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Sunday, August 31, 2014

दक्षिण अफ्रीका डायरी - भाग ३

मैंने अपने बिल्डिंग के पड़ोसियों एवम अन्य कई लोगों का जिक्र किया लेकिन अपने मकान मालिक का जिक्र किये बिना बात अधूरी रहेगी | डॉ क्लोटनिक , जो कि सामान्य बीमारियों के डॉ हैं और यहाँ पर रहने वाले सारे बैंकर्स के भी डॉ हैं | नौजवान , खुशमिजाज और हमेशा मदद के लिए तैयार | यहाँ पर रह रहे अन्य प्रवासियों की किस्मत शायद उतनी अच्छी नहीं है , लेकिन मुझे अब झिझक होने लगी है उनसे कुछ कहने में | हमेशा एक ही बात कहते हैं " मैं चाहता हूँ कि आप और आपके परिवार को यहाँ कोई दिक्कत नहीं हो " | अगर मैंने भूल से भी कह दिया कि कोई चीज पुरानी हो रही है घर में , तो अगले ही सप्ताह कई नई चीजें लेकर हाजिर | बीच बीच में फोन करके कुशलछेम पूछते रहना और महीने दो महीने में एक बार मिल लेना उनकी आदत में शुमार है | घर पर काम करने वाली बाई " क्रिस्टीना ", जिसे हम मज़ाक में कैटरीना कहते हैं , एक ६३ वर्षीय महिला है जो बहुत खुशमिजाज और कर्मठ है | बहुत मेहनत और सफाई से अपना कार्य करके शाम को अपने घर वापस | हिंदुस्तानी चावल उसे बहुत पसंद है और लगभग हर सब्ज़ी को चखने के बाद एक ही वाक्य बोलती है " बहुत तीखा है "|
घर के ठीक सामने ही वांडरर्स स्टेडियम है जहाँ पर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेले जाते हैं | पाकिस्तान की क्रिकेट टीम का मैच था इसी स्टेडियम में और पहली बार किसी अंतर्राष्ट्रीय मैच को इतने आराम से देखने का मौका मिला | यहाँ पर लोग सिर्फ मैच देखने नहीं आते हैं बल्कि पूरा पिकनिक मनाने आते हैं , ढोल ढमाके के साथ , बियर पीते हुए | मैच के बीच में जो आधे समय का अंतराल होता है उसमे सभी दर्शकों को मैदान में जाने की अनुमति होती है | हम लोग भी इस दरम्यान मैदान में घूम लिए |
अचानक बैंक के एक कार्य से डरबन जाने का कार्यक्रम बन गया | यहाँ कि सस्ती विमान सेवा जिसका नाम " मैंगो एयरलाइन्स " है , से डरबन गए | समुद्र तट पर स्थित एक होटल में हम लोग रुके | समुद्र तट बहुत स्वच्छ था और आस पास का इलाका बहुत सुन्दर | दिन में बैंक का कार्य निपटाया और शाम को होटल आने पर पता चला कि हिंदुस्तान से कई टेलीविज़न सितारे भी उसी होटल में ठहरे हुए हैं | फिर अगले दिन उन सारे सितारों से मुलाक़ात हुई | हिंदुस्तान में ऐसे लोगों से मिलना बहुत दुरूह होता है लेकिन यहाँ बड़े आराम से मिलते हैं ये लोग | डरबन में काफी हिंदुस्तानी लोग रहते हैं और उन लोगों ने कई मंदिर इत्यादि भी बना रखे हैं | डरबन स्थित शिव मंदिर , पक्षी पार्क , और चर्च देखा और रात्रि में समीप स्थित मल्टीप्लेक्स में बुलेट राजा फिल्म देखी क्योंकि इस फिल्म की शूटिंग लखनऊ में मेरी पदस्थापना के दरम्यान ही हुई थी |
तीसरे दिन पुनः उसी मैंगो एयरलाइन्स से जोहानसबर्ग वापसी हुई | क्रमशः ...

Saturday, August 30, 2014

खुश खबरी--

" बेटा , अब दूसरे विवाह की तैयारी करो , इससे तो कुछ होना नहीं है " |
" लेकिन माँ , दूसरे में भी क्या भरोसा , थोड़ा और सबर करो " , और बात आई गयी हो गयी |
कुछ महीनों बाद खुश खबरी थी , माँ बहुत प्रसन्न हुई |
और बेटे का दोस्त जो कुछ दिनों पहले आया था , अचानक वापस चला गया |

