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Thursday, November 12, 2015

छुटकारा--

दीवाली आ रही थी और रधिया फिर चिंतित थी | वज़ह थी जुआ जो कहने के लिए तो सिर्फ एक सगुन था लेकिन उसके घर का तो सत्यानास हो जाता था | सुमेरवा दीवाली के तीन दिन पहिले से ही गायब हो जाता था जुआ के चक्कर में | दिन दिन भर खाने पीने की सुध भी नहीं रहती थी उसको | पहले तो बड़ी मुश्किल से खोज कर लाती थी उसको , लेकिन थोड़ी ही देर में फिर गायब हो जाता था | घर का सारा काम , सफाई और बच्चों की फ़रमाईश , सब उसके अकेले के सर पर आ जाता था | पिछली बार तो भरी महफ़िल में उसने उसका ताश ही फाड़ दिया था , बहुत हंगामा मचा था वहाँ | घर आके सुमेरवा ने खूब पीटा था उसको लेकिन इस साल फिर वही हाल | हाँ , इस बार सारे जुआरियों ने काफी सुरक्षित जगह ढूँढ ली थी जहाँ जल्दी कोई और न पहुँच सके |
ये जुआरी भी पता नहीं कैसे बिना खाए पिए लगे रहते हैं इसमें | एक एक रुपये का हिसाब रखते हैं खेल में और मज़ाल की कोई बेईमानी कर जाए | पत्ते देखने का ढंग तो बिलकुल निराला , इस तरह से देखते हैं कि कभी कभी आश्चर्य होता कि वो देख भी पाते हैं या नहीं | एक पट्टी तो खुली रहती है , दूसरी को बिलकुल ज़रा सा खोलना , इतना कि बस ये पता चले कि उसका रंग क्या है | फिर थोड़ा और खोलना जिससे पता चले कि ये है क्या , साथ में ये भी कि कोई और किसी भी हालत में देखने न पाये | अगर खुदा न खास्ता दो पत्ते बढ़िया निकल गए तो तीसरा इतनी देर में देखते हैं , मानो देर लगाने से तीसरा पत्ता बाकी दोनों के जैसा ही हो जाएगा | मजे की बात ये कि वैसे चाहे जितना पैसा उड़ा दें लेकिन जुए में जीता हुआ एक भी रुपया कोई ले ले . ऐसा हो ही नहीं सकता | जितने खेलने वाले , उतने ही देखने वाले भी और कई अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए कि कब कोई उठे और वो कब्ज़ा जमायें उसकी गद्दी पर | नींद , थकान सब गायब , बस एक ही धुन कि कैसे जीतें इसमें | ये सारे जुआरी साल के ३६० दिनों में एक आम इंसान की तरह ही वर्ताव करते हैं लेकिन इन तीन चार दिनों में एक अजीब सा बदलाव आ जाता है इनमें और ये सुपरमैन जैसे हो जाते हैं | 
आज फिर रात होते ही धीरे से निकल गया वो , रधिया को बाद में पता चला | सुबह कुछ पता नहीं था उसका , रधिया घर की सफाई में लग गयी | बच्चे भी पटाखे और मिठाईयों के लिए जिद करने लगे और वो उनको कल के लिए बहला रही थी | पैसे तो सारे सुमेरवा ले के चला गया था और उसको ढूँढना आसान नहीं था | चिंता में पड़ी थी कि कैसे करे दीवाली पर सारे इंतज़ाम , इतने में पड़ोस की रज्जो आ गयी | दोनों के दुःख साझा ही थे , दोनों घरों से मर्द गायब और सारा जिम्मा उनके सर | साथ बैठकर वो दोनों सोचने लगीं कि कैसे मनाई जाए दीवाली और कैसे मिले इस तकलीफ से छुटकारा | सोचते सोचते दोनों एक विचार पर पहुंची , इस बार किसी भी तरह से पता लगाया जाये इनके अड्डे का और उसे हमेशा के लिए ख़त्म किया जाए |
रज्जो ने जिम्मा लिया अड्डे का पता लगाने का और फिर उन्होंने तंय किया कि दोनों कुछ और औरतों को भी साथ लेंगी और फिर उस अड्डे पर छापेमारी करेंगी | शाम होते होते अड्डे का पता चल गया , क्योंकि कुछ मर्द जल्दी वापस आ जाते थे ताकि खा पीकर फिर जा सकें | अधिकांश महिलाएं इसके लिए सहमत हो गयीं और उन्होंने आपस में गुफ्तगू करके फैसला किया कि आज रात में ही सब वहाँ इकट्ठे चलेंगी और अपना ताश भी लेकर जाएँगी | अगर उन्होंने बंद नहीं किया तो वो सब भी वहीँ महफ़िल जमाएंगी और जब तक जुआ बंद नहीं होगा , वो सब भी जुआ खेलती रहेंगी |
रात में जब बच्चे सो गए तो रधिया और रज्जो के साथ महिला मण्डली निकल गयी अड्डे की ओर | गाँव से बाहर एक झोपडी में सब जुटे थे जुए में और खूब हो हल्ला मच रहा था | जितने लोग खेलने वाले , उतने ही देखने वाले भी थे और जो जीता उसके चेहरे पर वो विजयी मुस्कान खिल जाती थी , मानों उसे राज पाट मिल गया हो | अचानक महिलाओं को देखकर उनके चेहरे फक्क पड़ गए , लगभग सबके घर की महिलाएं आई हुई थीं | उनमे से कुछ लोगों ने तो अपनी बीबियों पर चिल्लाना शुरू कर दिया कि शायद वो सब चली जाएँ लेकिन कोई भी टस से मस नहीं हुई | अब एक ही चारा बचा था उनके सामने कि वो सब जुआ बंद करें और घर वापस चलें | जलती निगाहों से घूरते हुए सारे पुरुष उठे और घर की ओर चल पड़े | अब रधिया के कदम बड़े सुकून के साथ अपने घर की ओर चल पड़े , उसे पता था कि इस बार दिवाली पर उसे सब कुछ अकेले ही नहीं करना पड़ेगा और बच्चों के लिए पटाखे , मिठाई का इंतज़ाम भी हो जायेगा |   

