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Saturday, September 13, 2014

सिंचाई--

ठंडी अब भयानक हो गयी थी , दिसंबर का अंत आ रहा था | ऐसा लगता था कि ठंडी हवाएँ हड्डियों में घुस जाएँगी | चच्चा दु ठो सिवटर पहिने थे , कान में मफलर कसके बान्हे थे , लेकिन कउड़ा पर से जइसहीं उठते थे , ठंडी लगने लगती थी | गेहूं और मटर की फसल बढ़ रही थी | अमूमन दिन में आने वाली बिजली जैसे जैसे ठण्ड बढ़ती थी , रात की पाली वाली हो जाती थी | आज भी रात की पाली थी बिजली की और पानी बराना था खेत में | 
खाना खा के उ कउड़ा पर बैठे , अबहीं त ८ बज रहा था | बिजली ९ बजे आने वाली थी और चच्चा गोजी और फरसा कउड़ा के पास रख लिए थे | उस मौसम में उनका एक्के साथी था , उनका झबरा कुक्कुर | चच्चा कहीं भी जाएँ , झबरा साथ साथ लग जाता | कउड़ा के पास गुड़मुड़िया के लेटा था झबरा | थोड़ी देर बाद चच्चा उठे , कान में जनेऊ लपेटे और पिसाब करके दुआरे से चल पड़े | झबरा पीछे पीछे था | बिजली का टाइम हो रहा था और चच्चा जल्दी जल्दी टुब्बेल की ओर लपक रहे थे | 
टुब्बेल पर पहुँचते पहुँचते बत्ती आ गयी , चच्चा ने ललकारा " टुब्बेल चलावा महतो , बत्ती आ गयी " | महतो रजाई से मुँह निकाले और बत्ती देख के कांपते हुए उठ बैठे | " बहुत जाड़ा पड़त बा चच्चा ए बार , पाला भी खूब पड़ी " कहते हुए महतो ने टुब्बेल चला दिया | टुब्बेल के गरम पानी से भाप निकल रहा था , चच्चा ने नारी का मेड़ लगाया और पानी के साथ साथ चल पड़े खेत की ओर | चारो तरफ सन्नाटा , धुप्प अन्हियार और चच्चा और झबरा | खेत पर पहुँच कर फरसा से मेड़ ठीक किये और पानी खेत में आने लगा | ठंडी में यही मुश्किल की जइसहीं काम बंद करो , ठंडी लगना चालू | खैर अगल बगल से कुछ पतई बटोरे और जेब से माचिस निकाल के जरा दिए | आग से तनिक राहत मिला | उसके बुझते ही फिर खेत में घुसे , पानी का अंदाज़ लगाया की कहाँ तक पहुँच गया है और बाहर आ गए | 
अचानक चच्चा टुब्बेल की तरफ देखे तो बत्ती गायब | मुश्किल से आधा खेत हो पायी , चच्चा अंदाज़ लगाये और भुनभुनाते हुए घर की ओर चल पड़े | काल फिर आये के पड़ी , ए ठंडी में , यही सोचते चच्चा दुआर पर पहुंचे और रज़ाई में घुस गए | झबरा भी कउड़ा से सट कर लेट गया था | रात अपने हिसाब से बीत रही थी |

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