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Tuesday, August 12, 2014

अलार्म--

टिर्र , टिर्र सुनकर चौंक कर उठ बैठा वो | ७ बज गए , ये बिना अलार्म के कमबख्त नींद ही नहीं खुलती , और ये अलार्म इतना कर्कश क्यों है | शायद हर जरुरी चीज़ कर्कश होती है , दवा की तरह | तुरंत उसने खिड़की के पर्दे हटाये , सामने के फ्लैट का किचेन दिख रहा था | उसकी निगाहें चारो तरफ़ किसी को तलाश रहीं थीं , लेकिन कोई नज़र नहीं आया |
पिछले कई हफ़्तों से यही चल रहा था , सुबह उठने के बाद सामने वाले फ्लैट की तरफ़ ही निगाह रहती | कभी कभी ही दीदार हो पाता पर ये सिलसिला जारी था | दिमाग हमेशा कहता कि उससे मिला जाये , बात किया जाये लेकिन दिल गवाही नहीं देता | इसी जद्दोजहत में दिन बीत रहे थे |
रात में उसने तंय किया कि अब पता लगाएंगे उसके बारे में ! समय से पहले तैयार होकर उसके फ्लैट के सामने खड़ा हो गया | दिल की धड़कन बढ़ गयी थी , क्या पूछेगा , कैसे पूछेगा , मन में यही सब चल रहा था | एक कार रुकी , एक आदमी उतरा और उस फ्लैट का बेल बजाने लगा | दरवाजा खुला , लड़की बाहर निकली , उसके हाथ में एक छड़ी थी | उस आदमी ने दरवाजा बंद किया और फिर उसका हाथ पकड़ कर कार में बैठा दिया | इतनी खूबसूरत , लेकिन वो खुद जहाँ की खूबसूरती नहीं देख सकती ! ये क्यों होना था ! प्रकृति इतनी बेरहम , निष्ठुर कैसे हो सकती है , तमाम प्रश्न कौंध रहे थे मन में !
फिर अचानक अलार्म बजा ,  और उसकी आँख खुल गयी |  

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