लत--

दीवाली आ रही थी और रधिया फिर चिंतित थी | वज़ह थी जुआ जो कहने के लिए तो सिर्फ एक सगुन था लेकिन उसके घर का तो सत्यानास हो जाता था | सुमेरवा दीवाली के तीन दिन पहिले से ही गायब हो जाता था जुआ के चक्कर में | दिन दिन भर खाने पीने की सुध भी नहीं रहती थी उसको | पहले तो बड़ी मुश्किल से खोज कर लाती थी उसको , लेकिन थोड़ी ही देर में फिर गायब हो जाता था | घर का सारा काम , सफाई और बच्चों की फ़रमाईश , सब उसके अकेले के सर पर आ जाता था | पिछली बार तो भरी महफ़िल में उसने उसका ताश ही फाड़ दिया था , बहुत हंगामा मचा था वहाँ | घर आके सुमेरवा ने खूब पीटा था उसको लेकिन इस साल फिर वही हाल | हाँ , इस बार सारे जुआरियों ने काफी सुरक्षित जगह ढूँढ ली थी जहाँ जल्दी कोई और न पहुँच सके | 
ये जुआरी भी पता नहीं कैसे बिना खाए पिए लगे रहते हैं इसमें | एक एक रुपये का हिसाब रखते हैं खेल में और मज़ाल की कोई बेईमानी कर जाए | पत्ते देखने का ढंग तो बिलकुल निराला , इस तरह से देखते हैं कि कभी कभी आश्चर्य होता कि वो देख भी पाते हैं या नहीं | एक पट्टी तो खुली रहती है , दूसरी को बिलकुल ज़रा सा खोलना , इतना कि बस ये पता चले कि उसका रंग क्या है | फिर थोड़ा और खोलना जिससे पता चले कि ये है क्या , साथ में ये भी कि कोई और किसी भी हालत में देखने न पाये | अगर खुदा न खास्ता दो पत्ते बढ़िया निकल गए तो तीसरा इतनी देर में और इतनी चोरी से देखते हैं , गोया देर लगाने से तीसरा पत्ता बाकी दोनों के जैसा ही हो जाएगा | मजे की बात ये कि वैसे चाहे जितना पैसा उड़ा दें लेकिन जुए में जीता हुआ एक भी रुपया कोई ले ले . ऐसा हो ही नहीं सकता | जितने खेलने वाले , उतने ही देखने वाले भी और कई अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए कि कब कोई उठे और वो कब्ज़ा जमायें उसकी गद्दी पर | नींद , थकान सब गायब , बस एक ही धुन कि कैसे जीतें इसमें | ये सारे जुआरी साल के ३६० दिनों में एक आम इंसान की तरह ही वर्ताव करते हैं लेकिन इन तीन चार दिनों में एक अजीब सा बदलाव आ जाता है इनमें और ये सुपरमैन जैसे हो जाते हैं | 
रधिया इन्ही विचारों में डूब उतरा रही थी कि उसकी पड़ोसन रज्जो आ गयी | रज्जो और उसका सुख तो साझा था ही , दुःख भी साझा था | उसका पति भी जुए के चक्कर में गायब था और वो भी इसी उधेड़बुन में थी कि कैसे किया जाए त्यौहार का इंतज़ाम | जब कुछ समाधान नहीं सुझा तो उन्होंने तंय किया कि किसी भी तरह से जुए की जगह का पता लगाया जाए और एक बार फिर पत्तों को फाड़ा जाये | मुसीबत तो ऐसे भी है और वैसे भी , लेकिन कुछ तो करना होगा बच्चों के लिए | शाम होते होते जुआ के अड्डे का पता चल गया और दोनों ने वहां चलने का निर्णय कर लिया | बच्चों को भी साथ लेकर दोनों चल पड़ी कि शायद बच्चों के चलते वो लोग मान जाएँ | 
अड्डे पर जैसे ही वो दोनों पहुंचीं , सुमेरवा और रज्जो का आदमी दंग रह गए | बच्चों के चलते दोनों मज़बूरी में कुछ ज्यादा नहीं बोल पाये और बेमन से उठ कर चल दिए | रास्ते भर उन्होंने अपने परिवार को दिलासा दिया कि अब वो लोग नहीं खेलने जायेंगे और त्यौहार के लिए कुछ पैसे कमाने की जुगत करेंगे | रधिया के कदम तो जैसे जमीन पर ही नहीं पड़ रहे थे , इतनी आसानी से हो जायेगा सब , ये उसकी सोच से परे था | घर आकर खा पीकर दोनों सो गए |
सुबह मुंह अँधेरे ही रधिया की नींद खुली , सुमेरवा गायब था | पहले तो उसने सोचा कि दिशा मैदान गया होगा लेकिन थोड़ी ही देर में उसे यक़ीन हो गया कि फिर से सुमेरवा जुए के अड्डे पर पहुँच गया | वो दुःख और निराशा में अपने सर पर हाँथ रखकर बैठ गयी और उसकी आँखों से आंसू बह निकले | 

