Translate

Thursday, November 12, 2015

लत--

दीवाली आ रही थी और रधिया फिर चिंतित थी | वज़ह थी जुआ जो कहने के लिए तो सिर्फ एक सगुन था लेकिन उसके घर का तो सत्यानास हो जाता था | सुमेरवा दीवाली के तीन दिन पहिले से ही गायब हो जाता था जुआ के चक्कर में | दिन दिन भर खाने पीने की सुध भी नहीं रहती थी उसको | पहले तो बड़ी मुश्किल से खोज कर लाती थी उसको , लेकिन थोड़ी ही देर में फिर गायब हो जाता था | घर का सारा काम , सफाई और बच्चों की फ़रमाईश , सब उसके अकेले के सर पर आ जाता था | पिछली बार तो भरी महफ़िल में उसने उसका ताश ही फाड़ दिया था , बहुत हंगामा मचा था वहाँ | घर आके सुमेरवा ने खूब पीटा था उसको लेकिन इस साल फिर वही हाल | हाँ , इस बार सारे जुआरियों ने काफी सुरक्षित जगह ढूँढ ली थी जहाँ जल्दी कोई और न पहुँच सके | 
ये जुआरी भी पता नहीं कैसे बिना खाए पिए लगे रहते हैं इसमें | एक एक रुपये का हिसाब रखते हैं खेल में और मज़ाल की कोई बेईमानी कर जाए | पत्ते देखने का ढंग तो बिलकुल निराला , इस तरह से देखते हैं कि कभी कभी आश्चर्य होता कि वो देख भी पाते हैं या नहीं | एक पट्टी तो खुली रहती है , दूसरी को बिलकुल ज़रा सा खोलना , इतना कि बस ये पता चले कि उसका रंग क्या है | फिर थोड़ा और खोलना जिससे पता चले कि ये है क्या , साथ में ये भी कि कोई और किसी भी हालत में देखने न पाये | अगर खुदा न खास्ता दो पत्ते बढ़िया निकल गए तो तीसरा इतनी देर में और इतनी चोरी से देखते हैं , गोया देर लगाने से तीसरा पत्ता बाकी दोनों के जैसा ही हो जाएगा | मजे की बात ये कि वैसे चाहे जितना पैसा उड़ा दें लेकिन जुए में जीता हुआ एक भी रुपया कोई ले ले . ऐसा हो ही नहीं सकता | जितने खेलने वाले , उतने ही देखने वाले भी और कई अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए कि कब कोई उठे और वो कब्ज़ा जमायें उसकी गद्दी पर | नींद , थकान सब गायब , बस एक ही धुन कि कैसे जीतें इसमें | ये सारे जुआरी साल के ३६० दिनों में एक आम इंसान की तरह ही वर्ताव करते हैं लेकिन इन तीन चार दिनों में एक अजीब सा बदलाव आ जाता है इनमें और ये सुपरमैन जैसे हो जाते हैं | 
रधिया इन्ही विचारों में डूब उतरा रही थी कि उसकी पड़ोसन रज्जो आ गयी | रज्जो और उसका सुख तो साझा था ही , दुःख भी साझा था | उसका पति भी जुए के चक्कर में गायब था और वो भी इसी उधेड़बुन में थी कि कैसे किया जाए त्यौहार का इंतज़ाम | जब कुछ समाधान नहीं सुझा तो उन्होंने तंय किया कि किसी भी तरह से जुए की जगह का पता लगाया जाए और एक बार फिर पत्तों को फाड़ा जाये | मुसीबत तो ऐसे भी है और वैसे भी , लेकिन कुछ तो करना होगा बच्चों के लिए | शाम होते होते जुआ के अड्डे का पता चल गया और दोनों ने वहां चलने का निर्णय कर लिया | बच्चों को भी साथ लेकर दोनों चल पड़ी कि शायद बच्चों के चलते वो लोग मान जाएँ | 
अड्डे पर जैसे ही वो दोनों पहुंचीं , सुमेरवा और रज्जो का आदमी दंग रह गए | बच्चों के चलते दोनों मज़बूरी में कुछ ज्यादा नहीं बोल पाये और बेमन से उठ कर चल दिए | रास्ते भर उन्होंने अपने परिवार को दिलासा दिया कि अब वो लोग नहीं खेलने जायेंगे और त्यौहार के लिए कुछ पैसे कमाने की जुगत करेंगे | रधिया के कदम तो जैसे जमीन पर ही नहीं पड़ रहे थे , इतनी आसानी से हो जायेगा सब , ये उसकी सोच से परे था | घर आकर खा पीकर दोनों सो गए |
सुबह मुंह अँधेरे ही रधिया की नींद खुली , सुमेरवा गायब था | पहले तो उसने सोचा कि दिशा मैदान गया होगा लेकिन थोड़ी ही देर में उसे यक़ीन हो गया कि फिर से सुमेरवा जुए के अड्डे पर पहुँच गया | वो दुःख और निराशा में अपने सर पर हाँथ रखकर बैठ गयी और उसकी आँखों से आंसू बह निकले | 

No comments:

Post a Comment