वक़्त--

इंसानों की आवाज अब यहाँ नहीं आती थी | भयानक सन्नाटा फ़ैल गया था , कहीं कोई हलचल नहीं |
कभी ये जगह बहुत आबाद थी | चारो तरफ फैली हरियाली , उनके बीच ढेर सारे मकान और हर तरफ जीवन के निशान | यहाँ रहने वाले अपने जीवन से संतुष्ट और उन्हें मिलता था प्रकृति का भरपूर सानिध्य |
अचानक सीमा पार से गतिविधियाँ बढ़ गयीं , चिड़ियों के चहचहाने की जगह गोलियों की तड़तड़ाहट ने ले ली | जीवन के संगीत पर मौत का रुदन भारी पड़ गया | देखते ही देखते पूरा इलाका श्मशान में तब्दील हो गया | अब उजड़े हुए मकान , गुजरे हुए वक़्त की तरह बेजान पड़े थे , इस आशा में कि शायद फिर कभी हरियाली और जीवन का साथ हो यहाँ |

दक्षिण अफ्रीका डायरी- भाग २ --

२३ अगस्त २०१३ को रात २ बजे जहाज ने मुंबई हवाईअड्डे को अलविदा कहा और हमारी दक्षिण अफ्रीका यात्रा प्राम्भ हो गयी | उस पूरी यात्रा में , नए देश में जाने का रोमांच , घबराहट या उत्सुकता जो भी कह लें , नींद आँखों से कोसों दूर थी | सुबह ७.३० पर जोहानसबर्ग हवाईअड्डे पर उतर कर कुछ अलग सा महसूस हुआ | गर्म देश से आने के बाद एकदम ठन्डे क्षेत्र में पहुँच गए थे | हमारी शाखा के एक अधिकारी मौजूद थे ले जाने के लिए | होटल पहुंचे और कमरे में बैठने पर थोड़ी राहत मिली | फिर थोड़ा बाहर घूमे , अपने शाखा के लोगों के साथ भोजन और फिर शहर को देखा |
सोमवार को अपनी शाखा में पहला दिन था , भारत की शाखाओं से काफी अलग | खूबसूरत ऑफिस , जो यहाँ के सबसे बेहतरीन माल में स्थित है और पूर्ण शांति | धीरे धीरे यहाँ के वातावरण से अभ्यस्त होने लगे हम लोग | सबसे बड़ी समस्या जो पहले नज़र आई वो थी आवागमन की | आवागमन के सामान्य साधन जैसे बस , टैक्सी इत्यादि थे तो लेकिन उनको इस्तेमाल करने की मनाही थी | सुरक्षा की दृष्टि से भी और घर से ऑफिस के बीच सीधा साधन भी सुलभ नहीं था | खैर कार ले ली , और धीरे धीरे यहाँ के यातायात नियमों से वाकिफ़ होने लगे | पहली चीज जो नज़र आई वो थी लोगों में ट्रैफिक नियमों के प्रति जबरदस्त अनुशासन | लाल बत्ती कोई पार नहीं करता चाहे दिन हो या रात हो | हर दो गाड़ियों के बीच में दूरी बनाकर चलना और सबसे आश्चर्यजनक बात थी , हॉर्न का बिलकुल ही प्रयोग नहीं | मैं पहले से ही ध्वनि प्रदुषण के लिए सजग रहा हूँ इसलिए मुझे कोई दिक्कत नहीं आई लेकिन अब तो लगभग भूल ही गया हूँ हॉर्न के बारे में | शानदार सड़कें और प्रदूषणमुक्त वातावरण , बीमार आदमी भी चंगा हो जाये यहाँ आकर |
दूरभाष पर बात करना भी शुरुआत में दुरूह कार्य था , क्योंकि सबसे पहले तो कुशलछेम पूछिये , फिर अपनी बताईये और उसके बाद उस क्लिष्ट अंग्रेजी को समझिए | महीनो लग गए किसी से खुल कर बात करने में , सम्प्रेषण की दिक्कत तो खैर आज तक है लेकिन अब कम से कम समझ और समझा लेते हैं लोगों को |
स्कूल में विशू के प्रवेश को लेकर भाग दौड़ शुरू हुई | लखनऊ में रहते हुए ही मैंने यहाँ के एक स्कूल में प्रवेश के लिए आवेदन कर दिया था लेकिन उन्होंने प्रतिक्षासूची में डाल रखा था | फिर दूसरे स्कूलों का चक्कर शुरू हुआ और अंत में ईडन कॉलेज में विशू को प्रवेश मिल गया | इतना ध्यान रखने वाला प्राचार्य मैंने नहीं देखा | किस चीज में सुधार की जरुरत है , इसका निर्णय पहले हफ़्ते में ही कर दिया उन्होंने और विशू को तमाम कार्य जैसे अंग्रेजी पुस्तकें पढ़ना , निबंध लिखना इत्यादि शुरू करा दिया | धीरे धीरे विशू ने अपने आप को स्कूल के माहौल में ढाल लिया |
एक महीना बीतते बीतते थोड़ा बहुत देखना शुरू कर दिया था इस देश को | सबसे पहले नेल्सन मंडेला स्क्वायर में लगी हुए उनकी विशालकाय प्रतिमा देखी | फिर अगल बगल के पार्क इत्यादि देखा | अब यहाँ के सड़कों पर जी पी एस लगाकर चलने की आदत पड़ने लगी थी और हम लोग अपने से कुछ जगहों पर जाने लगे थे | क्रमशः ...