Sunday, November 8, 2015

बदहाली--

" दिवाली का स्वरुप बदल गया है अब , जहाँ देखो बिजली की झालरें और पटाखे । मिटटी के दिए तो अब कोई जलाना ही नहीं चाहता ", शर्माजी ने एक ठंडी साँस लेते हुए कहा और बाज़ार चल दिए । वो भी उनके साथ चल दिया , रास्ते में भी कुटीर उद्योगों के बेहतरी के बारे में ही बातें करते रहे दोनों और शर्माजी की चिंता ने उसे भी गहरे तक प्रभावित कर दिया था । 
" अरे कैसे दे रहे हो दिए ", अचानक उस बालक को दिए बेचते देखकर उसने पूछा और फिर जरुरत से कुछ ज्यादा ही दिए ले लिए उसने । अभी तक उसके जेहन में शर्माजी से हुई बातचीत ताज़ा थी । दिए लेकर वो मुड़ा तो शर्माजी नहीं थे वहां पर , वो सड़क के उस पार की दुकान से झालरें खरीद रहे थे । 
अब उसे कुटीर उद्योगों की बदहाली की वज़ह पता चल गयी थी ।

Friday, November 6, 2015

मंज़िल --

बदलेगी सूरत , जरा बदल के तो देखो
मंज़िल है क़रीब , साथ चल के तो देखो
क्या हुआ इस क़ौम को , कुछ खबर नहीं
जिन्दा है उम्मीद , पहल कर के तो देखो
कितने हैं मुआमले , और हर कोई मसरूफ़
मुश्किल नहीं है मगर , हल कर के तो देखो
बदलेगी सूरत , जरा बदल के तो देखो
मंज़िल है क़रीब , साथ चल के तो देखो !!

मोहब्बत--

बिगड़े हैं हालात अगरचे , फिर भी मुस्कुराते हैं
एक मोहब्बत का दीपक , आओ हम जलाते हैं
बना के हमको मोहरें , चाल चल रहे दूजे
वक़्त ने ली अब करवट , अदाकार बन जाते हैं
नफ़रत , हिंसा , ईर्ष्या , दिखतें हैं हर ओर
भाईचारा और प्यार का , इक बाजार बनाते हैं
बिगड़े हैं हालात अगरचे , फिर भी मुस्कुराते हैं
एक मोहब्बत का दीपक , आओ हम जलाते हैं !!

मुझ जैसा--

कहा था जो कभी , क्यूँ खो रहा है तू
अब देख मुझ जैसा ही , हो रहा है तू
दिखाता है अपने चेहरे पर खुशियाँ
पता है पर अन्दर से , रो रहा है तू
निकला था तनहा , तलाशने मंज़िल
अब जहाँ की भीड़ में , खो रहा है तू
कहा था जो कभी , क्यूँ खो रहा है तू
अब देख मुझ जैसा ही , हो रहा है तू !!

फ़िक्र--

फ़िक्र नहीं अगर ,जहाँ में खो जायेंगे
यादों में आपकी , हौले से सो जायेंगे
चाहा बहुत कि बदलूँ , वक़्त के साथ
अब यक़ीं हुआ है , आप से हो जायेंगे
छल फरेब भरा है , जहाँ नज़र डालिये
हम ज़मीं पे प्यार के , बीज बो जायेंगे
फ़िक्र नहीं अगर ,जहाँ में खो जायेंगे
यादों में आपकी , हौले से सो जायेंगे !!

सुकून--

बाखुदा सुकून तो , पाया होता
उनको गर न आजमाया होता
समझता रवायतें , ज़माने की
किसी अदीब ने समझाया होता
कहाँ सुलझे हैं , इश्क़ के मसले
जानते तो वक़्त न जाया होता
ताउम्र दिल का क्यूँ यक़ीन किया
वर्ना , धोखा तो न खाया होता
बाखुदा सुकून तो , पाया होता
उनको गर न आजमाया होता !!

नफरत--

गोया चेहरे पर नफरत , हजार रखिए,
जनाब दिल में पर , थोड़ा सा प्यार रखिए
मिल ही जाता है , तख्तो ताज़ जहाँ में
मुक़द्दर पर अपने , जरा ऐतबार रखिये
आसाँ नहीं है बहुत , दूरी बना के रखना
कभी अपनों के बीच , मत दीवार रखिये
करिए क्यूँ दुश्मनी , निभाइये बस दोस्ती
आस्तीन में कभी , मत तलवार रखिये
गोया चेहरे पर नफरत , हजार रखिए,
जनाब दिल में पर , थोड़ा प्यार रखिए !!

ठोकरें--

मिली ठोकरें बहुत , पर शिक़ायत नहीं की
दूर होते गए सब , पर शिक़ायत नहीं की
लगाये थे जिंदगी में , दरख़्त बहुत से
तरसे छाँव को बहुत , पर शिक़ायत नहीं की
जिससे भी मिले हम , बस खोल दिया दिल
रिसते हैं सभी जख़्म , पर शिक़ायत नहीं की
अहज़ान के गहरे अब्र , छाये थे उम्र भर
किया सिर्फ़ हमने अत्फ़ , पर शिक़ायत नहीं की
मिली ठोकरें बहुत , पर शिक़ायत नहीं की
दूर होते गए सब , पर शिक़ायत नहीं की !!

