Translate

Tuesday, September 30, 2014

बालों की देखभाल--

बचपन का समय बहुत प्यारा था , सबका होता है , सिर्फ उन बच्चों को छोड़कर जो दुकानो एवम अन्य जगहों पर काम करते हैं | पता नहीं क्यों , लेकिन शुरू से ही बालों में तेल लगाने की आदत पड़ गयी ( जो आज भी बदस्तूर जारी है ) | शायद पहले माँ , आजी इत्यादि रोज ही तेल चुपड़ देतीं थीं तो धीरे धीरे वो कब दिनचर्या में शामिल हो गया पता नहीं चला | शुरू में तो सिर्फ कड़ुआ तेल ( सरसों का तेल ) ही होता था लगाने के लिए लेकिन जैसे जैसे बड़े होते गए , कड़ुआ तेल पीछे छूट गया | 
फिर समय आया आमला तेल का , डाबर आमला | नहाने के बाद पहला काम होता था बालों में तेल लगाना | फिर उसके बाद किसी और चीज की जरुरत महसूस नहीं होती थी , न तो कोई क्रीम , न कुछ और | श्रृंगार के नाम पर सिर्फ और सिर्फ बालों में तेल | फिर हॉस्टल में आये , देखा की अव्वल तो कोई तेल लगाता ही नहीं और अगर लगाता है तो केओ कार्पिन | अब समाज में रहना था तो उसी हिसाब से बदलना पड़ा अपने तेल को भी | कुछ सीजन में पैराशूट नारियल तेल भी लगाते थे और बाकि समय केओ कार्पिन | फिर प्रचार देख कर महसूस हुआ कि तेल लगाने से बालों में चिपचिपाहट भी होती है तो खोज शुरू हुई ऐसे तेल की जो चिपचिपाहट रहित हो |
एक मित्र थे जो सौंदर्य प्रसाधनो के जानकार थे | उन्होंने राय दी कि आजकल तमाम लाइट तेल आ रहे हैं , उनका प्रयोग करो | खैर अब तेलों में भी लाइट तेल की खोज शुरू हुई और उसका इस्तेमाल प्रारम्भ हो गया | उसी समय उनकी सलाह पर कैंथरैडिन तेल मिला जो सचमुच बहुत लाइट था और बिलकुल पता नहीं चलता था |
कॉलेज ख़त्म हुआ और नौकरी की शुरुआत हुई | तमाम नयी चीजों , जैसे शेविंग क्रीम लगाना , डेओ लगाना और परफ्यूम इत्यादि का प्रयोग शुरू हो गया , लेकिन सर पे तेल लगाने की आदत बदस्तूर जारी रही | कहीं भी बाहर जाना होता तो मंजन ब्रश के अलावा अगर किसी और चीज की बेशाख्ता जरुरत महसूस होती तो वो बालों के तेल की ही | शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि नहाने के बाद तेल का प्रयोग नहीं किया हो बालों में |
अभी भी वो आदत बरक़रार है , बस तेल अब बदल कर आलमंड का हो गया है | लेकिन एक बात का अफ़सोस रहता है कि काश अपने सर की खेती थोड़ी कमजोर होती तो शायद धन के मामले में इतना कमजोर नहीं रहते ( सुना है , पढ़ा है और देखा भी है की पैसा उनके पास ही बहुतायत में रहता है जिनके सर पर बाल कम होते हैं ) |

Sunday, September 28, 2014

बच्चे--

" कहाँ से ले आई ये गन्दी गुड़िया ", मम्मी ने उसे बाहर फेंक दिया |
" मुझे वही चाहिए " , मुन्नी चिल्लाने लगी |
" इतने सारे सुन्दर खिलौने हैं तो तुम्हारे पास , जिद नहीं करते "|
माली की लड़की अपनी गुड़िया लेकर भाग गयी , मुन्नी रोते रोते सो गयी |
अगले दिन माली की लड़की नए खिलौने से खेल रही थी और मुन्नी पुरानी गुड़िया से |
" ये बच्चे न ", दोनों माताएं सोच रहीं थी |

ऑंखें --

पूरी रात लगा रहा वो माँ की मूर्ति को पूरा करने में | अब सिर्फ रंग भरना बाकी था | थकान हावी हो रही थी लेकिन सुबह से पहले हर हाल में इसे पूर्ण करना था |
सुबह उसकी पत्नी ने उसे झगझोर कर जगाया " ये क्या किया तुमने , ऑंखें यूँ ही छोड़ दी , क्या माँ की ऑंखें नहीं खुलेंगी " |
उसने उनींदे ही जवाब दिया " आजकल सचमुच खुलती हैं क्या माँ की ऑंखें " , और वापस सो गया |