Thursday, August 28, 2014

--आज़म खान की भैंसों की बातचीत--

" बाहर कितनी गर्मी थी न , और गन्दगी भी बहुत थी " | 
" लेकिन बड़ा सुकून है यहाँ " , मुस्कुराते हुए एक ने कहा | 
" हाँ , वो तो है , लेकिन कुछ दिन पहले तो अपनी भी हालत ख़राब थी " , दूसरी ने कहा | 
" किस्मत इसी को कहते हैं न " और सभी हँस पड़ीं |
थोड़ी देर बाद कुछ आदमी आये और इज़्ज़त से सबको बाहर ले गए | पानी के फव्वारे में सब स्नान करने लगीं |
एक तरफ खाने पीने के लिए तरह तरह के खाद्य पदार्थ थे , इत्र की खुशबु फैली हुई थी | खाने पीने के बाद सब आराम फरमाने लगीं |
सारे आदमी निगरानी में लगे हुए थे कि इन्हे कोई दिक्कत न होने पाये |
--आज़म खान की भैंसों की बातचीत--

दक्षिण अफ्रीका डायरी--

कल दक्षिण अफ्रीका प्रवास का एक वर्ष पूर्ण हुआ | कैसे बीत गया , पता ही नहीं चला | शायद अच्छे दिन ऐसे ही उड़ जाते हैं और पीछे मुड़ कर देखने नहीं देते | पिछले वर्ष जब आया था तो भयभीत था , सभी परिचितों ने और बैंक के भी लोगों ने काफी डरा दिया था कि बहुत खतरनाक जगह है , एकदम सुरक्षित नहीं है और सामाजिक जीवन तो ख़त्म ही हो जाने वाला है | लेकिन इस एक वर्ष ने इन सभी धारणाओं को न केवल निर्मूल साबित कर दिया , अपितु ये भी दिखा दिया कि यह देश बहुत जीवंत , सुरक्षित और खूबसूरत है |
कहीं भी निकल जाइए , सब तरफ हरियाली ही हरियाली | जोहानसबर्ग तो शायद दुनिया के प्रथम तीन सबसे हरे भरे शहरों में शुमार होता है | सामाजिक जीवन भी बेहतरीन है , हर हफ्ते शनिवार और रविवार को लोग जम के मौज मनाते हैं | इन दो दिनों में कही दूर निकल जाना और पिकनिक या पार्टी करना इनकी दिनचर्या में शामिल है |
थोड़ी असुरक्षा है यहाँ , लेकिन वो विश्व के किस भाग में नहीं है | बस थोड़ा सतर्क रहने कि जरुरत होती है यहाँ , देर रात्रि विचरण यहाँ थोड़ा असुरक्षित है , लेकिन नाईट लाइफ भी बढ़िया है यहाँ | सड़के शानदार , विद्युत व्यवस्था बहुत उम्दा और चारो ओर साफ और सुन्दर | लोग काफी सुसंस्कृत और मददगार | यहाँ से डरबन तक सब देख लिया , गाँधीजी का टॉलस्टॉय फार्म , पीटरमेरिटबर्ग स्टेशन जहाँ उनको ट्रेन के डब्बे से निकला गया था , और नेल्सन मंडेला का घर एवम कार्यस्थल | अब केपटाउन देखना है , यहाँ का सबसे खूबसूरत शहर |
अब थोड़ा अपने निवास स्थान के बारे में , जिस सोसाइटी में हम रहते हैं वहां कोई भी हिंदुस्तानी परिवार नहीं है | इससे यहाँ के लोगों के रहन सहन एवम संस्कृति के बारे में काफी जानने को मिला | एक पड़ोसी महिला है जो बुजुर्ग हैं और घर के बुजुर्ग की तरह ध्यान रखती हैं , इतना ध्यान की कभी कभी उकताहट भी होने लगती है , लेकिन फिर भी अच्छा लगता है | विशू जिस स्कूल में पढ़ते हैं , वहां कोई स्कूल बस नहीं जाती | यहीं एक और पड़ोसी हैं जिनके दो बच्चे हैं जो उसी स्कूल में पढ़ते हैं | शुरुआत में तो वो ही स्कूल ले जाते थे और ले भी आते थे लेकिन मेरे बहुत कहने सुनने के बाद हफ्ते में दो दिन मुझे इज़ाज़त दी कि मैं बच्चों को स्कूल छोड़ूँ | ले आने के लिए अधिकांशतया वो ही ले आते हैं | दिल जीत लिया है उन्होंने हमारा , कभी कभी तो उनके बच्चे नहीं भी जा रहे होते हैं तो भी विशू को अकेले ही ले जाते हैं | बहुत ही बेहतरीन इंसान , बिरले ही मिलते हैं ऐसे लोग |
यहाँ की एक प्रथा हैं कि आप किसी से भी मुखातिब होते हैं तो वो आपकी कुशलछेम जरूर पूछता है और आपसे भी उम्मीद की जाती हैं कि आप भी पूछें | शुरुवात में दिक्कत हुई लेकिन अब आदत पड़ गयी हैं , कोई भी हो , गार्ड , ड्राइवर , स्वीपर या ग्राहक , सबका कुशलछेम पूछना ही हैं | बिलकुल शांति पसंद लोग, लेकिन उतने ही संगीत और नृत्य प्रेमी |
कुल मिलाकर बड़ा सुखद अनुभव हैं यहाँ का और जो लोग भी अफ्रीका देखना चाहते हों वो यहाँ जरूर आएं | कुछ और बातें फिर कभी , लेकिन अपना देश तो शिद्दत से याद आता है |