आबाद--

हैं बहुत आबाद , लेकिन खाक़ होते जायेंगे
खुश रहेंगे हम , यक़ीनन लोग रोते जायेंगे
क्या कहें दस्तूर अज़ब है , ज़माने का
जितना चाहे आप जोड़ो , लोग खोते जायेंगे
लाख चाहें वो सुकूँ , अज़ाब पाएंगे यहाँ
राह में अहज़ान के जो बीज बोते जायेंगे
बेख़याली में भी जिनको भूल ना पाये कभी
अश्क़ से वो आज दामन को भिगोते जायेंगे
हैं बहुत आबाद , लेकिन खाक़ होते जायेंगे
खुश रहेंगे हम , यक़ीनन लोग रोते जायेंगे !!

जिंदगी--

हुआ दर्द , फिर भी भुलाते रहे 
युहीं जिंदगी , हम बिताते रहे 
भर आई थीं आँखें , हमारी मगर 
ये सरगम उन्हें हम , सुनाते रहे 
नहीं रक्खी अपनों ने रिश्तों की लाज 
हम उनको ही दिल से , निभाते रहे
पलट के भी देखा नहीं उम्र भर
बड़े प्यार से हम , बुलाते रहे
थे हम बेतक़ल्लुफ़ जहाँ जाम से
वहीँ वो नज़र से , पिलाते रहे
वो दावे कि थामेंगे दामन कभी
ये ऐतबार अश्कों में , गिराते रहे
हुआ दर्द , फिर भी भुलाते रहे
युहीं जिंदगी , हम बिताते रहे !!

सलीक़ा--

वो जो ग़म में , मुस्कुराते हैं 
जीने का सलीक़ा , सिखाते हैं
ख़ामोश झेलते हैं , हरेक तूफां 
कश्तियाँ फिर भी पार लगाते हैं
लाते हैं मुस्कानें जो चेहरों पे 
ज़िन्दगी में सुकूं , वही पाते हैं
लाख़ बेदर्द है जहाँ , फ़िर भी
इश्क़ के फ़ूल , खिलखिलाते हैं
वो जो ग़म में , मुस्कुराते हैं
जीने का सलीक़ा , सिखाते हैं !!

इंसान--

अगर दुनियाँ में बस इंसान होता
घरों में गीता ,और क़ुरआन होता
भुला देते वो गर , नफ़रत दिलों से
उनका जीना भी कुछ आसान होता
अगर वो मान लेते दोस्त हमको
यक़ीनन बस यही एहसान होता
अगर दुनियाँ में बस इंसान होता
घरों में गीता ,और क़ुरआन होता !!

बेटी--

माँ की ही गोद का एहसास दिलाती है
बेटी मुझे आजकल कुछ ऐसे सुलाती है
कल तक हम समझे , कि है वो छोटी
आज कहकर बेटा, मुझको खिलाती है
वज़ह थी जीने की , जब थी वो बच्ची
आज अपने प्यार से हमको जिलाती है
थी पहचान उसकी , कभी नाम से मेरे
दुनियां हमें उसके ही नाम से बुलाती है
माँ की ही गोद का एहसास दिलाती है
बेटी मुझे आजकल कुछ ऐसे सुलाती है !!

कूड़ा--

बजबजाते कूड़े का ढेर 
साफ़ करने के बाद 
पीठ टिकाता है वो
ओर सोचता है 
हो गया सब कुछ साफ़ 
पर ,क्या हो पायेगा साफ़
सदियों पुराना कूड़ा
जो भरा है
इंसान के मन में
क्या मान सकेगा
इंसान सब को बराबर
जरुरत तो है
मन को साफ़ करने की
कभी तो ऐसा होगा
फिर जरुरत नहीं रहेगी
उसकी इस समाज में !!

बोझ-

" अाप को क्या लगा कि मैं अाप को छोड़ दूँगा । अाप के गुनाहों का हिसाब अब अदालत में होगा, गिरफ्तार करो इनको "।
सुनते ही चेहरे पर हवाईयाँ छाने लगीं, अब तो बचना मुश्किल है | आखिर में बचने के लिए आखिरी हथियार भी इस्तेमाल कर दिया " तुम भूल रहे हो कि हम दोनों हम मज़हब हैं और ये काम हम ख़ुदा के लिए ही कर रहे हैं | क्या जवाब दोगे ख़ुदा को "।
" अाप जैसे लोगों की वजह से ही हमें दोहरी कीमत चुकानी पड़ रही है समाज में , पूरी कौम ही शक के घेरे में रहती है "।
गाड़ी स्टार्ट हुई अौर वो बढ़ गया अपने अाफिस की तरफ । एक सुकून था उसके चेहरे पर , मन का कुछ बोझ हल्का हो गया था ।

