Translate

Saturday, April 26, 2014

कल

कल 
जिंदगी के कई रंग हैं अनदेखे से ,
आज में जीते हुए मैंने महसूस किये ,
धुआं , नमी , आँसू और उड़े हुए रंग चेहरों के ,
ग़म हैं , खुशियाँ हैं और जीने की अदम्य चाहत ,
ये सब है आज में , लेकिन फिर भी कुछ कमी सी है ,
शायद वो कल में है , कल जो आना अभी बाक़ी है |

गाँव

गाँव
मेरे अज़ीज़ गाँव 
तुम्हे आज तक समझ पाना ,
मेरे लिए एक पहेली ही है ,
एक तरफ आपसी सद्भाव ,
दूसरी तरफ जबरदस्त भेदभाव ,
एक तरफ सभी एक परिवार ,
दूसरी तरफ राजनीति अपरम्पार ,
कहाँ गया वो सामाजिक सामंजस्य .
अब तो सब तरफ दिखता वैमनस्य ,
कहाँ गयी वो शाम की चौपाल ,
अब तो हर घर में फैला टेलीविज़न का जाल ,
लेकिन फिर भी न जाने क्यूँ , प्यार है तुमसे मेरे प्यारे गाँव ,
क्योंकि यहीं मिलती है अपनों की शीतल छाँव.

लाइसेंस

रुकिए , रुकिए , पुलिसवाले की आवाज सुनते ही गाड़ी को एक किनारे रोक दिया मैंने | शाम अब रात में बदल रही थी और वहां अँधेरा भी था | खैर मैंने अपनी खिड़की का शीशा नीचे किया और पुलिसमैन को हेलो किया | उसने भी जवाब में पूछा कि मैं कैसा हूँ , फिर आगे जाके विंडस्क्रीन पर लगे डिस्क को चेक किया कि गाड़ी के टैक्स का पेमेंट अपटूडेट है कि नहीं | उसे देखने के बाद वापस मेरे पास आया और बोला "अपना लाइसेंस दिखाईये "| 
कार से सम्बंधित सभी कागजात अंदर ही रखे हुए थे , लेकिन ऐसे मौके पर कई बार खोजने पर ही मिलते हैं | किसी तरह से खोज कर निकाला और उसे दिखाया | उसमे यहाँ के भारतीय दूतावास के द्वारा दिया गया एक सर्टिफिकेट था जिसमे लिखा था कि मेरे पास भारत का वैलिड लाइसेंस है जिससे मैं यहाँ पर कार चला सकता हूँ | उसने देखने के बाद कहा कि ओरिजिनल लाइसेंस कहाँ है , उसे दिखाईये | मेरे पास तो वो था नहीं , इसलिए मैंने कहा कि मैं यही सर्टिफिकेट ही रखता हूँ अपने पास | लेकिन वो जिद पर अड़ गया कि या तो ओरिजिनल लाइसेंस दिखाओ या फिर वो फाइन करेगा | फिर मैंने कहा कि ठीक है , मैं घर से , जो कि नजदीक ही था , लाइसेंस ला के दिखा देता हूँ | लेकिन वो बोला कि अभी तो आपके पास नहीं है इसलिए बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाने का फाइन होगा | हार कर मैंने भी कह दिया कि जो आपको ठीक लगे , कर दीजिये | फिर पता नहीं , उसने जो भी सोचा , मुझे दुबारा लाइसेंस लेकर कार चलाने की सलाह दी और जाने के लिये बोला | लेकिन इस सारे वाकये में न तो उसने पैसे मांगे , न मैंने देने की बात की , और जब मैंने पैदल घर जाके लाइसेंस लाने के लिए कहा तो उसने ये कहकर मना कर दिया कि वो मेरी जिंदगी को खतरे में नहीं डाल सकता |