Sunday, September 21, 2014

एक अनोखी यात्रा --

२००७ में बॉम्बे पोस्टिंग हुई थी | बॉम्बे में पहुँच कर सारे लोग व्यवस्थित हों गए कुछ दिन में और जिंदगी वहां के हिसाब से ढल गयी | लगभग ६ महीने बीत गए थे और फिर बनारस जाने का कार्यक्रम बना | अकेले ही जाना था , पहली यात्रा थी बनारस की , इसलिए बहुत उत्साहित था | आने जाने का टिकट नेट से करा लिया था | आखिर जाने का दिन आ ही गया | ट्रैन थी रात के १२ बज कर १० मिनट पर , इसलिए घर से रात को १० बजे निकले और ११ बजे वी टी स्टेशन पर पहुंचे | प्लेटफार्म पर पहुँच कर इंतज़ार करना था तो सोचा की क्यों न चार्ट में अपना नाम देख लिया जाये | चार्ट को एक बार देखा , दुबारा देखा लेकिन नाम नदारद | अब चिंता होने लगी , बार बार टिकट देखा , सब ठीक था | मेरी बर्थ कन्फर्म थी लेकिन चार्ट में से नाम क्यों गायब था |खैर ट्रैन २ घंटे लेट थी तो टी टी को खोजना शुरू किया | कुछ देर बाद एक दिखा तो उससे पूछा , उसने टिकट देखा और बताया कि ये तो कल का टिकट था | दरअसल रात के १२.१० के चलते गड़बड़ हों गयी थी , अब तो पसीना छूटने लगा | उस दिन दशहरा था इसलिए भीड़ भाड़ कम थी | रात के २ बज चुके थे और ट्रैन एक घंटे में जाने वाली थी | वापस लौटने के लिए भी सोचा लेकिन वापसी की लोकल ट्रैन भी ४ बजे ही मिलती |
काफी देर मैं इसी उधेड़बुन में रहा कि बनारस जाऊँ या वापस लौटूं | फिर हिम्मत जुटा कर सोचा कि बनारस ही चलते हैं | टिकट भी नहीं था और रिजर्वेशन भी नहीं , फिर टिकट काउंटर से जाकर एक सामान्य टिकट लिया | वापस प्लेटफार्म पर आकर टी टी को पूछना शुरू किया कि किसी भी क्लास में बर्थ मिल जाये लेकिन सभी ने मना कर दिया | अब तो एक ही रास्ता था कि किसी सामान्य डिब्बे में घुसा जाये और आगे की यात्रा की जाये | एक सामान्य डिब्बे में घुसा , नीचे की बर्थ पर जगह थी | मैंने हिम्मत जुटाई और बैठ गया |
थोड़ी देर में ट्रैन चल दी और उम्मीद के विपरीत बिलकुल भी भीड़ नहीं आई डिब्बे में | काफी सामान भी था मेरे पास और पैसे भी इसलिए घबराया हुआ था | लेकिन सुबह होते होते ये आभास हों गया कि ज्यादा दिक्कत नहीं होने वाली है | धीरे धीरे डब्बा भर गया था लेकिन शायद मेरे अटैची और कपडे के चलते लोगों ने मुझे काफी जगह दे रखी थी | कोई भी नीचे जाता तो पूछ लेता कि कुछ लाना है क्या | इस तरह दिन बीत गया , फिर रात भी सोते जागते बीत गयी | अगले दिन करीब ३ घंटे देर से ट्रैन बनारस पहुंची और मैं उतर के घर पहुंचा | शरीर का तो बुरा हाल था , हड्डियां चरमरा गयीं थीं बैठे बैठे , लेकिन घर पहुँचने के उत्साह ने इन सब बातों को दरकिनार कर दिया था | मैं सचमुच सही सलामत बम्बई से बनारस सामान्य डिब्बे में सफर करके पहुँच गया | लेकिन मेरी हिम्मत नहीं पड़ी कि मैं घर पर या बॉम्बे में बताऊँ कि मैं सामान्य डिब्बे में सफर करके आया हूँ | वापस आने के महीनो बाद मैंने ये बात सबको बताई और फिर ये कसम भी खायी कि अब से रिजर्वेशन करते समय कई बार चेक करूँगा , खासकर अगर ट्रैन का समय अर्धरात्रि के आस पास हो | आज ये सोचता हूँ तो लगता है कि कैसे हिम्मत जुटा ली थी मैंने..

संकल्प--

माली बड़े जतन से पौधों को सींच रहा था और उसके चेहरे पर एक सुकून की रेखा खिंची हुई थी | इंसान होकर पौधों से इतना लगाव , शायद पेशागत , शायद जीवन का स्पंदन महसूस करने की शक्ति या कुछ और |
छोटा भी वहीँ खेल रहा था , उसकी माँ के चेहरे पर भी वही सुकून दिख रहा था | घर की याद आ गयी , कितने महीने हो गए हैं अपने गांव गए | शायद माँ बाप ने भी ऐसे ही सींचा होगा बचपन में हमें |
अचानक माली ने एक सूखा पौधा उखाड़ा | मन में कहीं चुभा कुछ , छोटा वैसे ही खेल रहा था और उसकी माँ वैसे ही खोयी हुई थी उसमें | लेकिन अब गांव जाने का संकल्प पक्का हो गया था |