क़ुर्बानी--

पिछली दो रातों से अक़ील भाई की नींद गायब थी , त्यौहार सर पे था और वो फैसला नहीं कर पा रहे थे | इसी त्यौहार के दिन चार साल पहले उनके घर, तमाम मन्नतों के बाद बेटा पैदा हुआ था | चार बेटियों के बाद हुआ था इसलिए वो घरभर में सबको जान से प्यारा था | उसकी हर किलकारी पर सब लोग क़ुर्बान हो जाते थे और घर उसकी शैतानियों से गुलज़ार रहता था | 
पिछले साल इसी त्यौहार के आस पास उनकी बकरी ने भी एक बकरा जना था और वो भी उनके बेटे के साथ साथ बड़ा हो रहा था | दोनों इतना घुल मिल गए थे कि कभी कभी तो दोनों एक साथ ही सो भी जाते थे | पूरे घर में दोनों की धमाचौकड़ी मची रहती थी और ऐसा लगता था जैसे दोनों एक दूसरे की हर बात समझ जाते हों | वो बकरा भी मानों घर का ही सदस्य हो गया था |
जब तीन दिन पहले बातों बातों में ही उनके चचाजान ने जब कहा कि त्यौहार आ रहा है और इस बार क़ुर्बानी के लिए बकरा तो घर में ही मौजूद है तो पहली बार अक़ील भाई को झटका लगा | हर साल तो क़ुर्बानी देने के लिए बकरा ले आते थे और फिर जम के दावत मनाई जाती थी | सभी दोस्त और रिश्तेदारों को निमंत्रण भेज देते थे और लोग भी खाने के बाद तारीफ करते हुए जाते थे | लेकिन इस बार जैसे ही क़ुर्बानी की बात आई , उनको सदमा सा लगा | अपने इस बकरे को कैसे जिबह किया जायेगा , सोच कर ही उनका कलेजा मुँह को आ रहा था | कभी अगर उनके बेटे को खरोंच भी आ जाती तो उनकी आँखों में आंसू आ जाते थे और अब तो वो बकरा भी उनको अपने बेटे के समान लगने लगा था |
क़ुरआन मज़ीद को एक बार फिर से याद किया उन्होंने और सोच में पड़ गए | क़ुरबानी तो किसी अज़ीज़ की ही करनी चाहिए और यह प्राणी तो बीते साल में बेटे जैसा ही हो गया था उनके लिए , फिर क्या करें | लेकिन क्या वो अपने बेटे जैसे अज़ीज़ प्राणी की क़ुर्बानी दे सकते हैं | बहुत सोचा उन्होंने , फिर हिम्मत ने जवाब दे दिया | मन ही मन उन्होंने अपने गुनाहों की माफ़ी मांगी और क़ुर्बानी नहीं करने का इरादा करके ऑंखें बंद कर ली |

मंज़िल-

" में , में " की आवाज़ से उसका ध्यान सड़क पर गया । एक ठेले पर कई सारे बकरे , बकरियाँ लद कर जा रहे थे । उन्हें शायद आभास भी नहीं होगा , या शायद हो भी कि उनकी मंज़िल कहाँ है । 
ये देखकर उसके दिमाग में बड़े भाई के शब्द गूंजने लगे " पिताजी के बाद मैं ही हूँ , तुम्हारा भला सोचना मेरा काम है । पढ़ाई तक तो ठीक है लेकिन शादी तो उसी घर में होगी जहाँ मैंने सोचा है "। 
उसे भी अपनी मंज़िल का आभास नहीं था ।

व्यवसाय--

" इतना ज्यादा टर्नओवर है लेकिन मुनाफा तो बिलकुल भी नहीं होता आपको , कैसे चलाते हैं ये व्यवसाय आप "| कुटिल मुस्कराहट चेहरे पर बिखेरते हुए टैक्स इंस्पेक्टर ने कहा |
" आपको तो पता ही है कितना मुश्किल हो गया है व्यवसाय करना | लेबर , ट्रांसपोर्ट , बिजली , वेतन इत्यादि के बाद बचता ही कितना है , फिर ऊपर से टैक्स की दर भी कितना ज्यादा है ", जवाबी मुस्कराहट देते हुए उसने कहा | 
" ठीक है , फिर अपने रजिस्टर इत्यादि दिखा दीजिये हमें "| 
" पिछले साहब ने इतने लिए थे ", एक चिट पर कुछ लिख कर दिखाते हुए उसने कहा |
" आप को पता है न कि हम आपको रिश्वत देने के जुर्म में गिरफ्तार करवा सकते हैं | रजिस्टर मंगवाईए अपने ", इंस्पेक्टर की आवाज़ थोड़ी कड़क हो गयी|
" ठीक है , इस बार बढ़ा कर इतना कर देते हैं | चलिए थोड़ा नाश्ता हो जाए ", कनपटी पर चू आये पसीने को पोंछते हुए उन्होंने कहा |
" हम लोग भी समझते हैं , कितना मुश्किल है ईमानदारी से व्यवसाय करना | लेकिन अपने पेपर्स ठीक रखा कीजिये ", इंस्पेक्टर ने उनको समझाया और लिफ़ाफ़ा जेब में रख कर निकल गया |