Saturday, August 23, 2014

टोटका--

यूँ तो पहले भी कई चित्र बनाये थे उसने , लेकिन ये काफी चुनौती भरा था | इस चित्र ने उसे उलझन में डाल दिया था | एक ऐसे परिवार का चित्र बनाना था जो गरीब प्रतीत हो , कई बच्चों वाला हो और जिसे देखकर मन में करुणा का भाव आ जाये |
जब चित्र पूरा हुआ तो उसने देखा कि बच्चों की संख्या ७ थी, यानि विषम संख्या | फिर वही उलझन , हमेशा सम संख्या ही रही थी उसकी चित्रकारी में | अब क्या करे वो , चित्र में कहीं भी जगह नहीं बची थी किसी और को बनाने की | दुबारा चित्र बनाने की बिलकुल इच्छा नहीं हो रही थी | 
अचानक उसके दिमाग में एक विचार कौंधा | थोड़ी देर बाद स्त्री के पेट में भी एक बच्चा दिख रहा था | उसका सम संख्या वाला टोटका कायम था |

Friday, August 22, 2014

चित्र --

" बच्चों , इस चित्र को देख कर आपको कुछ पंक्तियाँ लिखनी हैं | लेकिन ध्यान रहे , बिलकुल संक्षेप में "| कला के शिक्षक ने चित्र को श्यामपट्ट पर टाँग दिया और कुर्सी लगाकर बैठ गए | चित्र में एक माता पिता ढेर सारे बच्चों के साथ थे |
कुछ देर बाद बच्चों की कापियाँ उनके सामने थीं | हर बच्चे ने चित्र को अपने तरीके से परिभाषित करने की कोशिश की थी |
सर्वाधिक नंबर पाने वाले बच्चे की काँपी में सिर्फ ये लाइन लिखी थी " इतने सारे बच्चों के बारे में लिखने के लिए कई पेज लगेंगे , संक्षेप में कैसे लिखें " |

Tuesday, August 19, 2014

तमाचा--

" कितने गंदे लोग हैं, छी, सब तरफ गन्दगी ही गन्दगी, उधर किनारे चलते हैं", कहते हुए लड़का बड़े प्यार से हाथ पकड़ कर उसे किनारे ले गया और आँखों में आँखें डाल कर खो गए दोनों|
" साहब मूंगफली ले लो , टाइम पास "|
" ठीक है, दे दो ", और उसने फटाफट पैसे देकर रुखसत किया उसको|
बैटन बैटन में पता ही नहीं चला, कब मूंगफली ख़त्म हो गयी और अँधेरा हो गया| दोनों उठ कर चलने लगे|
लेकिन जैसे ही लड़की ने झुक कर छिलके उठाये, लड़के का हाथ अपने गाल पर चला गया|  

Saturday, August 16, 2014

झंडा--

" सारी तैयारी हो गयी न , सबको बता दिया कल सुबह जल्दी आने के लिए" | 
" यस सर", रवि ने कहा | पूरे ऑफिस को साफ किया गया था और पूरी तैयारी हो गयी थी |
रवि ने एक बार फिर सारा कुछ देखा , कहीं कोई कमी न रह जाये | बड़े साहब नए नए आये थे और वो कोई मौका नहीं छोड़ना चाहता था उनको इम्प्रेस करने का | पिछले वाले की तो कोई रूचि नहीं थी इसमें , लेकिन ये तो काफी उत्साहित थे | खैर , लड्डूओं का आर्डर हो गया था , समोसे भी आ जायेंगे और कोल्ड ड्रिंक भी |
अगले दिन सुबह सबसे पहले पहुँच गया ऑफिस | फटाफट भोला को दौड़ाया लड्डू और समोसे के लिए | स्टाफ आने लगा था और बड़े साहब कभी भी आ सकते थे | अचानक रवि को ध्यान आया कि झंडा तो निकाला ही नहीं , भाग के गया और अलमारी खोली | पूरी अलमारी ढूंढ डाली , लेकिन झंडा नहीं मिला | यहीं तो रहता था झंडा , अब कहा खोजे | इस समय तो खादी की दुकान भी नहीं खुली होगी | पसीना निकलने लगा था , कि अचानक भोला दिखा | रवि ने घबराये स्वर में पूछा " झंडा कहा है , मिल नहीं रहा " |
" साहब , झंडा मैंने प्रेस करा के रखा है , आज तो बिलकुल साफ सुथरा झंडा फहराना चाहिए न" , और उसने झंडा ला कर रख दिया | पता नहीं क्यूँ , रवि को लगा कि स्वतंत्रता दिवस मनाने का असली हक़ तो भोला को ही है |