Saturday, September 20, 2014

मदद--

एक वाकया याद आता है मुग़लसराय का जो कोयले और रेलवे यार्ड के लिए मशहूर है और वहां रेल का डी आर एम ऑफिस भी है | रेलवे के बहुत सारे कर्मचारियों के वेतन का खाता हमारी शाखा में था और महीने के करीब १० दिन बहुत भीड़ भाड़ रहती थी | कभी कभी तो पूरा दिन ही सिर्फ वेतन के भुगतान में निकल जाता था लेकिन लोग संतुष्ट थे |
एक उच्चाधिकारी के पिताजी का अकस्मात् निधन हो गया था और उनको तुरंत अपने घर जाना था | वे लखनऊ में थे और उनको ट्रेन से घर जाना था लेकिन ट्रेन में कोई सीट उपलब्ध नहीं थी | रात के करीब १० बजे ये सूचना मिली की वो बनारस कार से आ रहे हैं और मुग़लसराय से उनको सुबह ८ बजे ट्रेन पकड़नी थी | इतनी रात को कोई सूरत नज़र नहीं आ रही थी रिजर्वेशन दिलाने की , लेकिन फिर भी एक टी सी से बात हुई सुबह सुबह और अपने उच्चाधिकारी को लेकर मैं सुबह करीब ७ बजे प्लेटफार्म पहुँच गया | वहां पर उस टी सी से मुलाक़ात हुई , उसने हमें अपने ऑफिस में बैठा दिया और बोला कि मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि एक सीट मिल जाये | कोई और रास्ता नहीं था इसलिए हम लोग बैठ गए | थोड़ी देर बाद किसी ने नमस्ते किया और पूछा कि यहाँ क्यों बैठे हैं | वो भी टी सी था , जैसे ही उसे पता चला , वो भी लग गया सीट के इंतज़ाम में | अगले आधे घंटे में करीब १० टी सी आये और कमोबेश सभी ने वही सवाल पूछा और सब सीट के लिए लग गए | पता नहीं कितने लोगों ने चाय वगैरह के लिए भी पूछा , लेकिन उस समय तो एकलौती चिंता सीट की थी |
थोड़ी देर बाद एक टी सी आया जिसे उसी ट्रेन से जाना था | उसने मुझसे पूछा कि आपको एक ही सीट चाहिए न | मैंने हाँ में उत्तर दिया तो उसने फिर कहा कि करीब दस लोग मुझसे कह चुके हैं कि हर हालत में एक सीट चाहिए तो मैंने सोचा कि देख लूँ कौन है जिसके लिए इतने लोग सिफारिश कर रहे हैं | आप इत्मीनान रखिये , आपको सीट मिल जाएगी , अब और किसी से मत कहियेगा | मैंने झेंपते हुए कहा कि लोग मुझसे पूछ रहे हैं इसलिए बताना पड़ रहा है |
ट्रैन आई और सारे टी सी आ गए लिवाने | उनको सीट पे बैठाकर जब मैं वापस आ रहा था तो उन्होंने पूछा " तुम इनके लिए क्या करते हो जो आज सारे मदद के लिए खड़े थे | मैंने कहा कि बस इतनी कोशिश करता हूँ कि जो भी हमारी शाखा में आये वो संतुष्ट होकर लौटे " |
उस दिन मुझे विश्वास हो गया कि दूसरों के लिए की गयी मदद हमारे पास किसी न किसी रूप में वापस आ ही जाती है |

Sunday, September 14, 2014

नींद--

एक और वाकया याद आता है बी एच यू का | दरअसल नींद की शुरू से ही बीमारी रही है मुझे | बहुत धनी था मैं इसमें और शायद पढ़ाई के दिनों में तो कुछ ज्यादा ही प्यारी हो जाती थी ये | ग्रेजुएशन में सेमेस्टर में दो परीक्षाएं होती थीं और और अधिकांशतयाः पढ़ाई परीक्षा की रात में ही होती थी | मैं पूरी रात जग के पढ़ता था और दिन में सो लेता था , क्योंकि कोई और विकल्प नहीं था | तमाम लड़के इस बात को जानते थे और मेरे कमरे में लगभग रोज़ १५ से २० लोग अपना जगाने का समय लिखा जाते थे | मैं , जैसे जैसे समय मिलता , लोगों को जगा देता था | कुछ लड़के तो यहाँ तक कहते कि जब तक मैं उठ के बाहर निकल कर मुंह धो के न आ जाऊँ , तब तक मत जाना | एक बार एक हादसा हो गया था , मैंने एक लड़के को जगाया , वो उठा और बोला ठीक है जाओ और मैं चला आया | सुबह सुबह वो मुझे गलियां देने लगा कि तुमने मुझे जगाया नहीं | मैंने सफाई दी कि तुम्हे जगाया तो था और तुम बोले कि ठीक है अब जाओ , तो वो अपना सर धुनने लगा कि मैं तो वापस सो गया था |
खैर , मेरा रूम पार्टनर मेरे रात भर जागने से परेशान रहता था , लेकिन क्या करे | लेकिन उसे कही न कहीं ये भरोसा भी होने लगा था कि मैं बहुत कम सोता हूँ | ऐसे ही एक दिन बातों बातों में उसने मुझसे शर्त लगायी कि देखतें हैं कौन ज्यादा सोता है | मैंने उसे कहा भी कि तुम मेरा मुक़ाबला नहीं कर पाओगे लेकिन वो निश्चिंत था कि वो ही जीतेगा | खैर , शनिवार को परीक्षा ख़त्म हो रही थी और उसी रात को हमारा मुक़ाबला होना था | अपनी आदतानुसार मैं शुक्रवार रात भर जगा रहा , सुबह परीक्षा दी और दिन में सोने का कार्यक्रम मुल्तवी कर दिया | उधर मेरा प्रतिद्वंदी रात में फिल्म देखने चला गया और मैं १० बजे खाना खा के सो गया | जाड़े का समय था और मेरी आदत थी रज़ाई से मुंह ढँक कर सोने की | करीब रात के साढ़े बारह बजे वो वापस आया और दरवाजा खटखटाने लगा | करीब १० मिनट बाद भी जब कोई आहट नहीं हुई तो वो मेरा नाम लेके जोर जोर से चिल्लाने लगा और दरवाजा पीटने लगा | धीरे धीरे उस तल के बहुत सारे लड़के जग गए और अपने कमरों से निकल कर मेरे कमरे के सामने आ गए | जब लोगों ने पीटने और चिल्लाने में अपनी सारी ताक़त लगा ली तो उनके सामने एक ही विकल्प बचा था कि दरवाज़ा तोड़ दिया जाए | तभी एक लड़के ने कहा कि ऊपर का रोशनदान खुला है , उससे पानी गिराते हैं और फिर लोगों ने मेज लगाकर रोशनदान से पानी गिराना शुरू किया | पानी जब रज़ाई से छनकर मुंह पर आया तो ठण्ड से आँख खुल गयी | मैंने जैसे ही रज़ाई हटाई , वैसे ही दरवाजे पर ज़ोर से दस्तक हुई और लोगों कि चिल्लाने की आवाज़ भी आई | मैंने हड़बड़ाकर दरवाजा खोला और दरवाज़ा खुलते ही एक साथ कई लड़के अंदर आ गए | गालियों की बौछार शुरू थी और मैं हक्का बक्का देख रहा था | कुछ देर में सब चले गए और मेरे पार्टनर ने मुझसे पूछा " तुम सच में सोये थे , हम तो डर गए थे कि कहीं कुछ और तो नहीं हो गया था " | उसके बाद उसने कहा कि प्रभु , अपने चरण दिखाओ , तुमसे सोने में जीतना तो दूर , प्रतिस्पर्धा भी नहीं कर सकता मैं | अगले दिन सुबह मेस में नाश्ते के समय तमाम उंगलियां मेरी तरफ दिखाई जा रहीं थी कि वही लड़का है जो कल सो गया था |
लेकिन हक़ीक़त यही थी कि मैं सचमुच सो गया था |