गलती

कभी कभी समय हमें अपनी गलती सुधारने का मौका दे देता है और हम खुद की नजरों में अपनी इज़्ज़त बचा लेते हैं | कल ही कि बात है ,मैं ऑफिस के लिए लेट हो रहा था , इसलिए जल्दी में था | जैसे ही चौराहे पर पहुंचा , एक परेशान से दिखने वाले व्यक्ति ने मुझे रोक कर कुछ पूछना चाहा | मैं देख रहा था की वो कई लोगों से कुछ पूछ रहा है लेकिन हर आदमी बिना बताये आगे बढ़ जा रहा था | वो शायद कोई पता पूछ रहा था , लेकिन मैंने भी अपनी जल्दी के चलते उसको अनसुना किया और आगे बढ़ गया |
शाम को लौटते वक्त मैंने देखा कि चौराहे पर भीड़ लगी हुई है | जानने की उत्सुकता हुई कि माजरा क्या है , और मैं भी भीड़ में शामिल हो गया | एक आदमी सड़क पर घायल पड़ा हुआ था | किसी वाहन ने उसको टक्कर मार दिया था और सारे लोग तमाशबीन बने खड़े थे | शायद हर आदमी इस इंतजार में था कि कोई और इसे अस्पताल ले जाये | एक बार तो मैंने भी सोचा कि चलते हैं , जब कोई आगे नहीं आ रहा तो मैं क्यों पचड़े में पडूँ | लेकिन फिर सुबह की घटना दिमाग में आ गयी तो लगा जैसे इसकी मदद करके मैं सुबह की गलती को सुधार सकता हूँ | और मैंने घायल को अस्पताल लेजाने का निर्णय कर लिया | 

होर रह

होर रह -- 
अचानक मोड़ पर कार के सामने एक मोटरसाइकिल वाला आ गया और मैंने तेजी से ब्रेक लगाया | साथ ही साथ मेरे मुह से निकल गया "होर रह "|
जिंदगी में बहुत सारी घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें हम याद रखना चाहते हैं , बहुत सारी ऐसी भी होती है जिन्हे हम कतई याद नहीं रखना चाहते , लेकिन कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जिनको हम याद तो नहीं रखते लेकिन वो हमारे अवचेतन मन में इस तरह समा जाती हैं की हम चाह कर भी उन्हें अपने से अलग नहीं कर सकते |
ये उस समय की बात है जब हम स्कूल में पढ़ते थे | घर से स्कूल लगभग ८ किमी दूर था और हम रोज साइकिल से स्कूल जाते थे | गांव से स्कूल का रास्ता कच्चा-पक्का था और बीच में खेत खलिहान भी पड़ते थे | हमारे एक मित्र जो की दूसरे गांव में रहते थे , वो भी अक्सर आते समय तो साथ आते थे , कभी कभी जाते समय भी मिल जाते थे | अपना रास्ता मस्ती में साइकिल चलाते , ठहाके लगाते और दुनिया जहान की बातें करते बीत जाता था | फिर हम लोग अपने अपने घर को निकल जाते थे | हमारे वो मित्र भी एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते थे और साल में लगभग 9 महीने स्कूल आने के पहले और स्कूल से जाने के बाद खेतों में काम करते थे | उस समय खेती में यंत्रीकरण की शुरुआत हो चुकी थी और हर गांव में दो या तीन ट्रेक्टर आ चुके थे | लेकिन अभी भी बहुत सारे किसानों के पास खेतों की जुताई करने के लिए बैल होते थे | हमारे मित्र के घर भी ट्रेक्टर नहीं था और उनके यहाँ भी जुताई बैलों से ही होती थी |
गांव में हल जोतते समय बैलों को चलने और रोकने के लिए अलग अलग शब्द इस्तेमाल होते थे और बैल इन शब्दों को सुनकर ही रुकते या चलते थे | इन्हीं में से एक शब्द थे "होर रह" जो बैलों को रुकने के लिए प्रयुक्त होता था | चूँकि हमारे मित्र लगातार जुताई करते रहते थे इसलिए ये शब्द उनकी जबान पर चढ़ा हुआ था | वो इसी शब्द का इस्तेमाल अपनी साइकिल को रोकने के लिए भी करते थे , साइकिल में ब्रेक लगाने के बाद | लगातार सुनते सुनते वो शब्द मेरे अवचेतन मन में भी छप गया और मैंने भी साइकिल रोकने के लिए यही शब्द इस्तेमाल करना शुरू कर दिया | फिर साइकिल से स्कूटर , मोटरसाइकिल और अब कार भी , लेकिन अब भी ब्रेक लगाने के समय गाहे बगाहे जबान पे आ ही जाता है "होर रह "|
अफ़सोस सिर्फ इसका है कि उस मित्र से स्कूल के बाद आज तक मुलाकात नहीं हुई | लेकिन शायद जब भी होगी , मैं जरूर पूछूंगा कि उनको याद है कि नहीं "होर रह "|