लड्डू--

स्कूल में बड़ी चहल पहल थी, लाउड स्पीकर लगा था और स्कूल के सामने एक बड़ा सा झंडा भी लटका हुआ था| बुधिया सोचने लगी कि आज क्या बात है, वैसे तो स्कूल में कम बच्चे ही दिखते हैं लेकिन आज तो पूरा गाँव उमड़ पड़ा है|
तब तक उसका बेटा बोला कि मैं भी जाऊंगा आज स्कूल| वो सोच में पड़ गयी, भेजें कि नहीं, वैसे तो स्कूल जाता नहीं, लेकिन फिर उसने सोचा भेज देते हैं आज|
" ठीक है बेटा, चला जा स्कूल, लेकिन जल्दी वापस आना, लाला के खेत पर भी जाना है"|
कुछ समय के बाद बेटा लौटा, उसके हाथ में लड्डू था और चेहरा खिला हुआ था| दूर से ही चिल्लाते हुए बोला " माँ, मैंने लड्डू खाए और तुम्हारे लिए भी ले आया, मैं अब रोज़ स्कूल जाऊंगा "|
" लेकिन बेटा, रोज़ लड्डू नहीं मिलते वहां, लेकिन रोटी तो रोज खानी है ना ", बुधिया ने लड्डू कटोरी में रखा और बेटे को लेकर खेतों की ओर चल दी| 

गऊ माता--

आज तो जरूर कुछ न कुछ ले आऊंगा , सतई ने सोचा और निकल गया । आज दूसरा दिन था और घर में खाने को कुछ नहीं था । एक बार फिर वो गांव का चक्कर लगा आया , कहीं कोई काम नहीं मिला । हैरान , परेशान वो गांव के बाहर ऊसर की ओर चल पड़ा ।
अचानक उसे किसी की आवाज सुनाई दी , पलट के देखा तो प्रधान उसे बुला रहा था । जैसे ही वो नजदीक पहुंचा , प्रधान बोला " अरे सतई , मेरी गाय मर गयी है , उसे उठा लाओ और फेंक दो , और ये कहते हुए उसने एक 100 का नोट निकाल के पकड़ा दिया ।
सतई को तो मानो सब कुछ मिल गया , रुपये भी मिले और चमड़ा भी । उसके कान में कहीं सुना ये वाक्य गूंज रहा था " गाय हमारी माता है "और वो प्रधान के घर चल दिया |

Tuesday, August 12, 2014

अलार्म--

टिर्र , टिर्र सुनकर चौंक कर उठ बैठा वो | ७ बज गए , ये बिना अलार्म के कमबख्त नींद ही नहीं खुलती , और ये अलार्म इतना कर्कश क्यों है | शायद हर जरुरी चीज़ कर्कश होती है , दवा की तरह | तुरंत उसने खिड़की के पर्दे हटाये , सामने के फ्लैट का किचेन दिख रहा था | उसकी निगाहें चारो तरफ़ किसी को तलाश रहीं थीं , लेकिन कोई नज़र नहीं आया |
पिछले कई हफ़्तों से यही चल रहा था , सुबह उठने के बाद सामने वाले फ्लैट की तरफ़ ही निगाह रहती | कभी कभी ही दीदार हो पाता पर ये सिलसिला जारी था | दिमाग हमेशा कहता कि उससे मिला जाये , बात किया जाये लेकिन दिल गवाही नहीं देता | इसी जद्दोजहत में दिन बीत रहे थे |
रात में उसने तंय किया कि अब पता लगाएंगे उसके बारे में ! समय से पहले तैयार होकर उसके फ्लैट के सामने खड़ा हो गया | दिल की धड़कन बढ़ गयी थी , क्या पूछेगा , कैसे पूछेगा , मन में यही सब चल रहा था | एक कार रुकी , एक आदमी उतरा और उस फ्लैट का बेल बजाने लगा | दरवाजा खुला , लड़की बाहर निकली , उसके हाथ में एक छड़ी थी | उस आदमी ने दरवाजा बंद किया और फिर उसका हाथ पकड़ कर कार में बैठा दिया | इतनी खूबसूरत , लेकिन वो खुद जहाँ की खूबसूरती नहीं देख सकती ! ये क्यों होना था ! प्रकृति इतनी बेरहम , निष्ठुर कैसे हो सकती है , तमाम प्रश्न कौंध रहे थे मन में !
फिर अचानक अलार्म बजा ,  और उसकी आँख खुल गयी |  