दुआ--

कलम रुक गयी उसकी , क्या लिखे और क्यूँ लिखे | पहले ही तो कितना कुछ लिखा जा चुका है इस पर कि ईश्वर , अल्लाह , गॉड सब एक है , सारे धर्म तो एक ही शिक्षा देते हैं | सब लोग तो आपसी भाईचारा , प्रेम , सद्भाव वगैरह के बारे में ही लिखते हैं , फिर ऐसा क्यूँ होता है | क्यूँ एक छोटी सी चिंगारी इतनी ताक़तवर हो जाती है कि इंसान की समझ जल के राख हो जाती है |
अगर लिखने से ही सब कुछ ठीक हो जाता तो सब ठीक ही रहता न | नहीं , अब नहीं लिखना उसे | इंसान तरक्की कर रहा है , शिक्षित हो रहा है , लेकिन सारी शिक्षा क्यूँ धरी की धरी रह जाती है | और कितना बटेगा इंसान , किस किस आधार पर , कब तक ?
नहीं , अब वो और लिखेगा नहीं , वो कोशिश करेगा कि लोग जो लिखा है उसे पढ़ें और समझें | वो लोगों को बताएगा कि धर्म इंसान की बेहतरी के लिए हैं , बर्बादी के लिए नहीं | ये धरती प्रेम से जन्नत बन सकती है , नफरत से नहीं |
और जिस दिन लोग ये समझने लगेंगे , उस दिन वो लिखेगा , सबकी खुशहाली और सलामती की दुआ | 

