दीवाली आ रही थी और रधिया फिर चिंतित थी | वज़ह थी जुआ जो कहने के लिए तो सिर्फ एक सगुन था लेकिन उसके घर का तो सत्यानास हो जाता था | सुमेरवा दीवाली के तीन दिन पहिले से ही गायब हो जाता था जुआ के चक्कर में | दिन दिन भर खाने पीने की सुध भी नहीं रहती थी उसको | पहले तो बड़ी मुश्किल से खोज कर लाती थी उसको , लेकिन थोड़ी ही देर में फिर गायब हो जाता था | घर का सारा काम , सफाई और बच्चों की फ़रमाईश , सब उसके अकेले के सर पर आ जाता था | पिछली बार तो भरी महफ़िल में उसने उसका ताश ही फाड़ दिया था , बहुत हंगामा मचा था वहाँ | घर आके सुमेरवा ने खूब पीटा था उसको लेकिन इस साल फिर वही हाल | हाँ , इस बार सारे जुआरियों ने काफी सुरक्षित जगह ढूँढ ली थी जहाँ जल्दी कोई और न पहुँच सके |
ये जुआरी भी पता नहीं कैसे बिना खाए पिए लगे रहते हैं इसमें | एक एक रुपये का हिसाब रखते हैं खेल में और मज़ाल की कोई बेईमानी कर जाए | पत्ते देखने का ढंग तो बिलकुल निराला , इस तरह से देखते हैं कि कभी कभी आश्चर्य होता कि वो देख भी पाते हैं या नहीं | एक पट्टी तो खुली रहती है , दूसरी को बिलकुल ज़रा सा खोलना , इतना कि बस ये पता चले कि उसका रंग क्या है | फिर थोड़ा और खोलना जिससे पता चले कि ये है क्या , साथ में ये भी कि कोई और किसी भी हालत में देखने न पाये | अगर खुदा न खास्ता दो पत्ते बढ़िया निकल गए तो तीसरा इतनी देर में देखते हैं , मानो देर लगाने से तीसरा पत्ता बाकी दोनों के जैसा ही हो जाएगा | मजे की बात ये कि वैसे चाहे जितना पैसा उड़ा दें लेकिन जुए में जीता हुआ एक भी रुपया कोई ले ले . ऐसा हो ही नहीं सकता | जितने खेलने वाले , उतने ही देखने वाले भी और कई अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए कि कब कोई उठे और वो कब्ज़ा जमायें उसकी गद्दी पर | नींद , थकान सब गायब , बस एक ही धुन कि कैसे जीतें इसमें | ये सारे जुआरी साल के ३६० दिनों में एक आम इंसान की तरह ही वर्ताव करते हैं लेकिन इन तीन चार दिनों में एक अजीब सा बदलाव आ जाता है इनमें और ये सुपरमैन जैसे हो जाते हैं |
आज फिर रात होते ही धीरे से निकल गया वो , रधिया को बाद में पता चला | सुबह कुछ पता नहीं था उसका , रधिया घर की सफाई में लग गयी | बच्चे भी पटाखे और मिठाईयों के लिए जिद करने लगे और वो उनको कल के लिए बहला रही थी | पैसे तो सारे सुमेरवा ले के चला गया था और उसको ढूँढना आसान नहीं था | चिंता में पड़ी थी कि कैसे करे दीवाली पर सारे इंतज़ाम , इतने में पड़ोस की रज्जो आ गयी | दोनों के दुःख साझा ही थे , दोनों घरों से मर्द गायब और सारा जिम्मा उनके सर | साथ बैठकर वो दोनों सोचने लगीं कि कैसे मनाई जाए दीवाली और कैसे मिले इस तकलीफ से छुटकारा | सोचते सोचते दोनों एक विचार पर पहुंची , इस बार किसी भी तरह से पता लगाया जाये इनके अड्डे का और उसे हमेशा के लिए ख़त्म किया जाए |
रज्जो ने जिम्मा लिया अड्डे का पता लगाने का और फिर उन्होंने तंय किया कि दोनों कुछ और औरतों को भी साथ लेंगी और फिर उस अड्डे पर छापेमारी करेंगी | शाम होते होते अड्डे का पता चल गया , क्योंकि कुछ मर्द जल्दी वापस आ जाते थे ताकि खा पीकर फिर जा सकें | अधिकांश महिलाएं इसके लिए सहमत हो गयीं और उन्होंने आपस में गुफ्तगू करके फैसला किया कि आज रात में ही सब वहाँ इकट्ठे चलेंगी और अपना ताश भी लेकर जाएँगी | अगर उन्होंने बंद नहीं किया तो वो सब भी वहीँ महफ़िल जमाएंगी और जब तक जुआ बंद नहीं होगा , वो सब भी जुआ खेलती रहेंगी |
रात में जब बच्चे सो गए तो रधिया और रज्जो के साथ महिला मण्डली निकल गयी अड्डे की ओर | गाँव से बाहर एक झोपडी में सब जुटे थे जुए में और खूब हो हल्ला मच रहा था | जितने लोग खेलने वाले , उतने ही देखने वाले भी थे और जो जीता उसके चेहरे पर वो विजयी मुस्कान खिल जाती थी , मानों उसे राज पाट मिल गया हो | अचानक महिलाओं को देखकर उनके चेहरे फक्क पड़ गए , लगभग सबके घर की महिलाएं आई हुई थीं | उनमे से कुछ लोगों ने तो अपनी बीबियों पर चिल्लाना शुरू कर दिया कि शायद वो सब चली जाएँ लेकिन कोई भी टस से मस नहीं हुई | अब एक ही चारा बचा था उनके सामने कि वो सब जुआ बंद करें और घर वापस चलें | जलती निगाहों से घूरते हुए सारे पुरुष उठे और घर की ओर चल पड़े | अब रधिया के कदम बड़े सुकून के साथ अपने घर की ओर चल पड़े , उसे पता था कि इस बार दिवाली पर उसे सब कुछ अकेले ही नहीं करना पड़ेगा और बच्चों के लिए पटाखे , मिठाई का इंतज़ाम भी हो जायेगा |