Sunday, August 10, 2014

आज़ादी

" अस्सलाम वालेकुम चचा , कैसे हैं " |
"वालेकुम अस्सलाम , सब खैरियत है बेटा , अल्लाह का करम है " | " खैर बताओ , आज इधर का रास्ता कैसे भूल गए , कोई ख़ास वज़ह " |
" कुछ ख़ास नहीं चचा , बस १५ अगस्त नज़दीक आ रहा है तो सोचा कि आपसे मुलाक़ात कर लूँ "| " इस बार फिर आपको स्कूल के जलसे में आज़ादी के बारे में भाषण देना है , उम्मीद है कि आप इंक़ार नहीं करेंगे " |
" बरखुरदार , तुमने थोड़ी देर कर दी , अभी अभी इमाम साहब का न्यौता क़ुबूल कर के आ रहा हूँ " | " उन्होंने मदरसे में बुलवाया है उसी दिन , बहरहाल , तुम बैठो और कुछ जलपान वगैरह कर के जाओ " |
" नहीं चचा , किसी और दिन बैठेंगे , आज मुआफ़ कीजिये " , और वो वापस लौट गया |
चचा ने एक गहरी साँस ली और सोचने लगे कि आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने का इतना तो फ़ायदा है कि कम से कम साल में दो दिन तो लोग इज़्ज़त बख्श देते हैं | 

Friday, August 8, 2014

बरसात--

शाम गहराने लगी थी , सूरज लुकाछिपी खेल के अंधेरों में ग़ुम हो गया था । पंछी उड़ कर अपने अपने घोसलों में पहुँच गए थे । एक अजीब सा सन्नाटा , शान्ति तारी हो गयी थी चारो ओर । लेकिन उन दो दिलों को तो जैसे ये सन्नाटा ही सुकून के पल देता था , एक दूसरे की आँखों में आँखों डाले , बिना आवाज , घंटों बैठे रहते थे । वो शामें , नदी का किनारा , ठंडी हवा , ऐसा लगता कुदरत भी उनके मिलने का इंतज़ाम कर के खुश होती थी ।
लेकिन मौसम ने अंगड़ाई ली , शाम की शीतलता के बाद दिन में आग बरसाता सूरज आया , वैसे ही समाज की जलती निगाहें उनका पीछा करने लगीं । अब कोई जगह मुफ़ीद नहीं रही उनके मिलने के लिए , तो उन्होंने सोचा कि ख्वाबों में ही अब मिलते है । जी लेते हैं अपने उन पलों को , अपने तरीके से , वग़ैर किसी फ़िक्र के ।
आख़िरकार वही हुआ , अलग़ होना पड़ा उनको । ख्वाबों में भी बंदिशें लग गयीं । बादलों के बरसना भूलने से जैसे प्यासी धरती त्राहि माम करती है , वैसे ही उनकी जिंदगी में भी दरारें पड़ गयीं । वो अब भी आसमां की ओर टकटकी लगाये देखते हैं , कि कब होगी प्यार की बरसात और कब वो फिर भींग जायेंगे उसमे ।   

Thursday, August 7, 2014

इंसानियत का खून--

चारो तरफ चीख़ पुकार मची हुई थी, सारे बदहवास भाग रहे थे। जिधर देखो उधर, आग ही आग, ख़ून और मांस बिखरा पड़ा था|
थोड़ी ही देर में इलाक़ा पुलिस और मीडिया के लोगों से भर गया। बम डिस्पोजल स्कवॉड भी आ गया। पूरे शहर में तनाव फ़ैल गया क्योंकि विस्फ़ोट की जगह एक धर्मस्थल के पास थी और अफ़वाहें पूरे जोरों पर थीं।
इन सबसे बेख़बर , एक मोहल्ले में बूढ़ा भिखारी अपनी जगह पर बैठा हुआ था। किसी को नहीं पता था कि वो किस मज़हब का है, सबके आगे हाँथ फैलाना और कुछ मिल जाने पर दुआ देना, बस इतना ही जानता था वो। बड़े और बिखरे बाल और बड़ी सी दाढ़ी उसकी पहचान थे। लेकिन उसी मोहल्ले के एक कोने में कुछ लोग आपस में फ़ुसफ़ुसा रहे थे " वो जरूर उस मज़हब का ही है , मौका है इस विस्फ़ोट का बदला ले लेते हैं ।
और थोड़ी देर में लोगों ने देखा कि इंसानियत का एक बार फिर खून हो गया था। 

इज़्ज़त--

" ये सब छोड़ क्यों नहीं देती ", कपड़े पहनते हुए उसने कहा।
" एक नयी जिंदगी शुरू करो, इस गन्दगी से दूर, इज़्ज़त की जिंदगी "।
वो बिफर गयी, " ऐसा है, ऐसे भाषण देने वाले बहुत मिलते हैं, लेकिन कपड़े पहनने के बाद"।
" और ये काम मैं किसी के दबाव में नहीं करती, अपनी मर्ज़ी से करती हूँ और अच्छे पैसे मिल जाते हैं"। ये मुझे भी पता है ज्यादे दिन नहीं चलना है ये, इसीलिए भविष्य के लिए भी कमा लेना चाहती हूँ "।
फिर एक गहरी नज़र और डाली उसने और बोली, " एक बात और, इज़्ज़त जब तुम लोगों की नहीं जाती, तो मेरी क्यों जाएगी"।
अब उसकी ऑंखें मिलाने की भी हिम्मत नहीं थी, चुपचाप निकल गया| 