Saturday, September 13, 2014

सिंचाई--

ठंडी अब भयानक हो गयी थी , दिसंबर का अंत आ रहा था | ऐसा लगता था कि ठंडी हवाएँ हड्डियों में घुस जाएँगी | चच्चा दु ठो सिवटर पहिने थे , कान में मफलर कसके बान्हे थे , लेकिन कउड़ा पर से जइसहीं उठते थे , ठंडी लगने लगती थी | गेहूं और मटर की फसल बढ़ रही थी | अमूमन दिन में आने वाली बिजली जैसे जैसे ठण्ड बढ़ती थी , रात की पाली वाली हो जाती थी | आज भी रात की पाली थी बिजली की और पानी बराना था खेत में | 
खाना खा के उ कउड़ा पर बैठे , अबहीं त ८ बज रहा था | बिजली ९ बजे आने वाली थी और चच्चा गोजी और फरसा कउड़ा के पास रख लिए थे | उस मौसम में उनका एक्के साथी था , उनका झबरा कुक्कुर | चच्चा कहीं भी जाएँ , झबरा साथ साथ लग जाता | कउड़ा के पास गुड़मुड़िया के लेटा था झबरा | थोड़ी देर बाद चच्चा उठे , कान में जनेऊ लपेटे और पिसाब करके दुआरे से चल पड़े | झबरा पीछे पीछे था | बिजली का टाइम हो रहा था और चच्चा जल्दी जल्दी टुब्बेल की ओर लपक रहे थे | 
टुब्बेल पर पहुँचते पहुँचते बत्ती आ गयी , चच्चा ने ललकारा " टुब्बेल चलावा महतो , बत्ती आ गयी " | महतो रजाई से मुँह निकाले और बत्ती देख के कांपते हुए उठ बैठे | " बहुत जाड़ा पड़त बा चच्चा ए बार , पाला भी खूब पड़ी " कहते हुए महतो ने टुब्बेल चला दिया | टुब्बेल के गरम पानी से भाप निकल रहा था , चच्चा ने नारी का मेड़ लगाया और पानी के साथ साथ चल पड़े खेत की ओर | चारो तरफ सन्नाटा , धुप्प अन्हियार और चच्चा और झबरा | खेत पर पहुँच कर फरसा से मेड़ ठीक किये और पानी खेत में आने लगा | ठंडी में यही मुश्किल की जइसहीं काम बंद करो , ठंडी लगना चालू | खैर अगल बगल से कुछ पतई बटोरे और जेब से माचिस निकाल के जरा दिए | आग से तनिक राहत मिला | उसके बुझते ही फिर खेत में घुसे , पानी का अंदाज़ लगाया की कहाँ तक पहुँच गया है और बाहर आ गए | 
अचानक चच्चा टुब्बेल की तरफ देखे तो बत्ती गायब | मुश्किल से आधा खेत हो पायी , चच्चा अंदाज़ लगाये और भुनभुनाते हुए घर की ओर चल पड़े | काल फिर आये के पड़ी , ए ठंडी में , यही सोचते चच्चा दुआर पर पहुंचे और रज़ाई में घुस गए | झबरा भी कउड़ा से सट कर लेट गया था | रात अपने हिसाब से बीत रही थी |

Friday, September 12, 2014

कसम--

तीसरी कसम के हिरामन की तरह मैंने भी कई कसमें खायी हैं जीवन में , उन्ही में से एक कसम के बारे में आज बताता हूँ | बी एच यू की बात है , उस समय फ़िल्में देखने का शौक था लेकिन यथासंभव कला या सामानांतर फ़िल्में ही देखना पसंद करता था | गोविन्द निहलानी , श्याम बेनेगल , महेश भट्ट , इत्यादि की फ़िल्में अगर लगी हों तो कोशिश करता था कि देखी जाएँ | बहुत कम लोग साथ देते थे लेकिन फिर भी चला ही जाता था देखने |
ऐसे ही एक बार महेश भट्ट की " कब्ज़ा " फिल्म लगी | उस समय फ़िल्में शुक्रवार को बदल जाती थीं तो गुरूवार को मन बनाया और साइकिल से निकल गया | पहुँचने में थोड़ी देर हो गयी तो जल्दी से टिकट लेके बालकनी में चला गया | उम्मीद के मुताबिक़ ही बहुत कम लोग थे और मैं आराम से एक सीट पर बैठ गया | अभी फिल्म शुरू नहीं हुई थी तो मैंने एक निगाह पूरे हाल में दौड़ाई | लेकिन चारो तरफ अधेड़ महिलाएं , जो कि ग्रामीण परिवेश की लग रहीं थीं , ही नज़र आ रहीं थीं | थोड़ा अजीब लगा कि इन लोगों को कब से महेश भट्ट की फिल्म समझ में आने लगी लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया |
थोड़ी देर बाद फिल्म शुरू हुई , परदे पर नाम लिखा आया " श्रीकृष्ण लीला " | मुझे लगा कि शायद कल से ये लगने वाली है तो उसका प्रचार दिखा रहें हैं ( उस समय ये प्रचलन में था )| धीरे धीरे १५ मिनट बीते , फिर ३० मिनट , श्रीकृष्ण का जन्म भी हो गया , और जब लगभग ४० मिनट बीत गए तो मुझे खटका हुआ | मैंने धीरे से थोड़ी दूर पर बैठे एक सज्जन से पूछा कि कौन सी फिल्म चल रही है | उन्होंने मुझे घूर कर देखा , शायद सोचा हो कि देखने में तो ये पढ़ा लिखा ही लग रहा है , और बड़ी बेरुखी से जवाब दिया " अरे भाई , श्रीकृष्ण लीला चल रही है" , और फिर फिल्म देखने में तल्लीन हो गए |
मैं तुरंत हाल से बाहर निकला और साइकिल स्टैंड से साइकिल लेकर भाग खड़ा हुआ | मुझे सोच सोच कर हंसी आ रही थी , अपनी बेवकूफी पर भी और ये सोच कर भी कि मेरे जैसा नास्तिक आदमी ये फिल्म देख रहा था | फिर मैंने कसम खायी कि आज के बाद फिर कभी बिना टिकट खिड़की पर दरियाफ़्त किये फिल्म नहीं देखूंगा |

