" दिवाली का स्वरुप बदल गया है अब , जहाँ देखो बिजली की झालरें और पटाखे । मिटटी के दिए तो अब कोई जलाना ही नहीं चाहता ", शर्माजी ने एक ठंडी साँस लेते हुए कहा और बाज़ार चल दिए । वो भी उनके साथ चल दिया , रास्ते में भी कुटीर उद्योगों के बेहतरी के बारे में ही बातें करते रहे दोनों और शर्माजी की चिंता ने उसे भी गहरे तक प्रभावित कर दिया था ।
" अरे कैसे दे रहे हो दिए ", अचानक उस बालक को दिए बेचते देखकर उसने पूछा और फिर जरुरत से कुछ ज्यादा ही दिए ले लिए उसने । अभी तक उसके जेहन में शर्माजी से हुई बातचीत ताज़ा थी । दिए लेकर वो मुड़ा तो शर्माजी नहीं थे वहां पर , वो सड़क के उस पार की दुकान से झालरें खरीद रहे थे ।
अब उसे कुटीर उद्योगों की बदहाली की वज़ह पता चल गयी थी ।
" अरे कैसे दे रहे हो दिए ", अचानक उस बालक को दिए बेचते देखकर उसने पूछा और फिर जरुरत से कुछ ज्यादा ही दिए ले लिए उसने । अभी तक उसके जेहन में शर्माजी से हुई बातचीत ताज़ा थी । दिए लेकर वो मुड़ा तो शर्माजी नहीं थे वहां पर , वो सड़क के उस पार की दुकान से झालरें खरीद रहे थे ।
अब उसे कुटीर उद्योगों की बदहाली की वज़ह पता चल गयी थी ।
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