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Sunday, August 10, 2014

आज़ादी

" अस्सलाम वालेकुम चचा , कैसे हैं " |
"वालेकुम अस्सलाम , सब खैरियत है बेटा , अल्लाह का करम है " | " खैर बताओ , आज इधर का रास्ता कैसे भूल गए , कोई ख़ास वज़ह " |
" कुछ ख़ास नहीं चचा , बस १५ अगस्त नज़दीक आ रहा है तो सोचा कि आपसे मुलाक़ात कर लूँ "| " इस बार फिर आपको स्कूल के जलसे में आज़ादी के बारे में भाषण देना है , उम्मीद है कि आप इंक़ार नहीं करेंगे " |
" बरखुरदार , तुमने थोड़ी देर कर दी , अभी अभी इमाम साहब का न्यौता क़ुबूल कर के आ रहा हूँ " | " उन्होंने मदरसे में बुलवाया है उसी दिन , बहरहाल , तुम बैठो और कुछ जलपान वगैरह कर के जाओ " |
" नहीं चचा , किसी और दिन बैठेंगे , आज मुआफ़ कीजिये " , और वो वापस लौट गया |
चचा ने एक गहरी साँस ली और सोचने लगे कि आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने का इतना तो फ़ायदा है कि कम से कम साल में दो दिन तो लोग इज़्ज़त बख्श देते हैं | 

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