अख़बार--

साहब बहुत चिंतित थे , वजह थी कल की विजिट | कल एक कंपनी के सर्वोच्च अधिकारी मिलने आ रहे थे |
अब इतने बड़े अधिकारी आ रहे हैं तो खर्च भी होगा | निहायत कंजूस थे , खर्च के नाम पर प्राण सूख जाते थे | खैर अगले दिन वो उच्चाधिकारी आये और किसी तरह न्यूनतम खर्च में निपटा दिया उनको | लेकिन जाते जाते एक गड़बड़ हो गयी , उस दिन का अख़बार वो लेते गए | 
करीब दो घंटे बाद उसने अपने अधीनस्थ को बुलाया और कहा " उस कंपनी के मैनेजर को बोल दो कि आज का अख़बार खरीद कर दे दे " | अधीनस्थ ने अपने पैसे से अख़बार ख़रीदा और साहब को दे दिया , अपनी कंपनी की इज़्ज़त भी बची और साहब का तनाव भी निकल गया |

राष्ट्र भाषा--

नए फैशन के परिधान पहने तमाम लोग मुस्कुरा रहे थे | वजह थी वो , जो अपने पारम्परिक वेशभूषा में थी | 
एक बच्चे ने अपनी माँ से पूछा " मैंने इसे कहीं सुना या पढ़ा है मॉम " |
" हाँ बेटू , ये अपनी राष्ट्र भाषा है " , मॉम ने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया |

Monday, September 8, 2014

नशा--

उसे अभी भी भरोसा नहीं हो रहा था , उसके सामने बैठी औरत वही थी , जिसे उसने फिल्मों में देखा हुआ था | एक समय था जब उसने हिट फिल्मे दी थीं , लेकिन आज उस पांच सितारा होटल की रेड में ये भी गिरफ्तार हुई थी | पुलिस स्टेशन लाकर उसने उसे बैठने के लिए कहा और पूछा " तुम्हारे इस पेशे में आने की वजह "?
थोड़ा रुक कर उसने जवाब दिया " सफलता से बड़ा कोई और नशा नहीं होता और जब ये नशा उतरता है तो इंसान सही और गलत में फ़र्क़ करना भूल जाता है | लोग अनदेखा करने लगें , बर्दाश्त नहीं होता | कहाँ आगे पीछे घूमती भीड़ और कहाँ अकेलापन , फिर इंसान दूसरे नशों में डूबने लगता है | और जिस जीवनशैली की आदत पड़ चुकी होती है उसे पूरा करने के लिए वो किसी भी हद तक चला जाता है" | 
किसी भी पश्चात्ताप के निशान नहीं थे उसके चेहरे पर |

Sunday, September 7, 2014

दक्षिण अफ्रीका डायरी - ४

यहाँ आने के बाद श्री नेल्सन मंडेला से नहीं मिल पाने का मलाल ताउम्र रहेगा | दरअसल जब मैं यहाँ आया तो वो गंभीर रूप से बीमार थे और हस्पताल में थे | फिर दिसंबर में उनकी मृत्यु हो गयी और मैं उनसे मिलने से वंचित रह गया |
यहाँ पर एक जगह है " फोर्ड्सबर्ग " जो मिनी एशिया जैसा है | यहाँ अपने जरुरत की हर चीज मिल जाती है और यहाँ जाकर महसूस हो जाता है कि हम हिंदुस्तान में हैं | उस एरिया में ट्रैफिक रूल्स कम चलते हैं , अव्यवस्था चारो ओर दिख जाती है और बहुतेरे हिंदुस्तानी या पाकिस्तानी दूकानदार हैं | खास कर सैलून सारे पाकिस्तानी लोगों के हैं और तमाम भारतीय रेस्टोरेंट भी हैं यहाँ | एक और जगह है " लिनेसिआ" जहाँ अधिकांश हिंदुस्तानी लोग रहते हैं और वहां बहुत से मंदिर भी हैं |
अपने त्यौहार जैसे दशहरा , दीवाली इत्यादि मनाने के लिए एक जगह निश्चित है यहाँ " मार्लबोरो " | वहां पर एक मंदिर और कम्युनिटी सेंटर है जहाँ सारे कार्यक्रम होते हैं | महात्मा गांधी की एक प्रतिमा जोहन्नेस्बर्ग टाउन में भी है जहाँ २ अक्टूबर को माल्यार्पण होता है |
दिसंबर में इंडियन क्रिकेट टीम दक्षिण अफ्रीका में आई | जोहानसबर्ग में एक टेस्ट मैच , वन डे मैच और एक वन डे मैच सेंचूरियन ( जोहानसबर्ग से काफी नज़दीक ) में था | टीम उसी माल में रुकी थी जिसमे हमारा बैंक है और इस वज़ह से टीम के लगभग सभी खिलाड़िओं से मिलने का मौका आसानी से मिल गया | हिन्दुस्तान में कभी ये सोच भी नहीं सकते की इन लोगों से आप मिल कर बातचीत भी कर सकते हैं | अंशिका भी दिसंबर में यहाँ एक महीने के लिए आ गयी और फिर मैच देखने से लेकर घूमना फिरना खूब हुआ | क्रमशः

Friday, September 5, 2014

रिश्ता--

पता नहीं कौन सा रिश्ता था उनके बीच , जब भी वो जाता , ऑंखें बहने लगती |
दोस्त थे दोनों , उम्र में थोड़ा अंतर था , फिर समय के साथ दोस्ती का रिश्ता भाईयों सा हो गया |
दोनों दो शहरों में रहते थे लेकिन महीने दो महीने में एक दूसरे से मिलते जरूर थे |
इस बार जब छोटा जाने लगा तो उसने बड़े के पैर छुए | अब तो ये रिश्ता पिता पुत्र जैसा हो गया था , शायद बढ़ती उम्र का असर था | और जब वो बस में बैठ कर हाँथ हिला रहा था तो बड़ा अपनी ऑंखें पोंछ रहा था | 