Saturday, April 19, 2014

सपने--

किसी का असमय चले जाना बहुत पीड़ादायक होता है | कितने खुश थे वो अपनी जिंदगी में | वो दोनों और उनका एकलौता बेटा | ग्रेजुएशन के आखिरी साल में था वो , पढ़ने में भी काफी जहीन था | बेहद खुशदिल ,हमेशा कहता था , कभी आप लोगों से दूर नहीं जाउंगा | लेकिन उस रात अचानक सीने में दर्द उठा और कुछ भी नहीं कर पाये दोनों | चला गया इतनी दूर जहाँ से कोई भी वापस नहीं आता |
पत्नी तो जैसे पागल ही हो गयी थी ,लेकिन उसने अपने आप को सम्भाला | जिंदगी तो नहीं रुक जाती किसी के जाने से , पर अब उसे जीने का मकसद ही नहीं दिख रहा था | फिर उसे याद आयी अपने गांव की जहा पर कोई ढंग का अस्पताल नहीं था | 
और आज अपने गांव में अस्पताल की नींव डालते समय उसे महसूस हुआ कि जैसे उसे जीने का मकसद मिल गया है | शायद अब किसी और सपने को असमय टूट जाने से बचा पाये | 

आगबबूला

एक ही स्कूल में कक्षा ८ में दोनों पढ़ते थे | सूरज अमीरघराने से ताल्लुकात रखता था, वहीं नीरज गरीब था ,फिर भी दोनों के आपसी सम्बन्ध काफी अच्छे थे | उन दोनों का हर कामसाथ-साथ होता था | एक दिन सूरज को गणित का कुछ सवाल नही आ रहा था ,तो नीरज ने कहा कि मेरे घर पर आ जाओ ,वही मिलकर पढाई कर लेते है| वे एक कमरे में पढाई करने लगे तभी अचानक नीरज कि माँ कमरे में आ गई ओर बोली "बचवा तू लोगन के जब भूख पियास लगी तब मांग के खा लीहा , गर्मी क दिन हौ ,पढ़े के समय भूख खूब लागेला | एके आपने घर समझिआ ""
इतना सुनते ही नीरज आगबबूला हो गया और माँ का हाथ पकड़कर कमरे से बाहर कर दिया और कहने लगा कि जब आपको खड़ी हिंदी में बोलने नही आता है तो आप मेरे दोस्तों से बात करने क्यों जाती है |

ग्लानि

"क्या सोच के मुस्कुरा रहे हो ", पत्नी ने कहा तो ध्यान आया कि रात काफी हो गयी | वो किचेन के सारे काम निपटा कर सोने आ गयी लेकिन मैं जगा था | मैंने मुस्कुराते हुए कहा कि कल के डिनर के बारे में सोच रहा था | 
महीनो हो गए थे , माँ के साथ समय बिताये | पापा की मृत्यु के बाद भी वो हमारे साथ रहने को तैयार नहीं हुई और अपने पुराने घर में ही रहती थी | कभी कभी मौका निकाल कर मिल आता था और कभी फोन पर तबियत के बारे में पूछ लेता था | लेकिन आज जैसे ही मैंने फोन किया , माँ ने कहा कि बेटा कल मेरे साथ खाना खाओ | सुनते ही एक ग्लानि सी हुई मुझे कि शायद कुछ ज्यादा ही खुदगर्ज हो गया हूँ | बचपन में भी माँ कही से भी ढूंढ़ कर लाती थी खाना खिलाने के लिए , और आज भी उसे ढूढ़ना पड़ रहा है मुझे | और मैंने भरे गले से कहा " आ रहा हूँ माँ तुम्हारे हाथ का खाना खाने |

