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Friday, November 6, 2015

मंज़िल-

" में , में " की आवाज़ से उसका ध्यान सड़क पर गया । एक ठेले पर कई सारे बकरे , बकरियाँ लद कर जा रहे थे । उन्हें शायद आभास भी नहीं होगा , या शायद हो भी कि उनकी मंज़िल कहाँ है । 
ये देखकर उसके दिमाग में बड़े भाई के शब्द गूंजने लगे " पिताजी के बाद मैं ही हूँ , तुम्हारा भला सोचना मेरा काम है । पढ़ाई तक तो ठीक है लेकिन शादी तो उसी घर में होगी जहाँ मैंने सोचा है "। 
उसे भी अपनी मंज़िल का आभास नहीं था ।

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