रही थी तो दूसरी तरफ दुक्खू अपने घर को जलता देख रहा था| रज्जू अपनी जीत पर उल्लास मना रहा था लेकिन दुक्खू ने अब अपने उसी कोने वाली ज़मीन पर अपना झोपड़ा बनाने का इरादा कर लिया|   

Tuesday, February 28, 2017

परिवर्तन--लघुकथा

"कब से चल रहा है ये सब इस घर में", कर्नल साहब गुस्से से आग बबूला हुए जा रहे थे|
सामने बैठे बेटे के चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगीं, वह कुछ कहने का साहस जुटा पाने में अपने आप को असमर्थ महसूस कर रहा था|
"बोलते क्यों नहीं, अब सांप सूंघ गया तुमको| कभी सोचा नहीं कि ऐसा करके अपने खानदान की प्रतिष्ठा को गर्त में ढकेल दोगे ", कर्नल साहब की ऑंखें अलमारी की तरफ बढ़ गयीं जहाँ पर रखे हुए तमाम मैडल उनके गौरवशाली अतीत को दर्शा रहे थे|
"पापा, जाने दीजिये, आखिर उसने गलत क्या किया है", बेटी ने हिम्मत दिखाई और पापा के सामने आ खड़ी हुई|
"तुम चुप रहो, तुमने तो अपने पिता की इज़्ज़त रखी है, किसी की भी परवाह न करके तुमने एयर फ़ोर्स में जाने का फैसला लिया| और एक ये हैं कि ?, कर्नल साहब फिर से गुस्से में उफन पड़े|
"वही तो मैं भी कह रही हूँ पिताजी, आखिर जब मैंने सबकी सोच के खिलाफ अपना करियर चुना तो आपको फ़क़्र हुआ था, तो आज इसको क्यों नहीं चुनने देते", बेटी ने उनको पीछे से पकड़ लिया|
कर्नल साहब कुछ नम्र हुए, बेटी का हाथ सहलाते हुए बोले "लेकिन बेटे, लोग क्या कहेंगे कि कर्नल का बेटा और ये कर रहा है"|
"पापा, लोगों की सोच पर अपने फैसले मत कीजिये, जैसे आपने मुझे अपना फील्ड चुनने दिया, उसी तरह इसको भी अपना करियर बनाने दीजिये", कह कर उसने पापा को एक बार फिर से प्यार से देखा|
"भाई कल से तुम अपने कत्थक गुरु को घर पर ही बुला लो और खूब जम कर प्रैक्टिस करो, पापा का नाम तुमको भी तो ऊँचा करना है", कहते हुए बेटी ने भाई को अपनी तरफ बुलाया|
कर्नल साहब के खुले बाँहों में दोनों बच्चे समां गए, किनारे खड़ी उनकी पत्नी की आँखों से ख़ुशी के कुछ बूंद टपक गए| 

Sunday, February 26, 2017

सपनों की चाभी--लघुकथा

"अरे कल कहाँ रह गया था तू, आजकल बहुत नागा करने लगा है", जलती निगाह से देखते हुए सोहन ने उसको घुड़का|
"कुछ जरुरी काम आ गया था मालिक, आगे ध्यान रखूँगा", कहकर उसने खरहरा उठाया और दरवाजा साफ़ करने लगा|
"अच्छा तेरे परीक्षा का क्या हुआ, कुछ निकला उसका", व्यंग से सोहन ने उसे टोका|
"अभी नहीं निकला है मालिक", कहकर वह वापस काम में लग गया|
"इन लोगों को भी कलक्टर बनने का सपना दिखता है आजकल, पता नहीं इ सब काम कौन करेगा", सोहन बड़बड़ाते हुए खलिहान की तरफ निकल गया|
उसने एक मिनट के लिए खरहरा रोका और जेब में पड़े हुए साक्षात्कार के पत्र को एक बार फिर से टटोला| उसे स्पर्श करते ही अपने संघर्ष उसको याद आ गए| एक जंग लगी चाभी मिटटी से झांकती नजर आयी तो उसने उसे उठा लिया| ऐसी ही चाभी तो अभी उसके जेब में भी है जिससे वह अपने पुरखों के बंद सपनों को खोल सकेगा, सोचते हुए उसके हाथ अब जल्दी जल्दी चल रहे थे|