अपनापन

कहाँ के रहने वाले हो भाई , टैक्सी में बैठने के बाद साकेत ने ड्राईवर से पूछा | पूछने के दो मकसद थे , एक तो अपने एरिया का निकला तो शायद सही रास्ते ले जाये और जल्दी पहुँचा दे और दूसरा किराया भी कम ले | नए और अनजान शहर में वैसे ही तमाम तनाव होते हैं कि ठगे न जाएँ , सही समय पे पहुँच जाएँ और अगर किसी साक्षात्कार के लिए आये हैं तो फिर तो तनाव ही तनाव | टैक्सी वाले ने बताया कि यू.पी. के हैं तो अगला सवाल कि कौन से जिला के हो | उसके जवाब को सुनते ही साकेत बड़े ही अपनेपन से बोला "अरे हम भी वहीं के हैं " और फिर इत्मीनान से बैठ गया | टैक्सी वाले ने भी कहा कि चिंता मत करो भैया , हम आपको एकदम शॉर्टकट ले चलते हैं | गंतव्य पर पहुँच कर साकेत ने किराया पूछा और बताये किराये से 50 रूपया कम देते हुए बोला "भैया हम से तो ज्यादा मत लो "| पैसे गिनते हुए टैक्सी वाला सोच रहा था कि ये अपनापन उसे कब तक नुकसान पहुँचाएगा |

मुखौटे

आज के कार्यक्रम में आपको जाना है , याद है न | हाँ भाई , याद है , ये राजनैतिक मज़बूरी जो न करवाये | बड़े उखड़े लहजे में उन्होंने कहा और नाश्ते में लग गए | खैर शाम को सभास्थल पर पहुचे और मंच पे विराजमान हो गए | सामने मेज पर एक लड़के ने पानी और कुछ नाश्ते के लिए रख दिया | उस लड़के को देख कर उनकी पानी पीने की इच्छा भी जाती रही | अपना जातिगत संस्कार तो उन्हें रोक रहा था लेकिन दिखाने के लिए उन्होंने पानी को उठाकर मुह से लगाया | पी नहीं पाये तो उसे वापस मेज पर रख दिया | 
कुछ वक्ताओं के बोलने के बाद जैसे ही उनके व्याख्यान का नंबर आया , उन्होंने बड़े ही ओजस्वी भाषा में जाति व्यवस्था और धर्म के खिलाफ भाषण देना शुरू कर दिया | भाषण खत्म हुआ और लोगों के तमाम रोकने के बावजूद वहाँ से निकल लिए कि कहीं उनके साथ कुछ खाना , पीना न पड़ जाये |

इंतज़ार

चाचा , कब से खड़े हो यहाँ पे , किसका इंतज़ार कर रहे हो | हाँ बेटा , किसी का इंतज़ार ही तो कर रहा हूँ , चाचा ने लम्बी सांस लेते हुए कहा | थोड़ा अजीब लगा उनका व्यवहार , इसलिए उत्सुकता हुई जानने की | मैंने थोड़ा सहानुभूति दिखाते हुए कहा "आजकल कोई किसी का इंतज़ार नहीं करता चाचा "| 
सचमुच बहुत तेज जमाना आ गया है और लोग तो एक दूसरे के ऊपर से होते हुए आगे निकल जाते हैं , इंतज़ार की कौन कहे , चाचा ने भी ऊपर देखते हुए कहा | अब तो उत्सुकता कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी थी | मैंने आखिरी कोशिश की जानने की और उनकी तरफ सवालिया निगाह से देखने लगा |
तुम सही कह रहे हो , जब बच्चे छोटे थे तब उनके बड़े होने का इंतज़ार , फिर बड़े होने पे उनके व्यवस्थित होने का इंतज़ार | लेकिन उन्होंने तो जरा भी नहीं सोचा और इतनी दूर निकल गए कि अब तो उनके फ़ोन का ही इंतज़ार रह गया है |
इतने में एक बुजुर्ग महिला सामने से आती दिखीं और चाचा ने उनकी तरफ इशारा करते हुए कहा "इसी का इंतज़ार कर रहा था | ये रोज इसी पार्क में आती है और मुझे कहती है कि तुम बाहर मेरा इंतज़ार करो क्योकि कभी इसी पार्क में वो मेरा इंतज़ार करती थी | 

