Translate

Friday, November 6, 2015

प्रायश्चित--

पंडितजी आ गए थे, पूजा की तैयारी भी लगभग हो चुकी थी| विभिन्न तरह के पकवान सजा के रखे हुए थे और इन्ही से भोग लगना था पित्तरों को| सारा कार्यक्रम उन दोनों को ही करना था, बेटे ने आने से साफ़ इंकार कर दिया था| सास और ससुर की तस्वीर पर माला चढ़ा कर रत्ना ने पीछे देखा, रवि का पता नहीं था| उसने उनको पूरे घर में ढूँढ लिया, कहीं दिखाई नहीं पड़े| पंडितजी भी आवाज़ लगा रहे थे पूजा के लिए| 
अचानक उसे पीछे नौकरों के कमरे से रवि की आवाज़ आती सुनाई दी| उत्सुकता और झुँझलाहट दोनों हावी हो चुके थे उसपर, वो लपक कर उसी ओर बढ़ी| जैसे ही उसने अंदर प्रवेश किया, उसके कदम एकदम से जड़ हो गए| रवि बड़े प्रेम से नौकर के बूढ़े पिता को आग्रह करके घर में बने सारे पकवान खिला रहे थे| 
धीरे से उसने भी अपने हाँथ से एक मिठाई बुज़ुर्ग को खिला दी| उसके आँख से भी आंसू टपक गए, बहते हुए आंसू उनके पुराने कृत्यों का प्रायश्चित कर रहे थे|

No comments:

Post a Comment