खबर--लघुकथा

बीस साल बाद आज जोखन लौटा था गाँव, कितनी बार घरवालों ने बुलाया, कितने प्रयोजन पड़े, लेकिन जोखन ने कभी भी गाँव की तरफ जाने का नाम नहीं लिया था| कितनी बार लोगों ने पूछा, लेकिन कभी उसने वजह नहीं बताया| आज गाँव में आकर उसे सब कुछ बदला बदला लग रहा था, कुछ भी पहचाना नहीं लग रहा था| पिताजी से हाल चाल करके वह गाँव में घूमने निकला और कुछ ही देर में गाँव के बाहर खेतों में खड़ा था| खेत भी अब खेत कम, प्लाट ज्यादा लग रहे थे| खेतों को पार करता हुआ वह बगल के गाँव के रास्ते पर चल पड़ा| कभी पगडण्डी जैसा रास्ता अब कंक्रीट का बन गया था लेकिन उसपर से गुजरने वाले कदम अब कम हो गए थे|
बगल के गाँव में पहुँच कर उसने उस घर की तरफ कदम बढ़ाया जहाँ बीस साल पहले वह आखिरी बार आया था| उस आखिरी बात के बाद कि "हमारा साथ संभव नहीं है, अपनी अलग जिंदगी बसा लो| हाँ मेरी दुआएं हमेशा साथ रहेंगी और तुम जितना आगे बढ़ोगे, मैं भी उतना ही खुश रहूंगी", जोखन ने कभी पलट कर नहीं देखा| इस बात का पता उन दोनों ने आज तक किसी किसी को भी नहीं लगने दिया था|
इस बीच उसे खबर मिलती रही कि रंजू की शादी हो गयी और वह किसी और गाँव में चली गयी| वह भी अपनी जिंदगी में व्यस्त होता गया और अपनी हर तरक्की उसे यह सुकून जरूर देती रही कि रंजू को भी ख़ुशी मिल रही होगी| लेकिन पिछले हफ्ते जो खबर उसे मिली उसने उसके होश उड़ा दिए|
अब तो बस मन में एक इच्छा थी कि एक बार पता चल जाए कि जो खबर उसने सुनी थी वह सच है कि नहीं| बड़ी जद्दोजहद के बाद उसने गाँव आकर एक बार रंजू के घर जाकर पता लगाने का फैसला लिया था| घर में तो वह किसी से पूछ नहीं सकता था इसलिए मन ही मन वह मनाता आया था कि खबर गलत ही हो| आखिर उसकी बात गलत कैसे हो सकती थी, उसकी तरक्की से तो रंजू की खुशियाँ बढ़नी थी| बस दो ही घर बाद उसकी गली आने वाली थी और जोखन का दिल बुरी तरह धड़क रहा था कि किसी आवाज ने उसको रोका "अरे जोखन, कैसे हो और कब आये, बहुत साल हो गया था तुमको देखे"|
उसने पलट कर देखा, रंजू के पिताजी थे| क्या कहे, क्या पूछे, उसके दिमाग ने जैसे काम करना बंद कर दिया| बस किसी तरह इतना कह कर कि "आज ही आया था चाचा, ठीक हूँ", पलट कर अपने गाँव की तरफ चल पड़ा| पीछे से आती आवाज उसे जैसे सुनाई ही नहीं पड़ रही थी और उस खबर के बारे में पूछने की हिम्मत जोखन गँवा चुका था|      