प्रायश्चित--

पंडितजी आ गए थे, पूजा की तैयारी भी लगभग हो चुकी थी| विभिन्न तरह के पकवान सजा के रखे हुए थे और इन्ही से भोग लगना था पित्तरों को| सारा कार्यक्रम उन दोनों को ही करना था, बेटे ने आने से साफ़ इंकार कर दिया था| सास और ससुर की तस्वीर पर माला चढ़ा कर रत्ना ने पीछे देखा, रवि का पता नहीं था| उसने उनको पूरे घर में ढूँढ लिया, कहीं दिखाई नहीं पड़े| पंडितजी भी आवाज़ लगा रहे थे पूजा के लिए| 
अचानक उसे पीछे नौकरों के कमरे से रवि की आवाज़ आती सुनाई दी| उत्सुकता और झुँझलाहट दोनों हावी हो चुके थे उसपर, वो लपक कर उसी ओर बढ़ी| जैसे ही उसने अंदर प्रवेश किया, उसके कदम एकदम से जड़ हो गए| रवि बड़े प्रेम से नौकर के बूढ़े पिता को आग्रह करके घर में बने सारे पकवान खिला रहे थे| 
धीरे से उसने भी अपने हाँथ से एक मिठाई बुज़ुर्ग को खिला दी| उसके आँख से भी आंसू टपक गए, बहते हुए आंसू उनके पुराने कृत्यों का प्रायश्चित कर रहे थे|

समझ--

सुबह अखबार पढ़कर उसका खून खौल उठा | ये विधर्मी हमारे धर्म का सत्यनाश करने पर तुले हुए हैं , इनको सबक सिखाना जरुरी है | जिसे हम लोग माँ समान मानते हैं उसी की हत्या करना , अब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता | लगातार इन्ही विचारों का मंथन चल रहा था उसके दिमाग में | 
" बेटा, मेरी आँख से बहुत कम दिखने लगा है आजकल , किसी डॉक्टर को दिखा लेते ", माँ की आवाज़ ने उसको जैसे ज़मीन पर ला पटका | पिछले कई हफ्ते से वो अपनी आँख के लिए कह रही थी और वो टालता जा रहा था | अचानक उसे अपने ऊपर शर्मिंदगी महसूस होने लगी कि ये क्या सोचने लगा है वो | 
" माँ , चलो तुमको आँख के डॉक्टर को दिखा देता हूँ | और आते समय एक बढ़िया सी साड़ी भी खरीद लेना अपने लिए ", कहते हुए वो उठ खड़ा हुआ | माँ ने उसकी ऑंखें खोल दी थीं , उसे इंसान और जानवर में फ़र्क़ समझ आ गया |

गौ सेवक--

बहुत मनोरम था सब कुछ उस गौशाले में । एक से बढ़कर एक नस्ल की गायें थीं वहाँ पर और उनके रहने और खाने का सुन्दर स्थल । पुरे जिले में कोई ऐसी गौशाला नहीं थी और उसके मालिक की बहुत प्रतिष्ठा थी । जिसे देखो वही उनके धर्मपरायणता के गुणगान करता रहता था । 
आज वो भी देखने चला आया था इसे । उसे भी विश्वास होने लगा था लोगों की बातों पर कि इसके मालिक जैसा गौसेवक और धर्मात्मा शायद ही कोई और होगा इस जिले में । जगह जगह हरा चारा रखा हुआ था , बहुत से लोग उसे काटने में व्यस्त थे | गायों के रहने के स्थान से थोड़ी दूरी पर खेत भी थे जहाँ पर फसलें लहलहा रही थीं | पूछने पर पता चला कि ये ऑर्गनिक फसल है जिसे गाय के गोबर और उनके मूत्र के इस्तेमाल से उगाया जाता है और इनकी बहुत माँग है आजकल | पूरे गौशाले का चक्कर लगाने में उसे काफी समय लग गया और फिर वो उनके कमरे में पहुंचा । लेकिन पूरा गौशाला देखने के बाद उसके दिमाग में एक बात खटक रही थी , उसे बड़ी मुश्किल से एकाध ही , मरियल सा बछवा दिखा और बूढ़ी गायें तो बिलकुल नहीं थीं । अधिकांश बछिया ही थीं वहां पर और वो सोच में पड़ गया था कि ऐसा कैसे हो सकता है कि यहाँ की गायें सिर्फ बछिया ही जनती हों और गायें बूढ़ी होने के बाद कहाँ चली जाती हैं ।
" नमस्कार , आप बहुत ही बड़े पुण्यात्मा हैं , गऊ माता की सेवा में तन मन धन से समर्पित हैं आप । आप जैसे लोगों से ही तो अपना धर्म सुरक्षित है वर्ना तो आजकल तो लोग सिर्फ अपना आर्थिक लाभ ही देखते हैं "।
" नमस्कार , बस आप सब लोगों का आशीर्वाद है । वैसे भी गऊ माता की सेवा में ही स्वर्ग है ", मुस्कुराते हुए उन्होंने बैठने के लिए कहा ।
" अच्छा , एक बात पूछना चाह रहा था । आपकी गौशाला में मुझे न तो बछवा नहीं दिखे , नहीं कोई बूढ़ी गाय , ऐसा कैसे संभव है "।
सवाल सुनकर तो एक बार वो चौंके , फिर उनके चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कराहट फ़ैल गयी । " दरअसल आपका सोचना सही है , यहाँ सिर्फ बछिया ही नहीं पैदा होती हैं , बछवा भी पैदा होते हैं । लेकिन उनका कोई उपयोग तो है नहीं तो कौन उनको पाले और उनपर खर्च करे । बस उनको हम लोग खाना पीना नहीं देते हैं और वो कुछ ही दिन बाद काल कलवित हो जाते हैं | और बूढ़ी गायों को तो हम लोगों को दान दे देते हैं जिससे उनको भी गौ पालन का सुख मिल जाए "|
ये सब बताते हुए उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी और उसे लग रहा था जैसे उसके सामने दूध का नहीं बल्कि खून का ग्लास रखा हो ।