नेकी--

" नेकी करो और भूल जाओ " इस कहावत को मानने वाले बड़े सुखी रहते हैं और उनको जिंदगी में कभी कभी बड़े सुखद आश्चर्य मिलते हैं | शायद २००१ की बात है , मैं आजमगढ़ में नियुक्त था | नयी शाखा थी और काफी सारे परिचित लोग भी थे उस शहर में | एक रिश्तेदार के ससुराल में शादी तंय हो गयी थी और उनको तिलक के लिए पैसे देने थे लड़के वालों को | पैसा एफ डी के रूप में मऊ के बैंक आफ इंडिया में रखा हुआ था और वो दो नामों से था | एक नाम जिसका था वो उस वक़्त किसी और शहर में था और उसके आने का समय निश्चित नहीं था | पैसा तुरंत चाहिए था लेकिन बैंक वालों ने बिना दोनों के हस्ताक्षर किये पैसे देने से इंकार कर दिया ( नियमतः वो सही थे ) |
वो रिश्तेदार तुरंत मेरे पास आये की किसी भी तरह से मुझे पैसा दिलवा दीजिये नहीं तो शादी में दिक्कत आ सकती है | उन्होंने भरोसा दिलाया कि जैसे ही दूसरे व्यक्ति आएंगे , उनके हस्ताक्षर करवा देंगे | मैंने मऊ शाखा में बात की , और उन्होंने मेरे लिखित आश्वासन पर पैसा दे दिया | बात आई गयी हो गयी , शादी भी हो गयी और मैं इन सब बातों को भूल गया |
लगभग तीन वर्ष पश्चात जब मेरी नियुक्ति मुगलसराय में थी , मेरे एक परिचित जो पुलिस विभाग में बड़ी पोस्ट पर थे ( जिनकी मदद से कुछ बिज़नेस लाने का प्रयास कर रहा था ) से मैं मिलने गया था | उनके ऑफिस में बैठ कर हम चाय पी रहे थे तभी एक नौजवान पुलिस अफसर आया और किनारे बैठ गया | मेरा परिचय हुआ और फिर मैं चाय पीने में मशगूल हो गया | वो नौजवान अफसर मुझे लगातार देखे जा रहा था , जो मुझे भी महसूस हो रहा था | आखिरकार उससे नहीं रहा गया तो वो मुझसे पूछने लगा की आप यहाँ से पहले कहाँ थे | मैंने बताया तो फिर पूछा कि उसके पहले कहाँ थे आप तो मैंने बताया कि आजमगढ़ | ये सुनते ही उन्होंने कहा कि आप ने मुझे नहीं पहचाना | मेरे इंकार करने पर उन्होंने बताया कि मेरी बहन कि शादी थी और आपके चलते ही वो पैसा समय पर मिल गया था | सचमुच मैंने उस अफसर को नहीं पहचाना लेकिन याद आ गया |
वो दिन , और आज का दिन , हम लोग बेहद अच्छे दोस्त हैं | आज उनके जन्मदिन पर अचानक ये सब याद आ गया | जन्मदिन मुबारक प्रिय मित्र |

शिक्षक दिवस पर--

वैसे तो मैं कभी भी ऐसा छात्र नहीं रहा जिसपर गुरुजन गर्व कर सकें , लेकिन कई शिक्षकों ने बहुत प्रभावित किया | कुछ बहुत अच्छी तो कुछ कड़वी यादें हैं छात्र जीवन की , लेकिन आज एक गुरु के बारें में बताऊंगा जिन्होंने प्रभावित किया |
बी एच यू की बात है | हॉस्टल में रहने के कारण देर तक जगना और फिर देर तक सोना | सुबह की प्रैक्टिकल की क्लास अक्सर छूट जाती थी | एक विषय था प्लांट पैथोलॉजी का जिसके प्रैक्टिकल में भी गायब रहता था | मिड सेम की परीक्षा हुई , नंबर उन्होंने अपने प्रैक्टिकल क्लास में ही दिखाया | मैं गया नहीं इसलिए नंबर पता नहीं चला | अब अगले प्रैक्टिकल में जाना मज़बूरी बन गया था | खैर मैं पहुंचा और उनसे अपने नंबर के बारे में पूछा | बड़ी हिकारत भरी नज़र से देखते हुए उन्होंने कॉपी निकाली , लेकिन नंबर देखते ही उनका चेहरा बदल गया | दरअसल मेरे सबसे ज्यादा नंबर थे | अब उन्होंने मेरी तारीफ़ करनी शुरू कर दी कि बहुत सटीक जवाब दिए हैं तुमने , एकदम संक्षिप्त | मेरी आदत रही है कम से कम में लिखने की और मेरी जान में जान आई | लेकिन अब तो फंस गए थे क्योंकि आगे से हर प्रैक्टिकल में जाना मज़बूरी बन गया |
खैर एंड सेम की परीक्षा आई | मैं अपनी आदत के अनुसार मैं फ़टाफ़ट उत्तर लिख कर बाहर निकल गया | चूँकि समय बचा हुआ था इसलिए क्लास के बाहर लॉन में बैठा हुआ था तभी एक लड़का आया और बोला कि मेरा तो प्रश्न छूट गया | मैंने पूछा कि क्यों तो वो बोला कि अरे पेपर के पीछे भी प्रश्न थे जो मैं देख ही नहीं पाया | अब मेरे प्राण सुख गए क्योंकि मैंने भी पीछे नहीं देखा था और मेरे भी वो प्रश्न छूट गए | मैं भाग कर वापस क्लास में गया लेकिन अब लिखने की इज़ाज़त नहीं थी | तब तक टीचर भी आ गए थे और मुझे देखते ही उनके मुंह से निकला " अरे तुम्हारा भी प्रश्न छूट गया " | मैंने बुझे मन से हामी भर दी | अब मुझसे ज्यादा वो परेशान दिखने लगे और बगल में खड़े टीचर से मेरे बारे में बताने लगे | थोड़ी देर बाद उन्होंने सांत्वना दी कि कोई बात नहीं , प्रैक्टिकल में मेहनत करना , सब ठीक हो जाएगा |
खैर प्रैक्टिकल कैसा हुआ , मैं नहीं कह सकता लेकिन उन्होंने मुझे ग्रेड जरूर दे दिया | उसके बाद भी जब तक मैं वहां था , मैं उनसे मिलता रहा और उनके प्रति मेरे मन में आज भी श्रद्धा है क्यूंकि उन्होंने अपने विश्वास को गलत साबित नहीं होने दिया | वो शिक्षक थे श्री डी सी पंत |

