शाम गहराने लगी थी , सूरज लुकाछिपी खेल के अंधेरों में ग़ुम हो गया था । पंछी उड़ कर अपने अपने घोसलों में पहुँच गए थे । एक अजीब सा सन्नाटा , शान्ति तारी हो गयी थी चारो ओर । लेकिन उन दो दिलों को तो जैसे ये सन्नाटा ही सुकून के पल देता था , एक दूसरे की आँखों में आँखों डाले , बिना आवाज , घंटों बैठे रहते थे । वो शामें , नदी का किनारा , ठंडी हवा , ऐसा लगता कुदरत भी उनके मिलने का इंतज़ाम कर के खुश होती थी ।
लेकिन मौसम ने अंगड़ाई ली , शाम की शीतलता के बाद दिन में आग बरसाता सूरज आया , वैसे ही समाज की जलती निगाहें उनका पीछा करने लगीं । अब कोई जगह मुफ़ीद नहीं रही उनके मिलने के लिए , तो उन्होंने सोचा कि ख्वाबों में ही अब मिलते है । जी लेते हैं अपने उन पलों को , अपने तरीके से , वग़ैर किसी फ़िक्र के ।
आख़िरकार वही हुआ , अलग़ होना पड़ा उनको । ख्वाबों में भी बंदिशें लग गयीं । बादलों के बरसना भूलने से जैसे प्यासी धरती त्राहि माम करती है , वैसे ही उनकी जिंदगी में भी दरारें पड़ गयीं । वो अब भी आसमां की ओर टकटकी लगाये देखते हैं , कि कब होगी प्यार की बरसात और कब वो फिर भींग जायेंगे उसमे ।
लेकिन मौसम ने अंगड़ाई ली , शाम की शीतलता के बाद दिन में आग बरसाता सूरज आया , वैसे ही समाज की जलती निगाहें उनका पीछा करने लगीं । अब कोई जगह मुफ़ीद नहीं रही उनके मिलने के लिए , तो उन्होंने सोचा कि ख्वाबों में ही अब मिलते है । जी लेते हैं अपने उन पलों को , अपने तरीके से , वग़ैर किसी फ़िक्र के ।
आख़िरकार वही हुआ , अलग़ होना पड़ा उनको । ख्वाबों में भी बंदिशें लग गयीं । बादलों के बरसना भूलने से जैसे प्यासी धरती त्राहि माम करती है , वैसे ही उनकी जिंदगी में भी दरारें पड़ गयीं । वो अब भी आसमां की ओर टकटकी लगाये देखते हैं , कि कब होगी प्यार की बरसात और कब वो फिर भींग जायेंगे उसमे ।
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