विरोधाभास

आज का पेपर कैसा हुआ यार , श्याम ने पूछा तो मैंने कहा 'कल तो बहुत डर लग रहा था लेकिन बढ़िया हुआ , अब अगले पेपर की तैय्यारी करनी है "| 
शाम को टहलने निकले तो सबने कहा कि चलो मंदिर हो लेते हैं | लेकिन मैंने मना कर दिया कि मैं मंदिर नहीं जाउंगा , मैं इन सब बातों में यकीं नहीं करता |
लेकिन अगले दिन एग्जाम के लिए जाते समय कल वाली टीशर्ट ही पहन ली | न जाने क्यूँ पर कही न कही ये लग रहा था कि कल वाली टीशर्ट तो लकी थी , वर्ना पहले दिन तो शर्ट पहनी थी और उस दिन पेपर बहुत ख़राब हुआ था |

गाड़ी

अरे ओ साहबजादे , जरा देख के चलाया करो गाड़ी | सारा कपड़ा ख़राब कर दिया | कार पे क्या बैठ गए , पता नहीं क्या समझ लेते हैं अपने आप को |
कपड़ों पे पड़े छीटों को देख देख के मूड ख़राब हो गया उसका | आज बहुत दिन बाद वो पैदल मार्केट निकला था | घर आने पर श्रीमतीजी ने जब पूछा तो सारी भड़ास निकाल दी ये कहते हुए कि लोगों को तो सलीका ही नहीं रह गया गाड़ी चलाने का |
लेकिन अगले दिन ऑफिस में पहुँच कर अपने सहकर्मियों को हँसते हुए बता रहे थे कि आज तो मजा आ गया रास्ते में , एक गड्ढे में गाड़ी का पहिया चला गया और जो छीटें पड़ी लोगों के ऊपर कि होली की याद आ गयी |

लेखक

यार , लोग तो कुछ भी लिख देते हैं और चाहते हैं कि उसे छाप भी दिया जाये | पता नहीं कहाँ कहाँ से लेखक पैदा हो जाते हैं , बड़बड़ाते हुए संपादक महोदय ने उस कहानी को डस्टबिन के सुपुर्द किया और गहरी सांस ली |
किसी का फोन तो नहीं आया था , या कोई नयी कहानी वगैरह तो नहीं आई थी छपने के लिए , थोड़ी देर बाद इंटरकॉम पर अपने सहयोगी से पूछा | 
हाँ सर , एक कहानी तो आई थी , और शिक्षा मंत्री के पी.ए. का फोन भी आया था कि उसे छापना है , लेखक मंत्रीजी का रिश्तेदार है | आप के टेबल पे रख दी थी , मिली क्या , सहयोगी ने बताया | 
हाँ , बहुत बढ़िया है , तुरंत छाप दो इसे , कहते हुए डस्टबिन से बाहर निकाल कर ठीक किया और सहयोगी को देते हुए बोले कि उनको फोन करके विज्ञापन की याद जरूर दिला देना |

"कहानी का विकास"

"कहानी का विकास" 
मैं बड़ी थी तो मुझे लगता था कि मुझमे बहुत ताकत है | मेरा असीम विस्तार , मुझमे समाये हुए तमाम एहसास , मेरे फैले हुए पर , शाखाएं , टहनियां आदि मुझे सम्बल देती थीं | लेकिन समय के साथ मुझे लगने लगा कि शायद ये मेरा विस्तार ही मेरे लिए रूकावट बन रहा है , शायद बहुत विस्तार होने पर तेज हवाएँ मुझे झकझोड़ने लगी हैं | मुझे लगने लगा कि समय के साथ जैसे डायनासोर विलुप्त हो गए , वैसे ही मैं भी कही अदृश्य न हो जाऊँ , इसलिए मुझे नए रूप में जन्म लेना पड़ा | अब मुझमे वो विस्तार तो नहीं है लेकिन शायद ज्यादा पैनापन आ गया है | शायद अपने अल्प रूप में मैं ज्यादा ग्राह्य हो गयीं हूँ .....