शिक्षक दिवस पर -

एक और शिक्षक के बारे में बताना चाहूंगा | इंटरमीडिएट में जिस कॉलेज में मेरा एडमिशन हुआ था वो शायद पढ़ाई के मामले में बनारस के सबसे कमजोर कॉलेजों में गिना जाता था | टीचर्स कम थे , साइंस लैब ख़राब हालत में था और इंग्लिश की पढ़ाई के बारे में सोचना भी कठिन था वहां | लेकिन उस समय इंग्लिश पढ़ने में पता नहीं क्यों दिलचस्पी बढ़ गयी थी , शायद अभाव में ही जरुरत तीव्रता से महसूस होती है | खैर जुम्मा जुम्मा हम दो लोग थे क्लास में जिन्हें सचमुच इच्छा थी कि अपनी इंग्लिश में सुधार किया जाए | इंग्लिश के शिक्षक बड़े तगड़े डीलडौल वाले थे , सारे बच्चे उनको बाघे ( लायन ) बुलाते थे | खैर हम लोगों ने हिम्मत जुटा कर उनसे कहा कि हमें इंग्लिश सुधारनी है , आप हमारा मार्गदर्शन करें | पहले तो उन्हें लगा कि ये लड़के कहीं मजाक तो नहीं कर रहे हैं लेकिन हमारी हालत देख कर उन्हें भरोसा हुआ कि सच में ये सीखना चाहते हैं |
खैर , उन्होंने शुरू में हम लोगों को कुछ ट्रांसलेशन वगैरह दिया और जब देखा कि वास्तव में ये दोनों मेहनत कर रहे हैं तो उन्होंने हमें इज़ाज़त दे दी कि हम लोग खाली घंटों में उनके पास आ सकते हैं | फिर ये लगभग रोज़ का नियम बन गया | कभी ग्रामर , कभी कविता और कभी गद्य , बारी बारी से हम लोगों को जो भी वो बता सकते थे , सब बताया | बाद में तो उनका उत्साह हम लोगों से भी ज्यादा बढ़ गया था और सप्ताह का शायद ही कोई दिन था जब हम लोग कुछ न सीखतें हों |
आज जो कुछ भी टूटी फूटी अंग्रेजी आती है , उसमे उनका सबसे बड़ा योगदान है | और आज ये भी महसूस होता है कि किसी अध्यापक के लिए शायद इससे बड़ी ख़ुशी कि बात और कोई नहीं होती कि कोई बच्चा सच में उनके पास सीखने के लिए आये | उस गुरु का नाम था श्री छविनाथ सिंह | आज शिक्षक दिवस पर उनको सादर नमन |

कमाई--

चार पांच किक के बाद किसी तरह स्कूटर स्टार्ट हुई मास्साहब की | पसीना पोंछते हुए जैसे ही बैठने को हुए कि एक गाड़ी आकर रुकी | गाड़ी से उतरकर उस नौजवान ने मास्साहब के पैर छुए और एक पैकेट उनकी और बढ़ाया |
वो अभी सोच ही रहे थे कि नौजवान बोला " सर , आपकी शिक्षा का ही सुपरिणाम है कि आज मैं कुछ बन पाया हूँ , आज के दिन इंकार मत करिये " | मास्साहब ने पलट कर एक नज़र दरवाजे पर खड़ी अपनी पत्नी की तरफ देखा और विनम्रता से पैकेट लौटाते हुए बोले " तुम्हारे आदर से बड़ी भेंट कुछ और नहीं हो सकती , जीवन में और तरक्की करो " |
पत्नी को अपने कहे शब्द " क्या कमाया है आपने आजतक " का उत्तर मिल गया था |