नव जीवन--

आज इतिहास फिर अपने को दुहरा रहा था| जैसे ही बहू ने घबराते हुए बताया कि उसका बेटा नज़मा से शादी करना चाहता है, उनकी आँखों में २५ साल पहले का दृश्य घूम गया|
उस सुबह को भूलना उनके लिए आज भी संभव नहीं था जब उनका बेटा शहर से अपने साथ एक विजातीय लड़की को लेकर आया था| बहुत स्पष्ट शब्दों में उसने कहा था " बाबूजी , मुझे पता है कि ये शादी आप स्वीकार नहीं करेंगे, इसलिए हमने कोर्ट में शादी कर ली है और आपका आशीर्वाद लेने आये हैं "|
अंगारे बरसाती आँखों से उन्होंने उसकी तरफ देखा था और घर छोड़ देने का हुक्म सुना दिया था| दोनों वापस चले गए और इस सदमे से उनकी पत्नी ने बिस्तर पकड़ लिया|
कुछ ही सालों में उन्होंने अपनी पत्नी और बेटे दोनों को खो दिया और फिर बहू को पोते की वज़ह से अपने गाँव ले आये| समय के साथ अपने अंदर होते बदलाव को वो महसूस तो कर रहे थे लेकिन मन खुल कर मानने को तैयार नहीं था| आज की घटना ने उन्हें एक बार फिर आत्ममंथन पर मज़बूर कर दिया था| बेटे के बाद पोते को भी खोना, आगे नहीं सोच पाये|
" बहू, शादी की तैयारी शुरू कर दो, आखिर अपने घर में बहुत सालों बाद ऐसा अवसर आ रहा है "|
बहू ने उनकी तरफ आश्चर्य से देखा, वो अपना चेहरा दूसरी तरफ कर चुके थे|

आवाजें--

" इस लड़की को आप नहीं रख सकते कॉलेज में , हमारे बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा ", अभिभावकों की भीड़ इकठ्ठा हो गयी थी कॉलेज के गेट पर और आवाज़ें बढ़ने लगी थीं । पिछले महीने ही कुछ दरिंदों ने उसकी अस्मत लूट ली थी और उस समय पूरा कॉलेज प्रशासन उसको निकालने के पक्ष में था लेकिन प्रिंसिपल अडिग थे अपने फैसले पर । 
" अगर यही हादसा आपके बच्ची के साथ हुआ होता तो भी आपलोग यही कहते । इस हादसे में उसका क्या कसूर था , यही न कि वो अपनी रक्षा खुद करने में असमर्थ थी । आप लोग देखना चाहेंगे कि वो क्या कर रही है यहाँ ", कहकर वो खेल के मैदान की तरफ चल पड़े । 
मैदान का दृश्य देखकर सबकी ऑंखें फटी रह गयी । वही लड़की जो कभी खुद की रक्षा नहीं कर पायी थी , आज बाकी लड़कियों को आत्मरक्षा का पाठ पढ़ा रही थी । एक बार फिर से आवाजें शुरू हो गयी थीं , लोगों की तालियों की ।

मज़बूत रिश्ते--

" आज हमारे घर आपकी दावत है भाईजान, शाम को इन्तज़ार करूँगा आपका ", इतना कहकर उसने फोन रख दिया और पत्नी से शाम की दावत के बारे में बात करके ऑफिस जाने की तैयारी करने लगा। आज वो पत्नी की उस शंका को गलत साबित करना चाहता था कि भाईजान उसके यहाँ खाना नहीं खाएँगे। धर्म अलग है तो क्या, उसने तो कितनी ही बार खाया है उनके यहाँ।
थोड़ी देर में फोन की घण्टी बजी, उधर से भाईजान थे।
" दर असल आज आपकी भाभी ने पहले से ही कहीं का कार्यक्रम बना रखा था, इसलिए आज तो नहीं आ पाएंगे, किसी और दिन जरूर आएंगे "।
" मैंने कहा था ना कि वो नहीं आएंगे, अब तो भरोसा हो गया मेरी बात का ", पत्नी का चेहरा उसका यक़ीन पुख्ता करता लग रहा था। वो सोच में पड़ गया, अब उसका भी भरोसा डगमगाने लगा था। भारी मन से वो ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगा।
एक बार फिर घण्टी बजी, इस बार भाभी थीं " हम लोग जरूर आएंगे शाम को, अभी आपके भाईजान ने मुझे बताया तो मैंने शाम का कार्यक्रम रद्द कर दिया। आप के यहाँ आने से जरुरी कोई भी कार्यक्रम नहीं है"।
उसने एक बार फिर पत्नी की तरफ़ देखा, पत्नी को रिश्तों की मज़बूती पर यक़ीन हो गया था।

जिन्दगी की शतरंज--

जिन्दगी की शतरंज--
सुबह तड़के उठकर वो घर से निकल गया , पत्नी और बच्ची सोये हुए थे। शहर में फैले तनाव की वज़ह से कल उसे कोई काम नहीं मिल पाया था और कल रात में जो बचा खुचा खाने का सामान था वो ख़त्म हो गया था। जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए वो आज सबसे पहले पहुँच जाना चाहता था ताकि आज तो काम मिल जाए और रात को परिवार को खाना खिला पाये। चुनावी पोस्टरों से अटी पड़ी सड़कें और गलियाँ उन जैसों के विकास की ही बात कर रही थी।
अब उजाला फ़ैल गया था और वो मज़दूर मंडी में सबसे पहले पहुँच गया था। अब इंतज़ार था तो ठेकेदारों का जो आकर ले जाएँ काम पर। ठेकेदार तो आये लेकिन वो कर्म के नहीं, धर्म के थे और कुछ ही देर में पुलिस की गाड़ियाँ सायरन बजाते घूमने लगीं। दंगे फ़ैल गए और कर्फ्यू का आदेश जारी हो गया था। घबराहट में वो भागा और गोलियों से बचते बचाते अपने घर सामने पहुँचा।
सामने जलते हुए अपने घर को देखकर वो गश खाकर गिर पड़ा। जिन्दगी की शतरंज ने शह और मात दोनों दे दी थी।