फर्क

बस खचाखच भरी हुई थी | शर्माजी किसी तरह अंदर घुसे और खड़े हो गए | अचानक बगल वाली सीट पर निगाह गयी और देखा की सीट पर दो दुबले पतले लोग बैठे हुए हैं | एक उम्मीद बनी कि शायद जगह मिल जाये और बड़े ही दीन हीन लहजे में पूछा कि मैं भी बैठ जाऊँ क्या ? खैर बैठे हुए लोगों को तरस आ गया और उन्होंने थोड़ा सरक कर जगह दे दी | शर्माजी ने मुस्कुराते हुए कहा कि एक दूसरे का ख्याल तो रखना ही चाहिए और और धन्यवाद देते हुए बैठ गए |
अगले स्टॉप पर उनमे से एक आदमी उतर गया और अब शर्माजी को पूरी जगह मिल चुकी थी | थोड़ी देर बाद ही एक आदमी की आवाज उनके कान में आई कि थोड़ा सरक जाते तो मैं भी बैठ जाता | इतना सुनते ही झल्लाते हुआ बोले कि दिखाई नहीं देता , दो ही लोगों की सीट है फिर कैसे बिठा लें आपको , और इयरफोन से गाना सुनने में तल्लीन हो गए |

सरोकार

सामाजिक सरोकार तो अब बचे ही नहीं , बस खुदगर्जी ही है आजकल | मन बड़ा खट्टा हो गया मेरा , भार्गवजी बता रहे थे तो मैंने पूछ लिया कि क्या हो गया | बड़े दुखी मन से बोले , आपको शायद पता नहीं , मेरे पड़ोस में एक नए दम्पति आये हैं रहने के लिए | मैंने सोचा कि चलो उनसे परिचय भी कर लें और पूछ भी लें अगर किसी चीज कि जरुरत हो तो | लेकिन क्या बताएं साहब , उन लोगों ने तो बात करना ही मुनासिब नहीं समझा , दरवाजे से ही नो थैंक्स कह कर टरका दिया |
क्या कीजियेगा भार्गव साहब , आजकल लोग नहीं चाहते कि दूसरे उनके मामलों में दखल दें | अब सारे आप की तरह सामाजिक तो नहीं होते न | भार्गव साहब भुनभुनाते हुए जा रहे थे और मैं सोच रहा था कि आज की पीढ़ी में क्या सचमुच सामाजिक सरोकार नहीं बचे हैं |

अन्धविश्वास

मैं जा रहा हूँ , अजय के घर होते हुए जाऊंगा परीक्षा देने | ये कहते हुए मैंने अपना बैग उठाया और घर के बाहर निकल पड़ा | भैया ने भी हाथ हिलाकर विदा किया और शायद मन ही मन मेरे परीक्षा के अच्छे होने की कामना की | मैं पैदल चलते हुए अजय के घर पहुंचा | अजय भी तैयार था चलने के लिए और जैसे ही मैंने आवाज दी , वो घर से निकलने लगा | तभी उसकी माँ ने आवाज लगायी , अरे बेटा रुको , जरा ये दही गुड़ तो खा लो , फिर जाना परीक्षा देने , और फिर उसे एक कटोरी में दही गुड़ दिया खाने के लिए |
अजय मेरा बहुत अच्छा दोस्त था , हम दोनों रोज स्कूल साथ जाते थे और साथ ही वापस आते थे | लेकिन हम दोनों में एक बड़ा अंतर था , उसका मन पढ़ने में बिलकुल नहीं लगता था और किसी तरह वो पास हो जाता था | लेकिन हर बार परीक्षा के समय उसकी माँ उसे दही गुड़ जरूर खिलाती थीं | वो उनके मन का विश्वास , या यूँ कहें कि अन्धविश्वास था कि दही गुड़ खाने से बेटे की परीक्षा अच्छी होगी |