Wednesday, August 6, 2014

जिंदगी की लौ--

रात काफी हो गयी थी, एक ढिबरी हल्का उजाला फैला रही थी झोपड़ी में। रमिया नींद के झोंके में थी, लेकिन ध्यान दरवाजे की ओर लगा था। रोज तो किसना आ जाता था अब तक, आज पता नहीं कहाँ रह गया। एक कोने में थाली में कुछ रोटियां और थोड़ी सब्जी रखी हुई थी और दूसरे कोने में दोनों बच्चे एक कथरी पर गुड़ मुड़ सोये हुए थे।
अचानक कमरे में शराब की बदबू फ़ैल गयी, रमिया चौंक कर उठ बैठी। किसना अंदर आ गया था और आते ही खटिया पर गिर गया। " खाना लगा जल्दी " किसना दहाड़ा और रमिया ने झट से थाली खटिया पर रख दिया।
" कितनी ठंडी रोटी है और ये पनीली सब्जी बनायीं है, ऐसा खाना तो कुत्ता भी नहीं खा सकता", और थाली फेंक दी उसने। बच्चे थाली की आवाज़ से उठ गए और छोटा रोने लगा।
रमिया ने थाली उठाई, रोटियों को वापस थाली में रखा और दुबारा खटिया की ओर बढ़ी, तब तक किसना खर्राटे भरने लगा था। रमिया ने उसके फटे जूते निकाले, और आ कर बच्चों के पास लेट गयी। छोटा रोते रोते सो गया था, ढिबरी की लौ अब बुझने लगी थी और रमिया अपनी जिंदगी को ढिबरी की लौ की तरह टिमटिमाता महसूस कर रही थी। 

Monday, August 4, 2014

सोच--

बड़ी मुसीबत है , कोई काम करने वाला मिलता ही नहीं आजकल , अगर हो सके तो कोई काम करने वाला ढूंढ दो " ,|
"ठीक है मेमसाब , मैं देखता हूँ " |
कुछ दिन बाद , दरवाजे पर दस्तक हुई , शालिनी ने दरवाजा खोला तो देखा गार्ड के साथ एक लड़का भी खड़ा है ।
" मेमसाब , आपको काम करने वाला चाहिए था न , ये मिला गेट पर , काम ढूंढ रहा था " ।
"क्या नाम है तुम्हारा , कहाँ के रहने वाले हो तुम और तुम्हारे माता पिता क्या करते है ??" | इतने सवाल एक साथ सुनकर लड़का घबरा गया । फिर थोड़ा रुक कर बोला " जी मेरा नाम कलीम है , माँ बाप नहीं हैं और कल से भूखा हूँ , कुछ भी काम कर लूंगा " ।
"कलीम , अच्छा , अभी फ़िलहाल जरुरत नहीं है " और दरवाजा बंद कर दिया । 

Sunday, August 3, 2014

नज़रिया--

" बड़ा ख़राब जमाना आ गया है, अब घर में विधर्मी नौकर रख लिया है, कौन खायेगा, पियेगा उसके घर"। राधा ऊँचे स्वर में अपने पड़ोसन को बता रही थी।
" अरे हमसे कहा होता, हमने दिला दिया होता नौकर, कोई कमी है इनकी ", पड़ोसन ने भी हाँ में हाँ मिलायी।
थोड़ी देर में ही बेटी से बात करते हुई राधा ने पूछा " अरे कोई काम वाली मिली की नहीं "।
" हाँ माँ, मिल गयी है, बहुत सफाई से काम करती है फातिमा "।
" देखना बेटा, संभाल के रखना, आज कल टिकते नहीं ये लोग, समझी "।

