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Friday, September 12, 2014

कसम--

तीसरी कसम के हिरामन की तरह मैंने भी कई कसमें खायी हैं जीवन में , उन्ही में से एक कसम के बारे में आज बताता हूँ | बी एच यू की बात है , उस समय फ़िल्में देखने का शौक था लेकिन यथासंभव कला या सामानांतर फ़िल्में ही देखना पसंद करता था | गोविन्द निहलानी , श्याम बेनेगल , महेश भट्ट , इत्यादि की फ़िल्में अगर लगी हों तो कोशिश करता था कि देखी जाएँ | बहुत कम लोग साथ देते थे लेकिन फिर भी चला ही जाता था देखने |
ऐसे ही एक बार महेश भट्ट की " कब्ज़ा " फिल्म लगी | उस समय फ़िल्में शुक्रवार को बदल जाती थीं तो गुरूवार को मन बनाया और साइकिल से निकल गया | पहुँचने में थोड़ी देर हो गयी तो जल्दी से टिकट लेके बालकनी में चला गया | उम्मीद के मुताबिक़ ही बहुत कम लोग थे और मैं आराम से एक सीट पर बैठ गया | अभी फिल्म शुरू नहीं हुई थी तो मैंने एक निगाह पूरे हाल में दौड़ाई | लेकिन चारो तरफ अधेड़ महिलाएं , जो कि ग्रामीण परिवेश की लग रहीं थीं , ही नज़र आ रहीं थीं | थोड़ा अजीब लगा कि इन लोगों को कब से महेश भट्ट की फिल्म समझ में आने लगी लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया |
थोड़ी देर बाद फिल्म शुरू हुई , परदे पर नाम लिखा आया " श्रीकृष्ण लीला " | मुझे लगा कि शायद कल से ये लगने वाली है तो उसका प्रचार दिखा रहें हैं ( उस समय ये प्रचलन में था )| धीरे धीरे १५ मिनट बीते , फिर ३० मिनट , श्रीकृष्ण का जन्म भी हो गया , और जब लगभग ४० मिनट बीत गए तो मुझे खटका हुआ | मैंने धीरे से थोड़ी दूर पर बैठे एक सज्जन से पूछा कि कौन सी फिल्म चल रही है | उन्होंने मुझे घूर कर देखा , शायद सोचा हो कि देखने में तो ये पढ़ा लिखा ही लग रहा है , और बड़ी बेरुखी से जवाब दिया " अरे भाई , श्रीकृष्ण लीला चल रही है" , और फिर फिल्म देखने में तल्लीन हो गए |
मैं तुरंत हाल से बाहर निकला और साइकिल स्टैंड से साइकिल लेकर भाग खड़ा हुआ | मुझे सोच सोच कर हंसी आ रही थी , अपनी बेवकूफी पर भी और ये सोच कर भी कि मेरे जैसा नास्तिक आदमी ये फिल्म देख रहा था | फिर मैंने कसम खायी कि आज के बाद फिर कभी बिना टिकट खिड़की पर दरियाफ़्त किये फिल्म नहीं देखूंगा |

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