Monday, January 30, 2017

उपयोगिता--लघुकथा

दरवाजे पर चहल पहल मची हुई थी, एक किनारे दद्दू खटिया पर लेटे हुए सब कुछ चुपचाप देख रहे थे| बड़के नाती ने एक बार फिर फोन लगाया और पूछा "और कितना टाइम है आने में"| उधर से कुछ आवाज़ आयी और उसने सर हिला दिया| उसकी बेचैनी और उत्साह देखते ही बन रहा था|
दद्दू ने एक बार उठने की कोशिश की, लेकिन एक तो कमर दुहरी हो गयी थी, उसपर से घुटने का दर्द, उठ नहीं पाए| फिर उन्होंने सोचा की नाती को आवाज़ लगाएं, लेकिन वह दरवाजे से खलिहान की तरह चला गया था| दद्दू बेबसी में लेटे लेटे दरवाजे का मुआयना करने लगे| कभी चरनी पर कम से कम दस नाँद और खूंटे हुआ करते थे, कुछ बैलों के, कुछ गायों के और एक भैंस का| दिन भर उनका इनके चक्कर में लगा रहता था, खेत से जैसे ही लौटते थे, सभी जानवर उनको देखकर मुंह उठा कर अपनी तरफ बुलाते थे| दद्दू भी सबके पास जाकर उनके चेहरे पर हाथ फेरते और फिर उनके सानी पानी में लग जाते| लेकिन आज तो सिर्फ दो खूंटे बचे थे जिनपर दो जर्सी गायें बंधी थीं|
इसी सोच में डूबे हुए थे दद्दू कि बड़का नाती दौड़ते हुए खलिहान से आया और दरवाजे की तरफ भागा| दद्दू उचक कर देखने की कोशिश करने लगे तभी दरवाजे पर धड़धड़ाता हुआ ट्रैक्टर आया| ड्राइवर के ब्रेक लगाकर रोकते ही बड़का नाती लपक कर ट्रैक्टर पर चढ़ने लगा|
कोने में बड़ी मुश्किल से टिकाकर रखा हुआ बैलगाड़ी का ढांचा ज़मीन हिलने से लुढ़क गया| पूरे घर की नजर ट्रैक्टर पर थी लेकिन दद्दू की नजर ढांचे पर पड़ी और वह कमर पर हाथ रखकर वापस खटिया पर लेट गए|

Wednesday, January 25, 2017

कठिन फैसला--लघुकथा

"मैं उससे शादी नहीं कर सकती", उसने एक बार फिर से वही दुहराया जो वह माँ के सामने कह चुकी थी|
सुनकर पिता को अंदर ही अंदर काफी ख़ुशी भी हुई, आखिर उनकी बेटी में कोई कमी नहीं थी फिर वह क्यों ऐसे लड़के से शादी करे| लेकिन थोड़ा झटका भी लगा उनको, ऐसी उम्मीद नहीं थी उनको| कहाँ तो उन्होंने सोचा था कि वही कहेंगे कि इस लड़के से अब शादी मत करना और जमाने की परवाह तो बिलकुल मत करना|
"लेकिन बेटी, अगर यह दुर्घटना शादी के बाद होती तो क्या करती तुम", पिता ने फिर भी पूछा|
"तब शायद उसे अपने अपाहिज होने का इतना गम नहीं होता, लेकिन अब अगर मैं करती हूँ तो वह जीवन भर हीन भावना से उबर नहीं पायेगा", कहते हुए वह कमरे में घुस गयी|
इस कठिन फैसले को लेने में जो तकलीफ वह झेल रही थी, वह उनको दिखाना नहीं चाहती थी| 

Wednesday, January 18, 2017

रिश्ते--लघुकथा

"तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो", बालों में अंगुलियां फिराते हुए उसने कहा|
"हूँ", कहते हुए वह खड़ी होने लगी|
"थोड़ी देर और बैठो ना", उसने उसका हाथ पकड़ कर खींच लिया| वह वापस बिस्तर पर बैठ गयी|
"सच में तुमको देखे बिना चैन नहीं मिलता", एक बार फिर उसने उसका हाथ पकड़ा|
वह उसको लगभग अनदेखा करते हुए बैठी रही| थोड़ी देर बाद वह फिर से उठने लगी तो उसने कहा "तुम जवाब क्यों नहीं देती, क्या मैं तुम्हें अच्छा नहीं लगता?
"लगते तो हो, लेकिन तुम्हीं नहीं, बाकी सब भी", उसने एक गहरी नजर डाली और खड़ी हो गयी|
उसको बुरा लगा, सबके बराबर बना दिया उसने|
"मैं बाकियों जैसा नहीं हूँ, तुमसे एक रिश्ता सा जुड़ गया है अब", और भी कुछ बोलना चाहता था वह लेकिन उसकी नजर से सामना होते ही जैसे शब्दों ने उसका साथ छोड़ दिया|
"मुझे यहाँ लाने वाला भी मुझसे बहुत गहरा रिश्ता रखता था, आगे से रिश्ते की बात मत कहना"|
वह दरवाजा खोलकर बाहर निकल गयी, उसने भी चुपचाप कपडे पहने और निकल गया|