चोरी

सिग्नल पे कई गाड़ियां खड़ी थीं , मुझे भी रोकनी पड़ी । अचानक सड़क के किनारे नज़र पड़ी तो देखा कि एक लड़का भाग रहा है , फटे कपड़े पहने हुए और उसके पीछे दो तीन लड़के और दौड़ रहे थे । फिर पीछे से एक अधेड़ पुरुष को चिल्लाते हुए दौड़ते देखा तो माजरा समझ में आया । अब गौर से आगे भागते लड़के को देखा तो उसके हाथ में एक पर्स दिख गया । लेकिन वो तेज नहीं दौड़ पा रहा था , शायद भूखा था या बीमार , लेकिन उसके पीछे दौड़ने वाला अधेड़ तो बिलकुल भी दौड़ नहीं पा रहा था । काफी मोटा आदमी था वो और शायद पैदल चलने की आदत नहीं थी उसकी । एक बार तो मन में आया की मैं दौड़ा के पकड़ लूँ , फिर पता नहीं क्यों , नहीं निकल पाया अपनी गाड़ी से । अब तक सिग्नल हरा हो गया था और गाड़ी आगे बढ़ानी पड़ी ।
रास्ते भर सोचता रहा कि सही किया या गलत । मन कह रहा था कि गलत किया , उसे पकड़ लेना चाहिए था । लेकिन दिल कह रहा था कि उसे नहीं पकड़ के कोई गलती नहीं की , क्योंकि जो लड़का पर्स ले के भाग रहा था , वो बहुत कमजोर और गरीब लग रहा था । जिसका पर्स ले के भागा था , वो काफी अमीर लग रहा था , बड़ी गाड़ी में था और शायद उस पर्स के चले जाने से उसको बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ता । लेकिन फिर भी चोरी तो चोरी ही है , हो सकता है कि वो लड़का नशे का आदी हो , लेकिन अगर उस लड़के ने भूख या गरीबी के चलते पर्स चुराया था तो पता नहीं क्यों , मुझे बहुत बड़ा अपराध नहीं लगा । अगर उसे पकड़ लेता तो उसकी जम के पिटाई होती , पुलिस अलग मारती और शायद वो दम ही तोड़ देता ।
पता नहीं , सही किया की गलत , लेकिन अफ़सोस नहीं हुआ । पता नहीं , अगर मेरा पर्स लेकर भागा होता तो , शायद पकड़ता , शायद नहीं पकड़ता । लेकिन शायद उसको लोगों से पिटने नहीं देता ।

Saturday, August 2, 2014

कुक्कुर

" बाऊ , आज त पेट भर खाए के मिली न " लखुआ बहुत खुश था । आज ठकुराने में एक शादी थी और लखुआ का पूरा परिवार पहुँच गया था । पूरा दुआर बिजली बत्ती से जगमग कर रहा था और चारो तरफ पकवानों की सुगंध फैली हुई थी ।
" दुर , दुर , अरे भगावा ए कुक्कुर के इहाँ से " , चच्चा चिल्लाये और दो तीन आदमी कुत्ते को भगाने दौड़ पड़े । लखुआ भी डर के किनारे दुबक गया । तब तक उन लोगों की नज़र पड़ गयी इन पर " ऐ , चल भाग इहाँ से , अबहीं त घराती , बराती खईहैं , बाद में एहर अईहा तू लोगन " । फिर याद आया कि  पत्तल भी तो उठवाना है इनसे तो बोले " अच्छा , जब लोग खाना खा लिहं , तब पतरी उठा के फेंक दिहा , अउर एकदम सफ़ाई से , गन्दा न रहे "।  अब लखुआ फिर से थोड़ा आगे बढ़ा तो बाप ने टोका " ढेर आगे मत जा , अबहीं टाइम हौ " ।
धीरे धीरे रात गहराने लगी , लखुआ के पेट में भूख से मरोड़ें पड़ रहीं थीं । खाना शुरू हुआ , बीच बीच में कुत्ते थोड़ा आगे बढ़ जाते और उनको भगाने वाले चिल्ला के भगा देते । अचानक एक कुत्ता एकदम से पंगत के बीच में पहुँच गया , और शोर मचा कि भगाओ इसे । गुस्से में एक आदमी ने लाठी उठाई और उसे भगाते हुए खींच के मारा । फिर एकदम से आवाज आई " अरे बाऊ " , और लखुआ सर पकड़ के गिर गया । लाठी सीधे उसके सर पे लगी थी और वो वहीँ पर ढेर हो गया । 

प्रतिबिम्ब--

अचानक सोनू लड़खड़ाया और दिव्य ने दौड़ कर पकड़ लिया उसे। इसी पार्क में तो उसने उँगलियाँ पकड़ कर चलना सिखाया था उसको। शाम को ऑफिस से लौटने के बाद रोज़ सोनू को ले आता था यहाँ। सोनू का भी खूब मन लगता था यहाँ और मंजरी को भी समय मिल जाता था खाना बनाने के लिए। धीरे धीरे सोनू शाम होते ही दरवाज़े के आसपास ही रहता था और किसी दिन देर हो जाती दिव्य को तो मंजरी को परेशान कर के रख देता।
दिव्य को तो याद भी नहीं अपने पिता की, बचपन में ही उनका साया उठ गया था उसके सर से। सोनू के साथ खेलकर वो महसूस करता कि शायद वो भी अपने पिता के साथ ऐसे ही खेलता। मंजरी कहती कि ये तो तुम्हारा प्रतिबिम्ब हो गया है अब, तो वो मुस्कुरा देता। और आज पार्क में अपनी ही तरह पीठ पर हाँथ बाँध के जब उसने दिव्य को चलते देखा तो उसे विश्वास हो गया कि वो उसका प्रतिबिम्ब ही है।