पिछली दो रातों से अक़ील भाई की नींद गायब थी , त्यौहार सर पे था और वो फैसला नहीं कर पा रहे थे | इसी त्यौहार के दिन चार साल पहले उनके घर, तमाम मन्नतों के बाद बेटा पैदा हुआ था | चार बेटियों के बाद हुआ था इसलिए वो घरभर में सबको जान से प्यारा था | उसकी हर किलकारी पर सब लोग क़ुर्बान हो जाते थे और घर उसकी शैतानियों से गुलज़ार रहता था |
पिछले साल इसी त्यौहार के आस पास उनकी बकरी ने भी एक बकरा जना था और वो भी उनके बेटे के साथ साथ बड़ा हो रहा था | दोनों इतना घुल मिल गए थे कि कभी कभी तो दोनों एक साथ ही सो भी जाते थे | पूरे घर में दोनों की धमाचौकड़ी मची रहती थी और ऐसा लगता था जैसे दोनों एक दूसरे की हर बात समझ जाते हों | वो बकरा भी मानों घर का ही सदस्य हो गया था |
जब तीन दिन पहले बातों बातों में ही उनके चचाजान ने जब कहा कि त्यौहार आ रहा है और इस बार क़ुर्बानी के लिए बकरा तो घर में ही मौजूद है तो पहली बार अक़ील भाई को झटका लगा | हर साल तो क़ुर्बानी देने के लिए बकरा ले आते थे और फिर जम के दावत मनाई जाती थी | सभी दोस्त और रिश्तेदारों को निमंत्रण भेज देते थे और लोग भी खाने के बाद तारीफ करते हुए जाते थे | लेकिन इस बार जैसे ही क़ुर्बानी की बात आई , उनको सदमा सा लगा | अपने इस बकरे को कैसे जिबह किया जायेगा , सोच कर ही उनका कलेजा मुँह को आ रहा था | कभी अगर उनके बेटे को खरोंच भी आ जाती तो उनकी आँखों में आंसू आ जाते थे और अब तो वो बकरा भी उनको अपने बेटे के समान लगने लगा था |
क़ुरआन मज़ीद को एक बार फिर से याद किया उन्होंने और सोच में पड़ गए | क़ुरबानी तो किसी अज़ीज़ की ही करनी चाहिए और यह प्राणी तो बीते साल में बेटे जैसा ही हो गया था उनके लिए , फिर क्या करें | लेकिन क्या वो अपने बेटे जैसे अज़ीज़ प्राणी की क़ुर्बानी दे सकते हैं | बहुत सोचा उन्होंने , फिर हिम्मत ने जवाब दे दिया | मन ही मन उन्होंने अपने गुनाहों की माफ़ी मांगी और क़ुर्बानी नहीं करने का इरादा करके ऑंखें बंद कर ली |
पिछले साल इसी त्यौहार के आस पास उनकी बकरी ने भी एक बकरा जना था और वो भी उनके बेटे के साथ साथ बड़ा हो रहा था | दोनों इतना घुल मिल गए थे कि कभी कभी तो दोनों एक साथ ही सो भी जाते थे | पूरे घर में दोनों की धमाचौकड़ी मची रहती थी और ऐसा लगता था जैसे दोनों एक दूसरे की हर बात समझ जाते हों | वो बकरा भी मानों घर का ही सदस्य हो गया था |
जब तीन दिन पहले बातों बातों में ही उनके चचाजान ने जब कहा कि त्यौहार आ रहा है और इस बार क़ुर्बानी के लिए बकरा तो घर में ही मौजूद है तो पहली बार अक़ील भाई को झटका लगा | हर साल तो क़ुर्बानी देने के लिए बकरा ले आते थे और फिर जम के दावत मनाई जाती थी | सभी दोस्त और रिश्तेदारों को निमंत्रण भेज देते थे और लोग भी खाने के बाद तारीफ करते हुए जाते थे | लेकिन इस बार जैसे ही क़ुर्बानी की बात आई , उनको सदमा सा लगा | अपने इस बकरे को कैसे जिबह किया जायेगा , सोच कर ही उनका कलेजा मुँह को आ रहा था | कभी अगर उनके बेटे को खरोंच भी आ जाती तो उनकी आँखों में आंसू आ जाते थे और अब तो वो बकरा भी उनको अपने बेटे के समान लगने लगा था |
क़ुरआन मज़ीद को एक बार फिर से याद किया उन्होंने और सोच में पड़ गए | क़ुरबानी तो किसी अज़ीज़ की ही करनी चाहिए और यह प्राणी तो बीते साल में बेटे जैसा ही हो गया था उनके लिए , फिर क्या करें | लेकिन क्या वो अपने बेटे जैसे अज़ीज़ प्राणी की क़ुर्बानी दे सकते हैं | बहुत सोचा उन्होंने , फिर हिम्मत ने जवाब दे दिया | मन ही मन उन्होंने अपने गुनाहों की माफ़ी मांगी और क़ुर्बानी नहीं करने का इरादा करके ऑंखें बंद कर ली |
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