गिरगिट--

" अरे देखो तो , वो बुढ़िया के बाल बेचने वाला गिरा पड़ा है । चलकर पूछ लेते है कि क्या हुआ है "। 
" बिना बात के पचड़े में क्यूँ फँसना , कहीं मर वर गया होगा तो मुसीबत में फँस जायेंगे ", पत्नी को झिड़कते हुए राजू ने बाइक आगे बढ़ा दी ।। 
अपने ही मोहल्ले का लड़का था वो , जब भी घर की तरफ से निकलता था , बच्चे को यूँ ही पकड़ा देता था एक पैकेट । पैसे मिले या न मिले , हँसते हुए आगे बढ़ जाता । जब भी पैसे नहीं देने होते , अपने ही घर का बना देता था उसे राजू । वो भी उसे बहुत मानती थी और कभी कभी खाने पीने को कुछ दे देती थी । आज उसको यूँ छोड़ के आगे चल देना उसे दिल में कचोट रहा था । 
अचानक राजू ने बाइक रोकी और उसकी निगाह सड़क के किनारे वाले पेड़ पर बैठे गिरगिट पर चली गयी । उसे अपने पति के पीठ का रंग भी बदलता महसूस हो रहा था ।

हल--

सबके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ़ साफ़ दिख रही थी , चुनाव एकदम सर पर थे और कोई ठोस मुद्दा नहीं मिल रहा था उन लोगों को । कई प्रस्ताव दिए वहाँ मौजूद लोगों ने लेकिन सब सिरे से खारिज़ कर दिया रज्जब मियाँ ने । 
" काश , थोड़ा माहौल बिगाड़ पाते हम लोग तो हमारे पक्ष में लहर होती लेकिन अपने ही मोहल्ले के चचाजान सारा खेल ख़राब कर दे रहे हैं । अब उनको कौन समझाए की आज भाई चारा का समय नहीं रहा ", रज़्ज़ब मियाँ खौल रहे थे । 
" तो फिर क्या किया जाये , उनको समझाना तो नामुमकिन सी बात है । कुछ और सोचना होगा हमें "।
" समझा नहीं सकते तो क्या , खामोश तो कर सकते हैं न । और उनके शरीर को उन लोगों के इलाके में डाल देना , एक तीर से दो शिकार हो जायेंगे "।
अचानक वहाँ मौज़ूद लोगों के चेहरे तनावमुक्त नज़र आने लगे ।

पछतावा--

राज रोज ख़बरें आ रही थीं , फलाँ , फलाँ ने फलाँ पुरस्कार लौटाया और उसके बाद अखबार और टी वी पर उनकी फोटो और गर्मागर्म चर्चा | उनमें से कई लोगों का तो उन्होंने नाम भी नहीं सुना था , अब पता चला उनको कि इनको भी फलाँ पुरस्कार मिला था | चच्चा सोच रहे थे कि काश हमें भी मिला होता तो आज हम भी ! 
अचानक उनको याद आया और जल्दी जल्दी अलमारी खंगालने लगे कि इतने में चाची आ गयीं | 
" क्या ढूँढ रहे हो अलमारी में आज , कुछ हेरा गया है का ?
" अरे तुम नहीं समझोगी , एक ठो सर्टिफिकेट था पहले का , वही ढूँढ रहे थे | पता नहीं कहाँ चला गया "|
" अबहीं कुछ दिन पहिले ही कुछ रद्दी कबाड़ी को बेचा था इसमें से निकाल कर , कहीं उसी में तो नहीं चला गया ?
" रहोगी गँवार की गँवार ही , बिना पूछे काहें बेच दिया कबाड़ी को ", और चच्चा बिगड़ते हुए कबाड़ी के दुकान की ओर भागे |
" अरे सजीवन , हमरे घर से कुछ कबाड़ी लाये थे का ? चच्चा के सवाल पर सजीवन ने सर उठाया और थोड़ा सोच कर हाँ में सर हिला दिया |
" कहाँ रक्खे हो उसको , एक ठो बहुत जरुरी सर्टिफिकेट था उसमें | जरा खोज देते तो बहुत मेहरबानी होती ", चच्चा गिड़गिड़ाने लगे |
" देखो चच्चा , इहाँ जो कुछ आता है उ सब कहीं भी फेंका जाता है और फिर ट्रक में लाद कर बाहर भेज दिया जाता है | अब कहाँ ढूँढ पाएंगे उसको , वैसे था क्या उसमें चच्चा ?
चच्चा बिना जवाब दिए वापस चल दिए | कैसे बताते कि बाकी लोगों की तरह उनके मन में भी उस सर्टिफिकेट को वापस करके मशहूर होने की चाहत हिलोरें मार रही थी जो कभी उनको कविता पाठ के लिए मिला था |