ये जुआरी भी पता नहीं कैसे बिना खाए पिए लगे रहते हैं इसमें | एक एक रुपये का हिसाब रखते हैं खेल में और मज़ाल की कोई बेईमानी कर जाए | पत्ते देखने का ढंग तो बिलकुल निराला , इस तरह से देखते हैं कि कभी कभी आश्चर्य होता कि वो देख भी पाते हैं या नहीं | एक पट्टी तो खुली रहती है , दूसरी को बिलकुल ज़रा सा खोलना , इतना कि बस ये पता चले कि उसका रंग क्या है | फिर थोड़ा और खोलना जिससे पता चले कि ये है क्या , साथ में ये भी कि कोई और किसी भी हालत में देखने न पाये | अगर खुदा न खास्ता दो पत्ते बढ़िया निकल गए तो तीसरा इतनी देर में देखते हैं , मानो देर लगाने से तीसरा पत्ता बाकी दोनों के जैसा ही हो जाएगा | मजे की बात ये कि वैसे चाहे जितना पैसा उड़ा दें लेकिन जुए में जीता हुआ एक भी रुपया कोई ले ले . ऐसा हो ही नहीं सकता | जितने खेलने वाले , उतने ही देखने वाले भी और कई अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए कि कब कोई उठे और वो कब्ज़ा जमायें उसकी गद्दी पर | नींद , थकान सब गायब , बस एक ही धुन कि कैसे जीतें इसमें | ये सारे जुआरी साल के ३६० दिनों में एक आम इंसान की तरह ही वर्ताव करते हैं लेकिन इन तीन चार दिनों में एक अजीब सा बदलाव आ जाता है इनमें और ये सुपरमैन जैसे हो जाते हैं |
आज फिर रात होते ही धीरे से निकल गया वो , रधिया को बाद में पता चला | सुबह कुछ पता नहीं था उसका , रधिया घर की सफाई में लग गयी | बच्चे भी पटाखे और मिठाईयों के लिए जिद करने लगे और वो उनको कल के लिए बहला रही थी | पैसे तो सारे सुमेरवा ले के चला गया था और उसको ढूँढना आसान नहीं था | चिंता में पड़ी थी कि कैसे करे दीवाली पर सारे इंतज़ाम , इतने में पड़ोस की रज्जो आ गयी | दोनों के दुःख साझा ही थे , दोनों घरों से मर्द गायब और सारा जिम्मा उनके सर | साथ बैठकर वो दोनों सोचने लगीं कि कैसे मनाई जाए दीवाली और कैसे मिले इस तकलीफ से छुटकारा | सोचते सोचते दोनों एक विचार पर पहुंची , इस बार किसी भी तरह से पता लगाया जाये इनके अड्डे का और उसे हमेशा के लिए ख़त्म किया जाए |
रज्जो ने जिम्मा लिया अड्डे का पता लगाने का और फिर उन्होंने तंय किया कि दोनों कुछ और औरतों को भी साथ लेंगी और फिर उस अड्डे पर छापेमारी करेंगी | शाम होते होते अड्डे का पता चल गया , क्योंकि कुछ मर्द जल्दी वापस आ जाते थे ताकि खा पीकर फिर जा सकें | अधिकांश महिलाएं इसके लिए सहमत हो गयीं और उन्होंने आपस में गुफ्तगू करके फैसला किया कि आज रात में ही सब वहाँ इकट्ठे चलेंगी और अपना ताश भी लेकर जाएँगी | अगर उन्होंने बंद नहीं किया तो वो सब भी वहीँ महफ़िल जमाएंगी और जब तक जुआ बंद नहीं होगा , वो सब भी जुआ खेलती रहेंगी |
रात में जब बच्चे सो गए तो रधिया और रज्जो के साथ महिला मण्डली निकल गयी अड्डे की ओर | गाँव से बाहर एक झोपडी में सब जुटे थे जुए में और खूब हो हल्ला मच रहा था | जितने लोग खेलने वाले , उतने ही देखने वाले भी थे और जो जीता उसके चेहरे पर वो विजयी मुस्कान खिल जाती थी , मानों उसे राज पाट मिल गया हो | अचानक महिलाओं को देखकर उनके चेहरे फक्क पड़ गए , लगभग सबके घर की महिलाएं आई हुई थीं | उनमे से कुछ लोगों ने तो अपनी बीबियों पर चिल्लाना शुरू कर दिया कि शायद वो सब चली जाएँ लेकिन कोई भी टस से मस नहीं हुई | अब एक ही चारा बचा था उनके सामने कि वो सब जुआ बंद करें और घर वापस चलें | जलती निगाहों से घूरते हुए सारे पुरुष उठे और घर की ओर चल पड़े | अब रधिया के कदम बड़े सुकून के साथ अपने घर की ओर चल पड़े , उसे पता था कि इस बार दिवाली पर उसे सब कुछ अकेले ही नहीं करना पड़ेगा और बच्चों के लिए पटाखे , मिठाई का इंतज़ाम भी हो जायेगा |
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