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Friday, January 29, 2016

माँ--

ख्वाबों में भी रात को, जब मैं सिहर जाता हूँ
दिल की हर धड़कन से ,माँ तुझे ही बुलाता हूँ

जब भी गुजर जाती है , नर्म हवा सर से मेरे
महसूस करता हूँ , तेरा हाथ सर पे पाता हूँ

जब भी छाती हैं घटाएँ, दिखता है इंद्रधनुष
लगता है तेरा आँचल , छू के खिलखिलाता हूँ

जब भी चाहूँ दुनियाँ जहान की खुशियाँ पाना
तेरी हथेलियों की रेखाओं से, गुजर जाता हूँ

कोशिशें लाख कर लूँ बेहिसाब खुश दिखने की
कैसे जान लेती है दर्द मेरा, नहीं समझ पाता हूँ

यक़ीनन बड़ा क़द है मेरा, लोगों की निगाहों में
पर तेरी निगाहों में माँ ,बच्चा ही नज़र आता हूँ !!

समाजसेवा--

" यहाँ की बेटियों को पढ़ाई के साथ साथ कुछ काम काज भी सिखाना जरुरी है जिससे कि बाहर जाकर ये कुछ काम कर सकें ", समाजसेवी धनपतजी ने भाषण समाप्त करते हुए कहा| उनके साथ एक दो और गणमान्य लोग केयर टेकर के साथ मौजूद थे| कार्यक्रम समाप्ति के पश्चात सभी लड़कियाँ उन लोगो के लिए नाश्ते के प्रबंध में जुट गयीं|
इस नारी निकेतन को धनपतजी ने कुछ दान दिया था और उसी सम्मान में ये छोटा सा कार्यक्रम रखा गया था| एक ट्रे में नाश्ता लेकर वो केयर टेकर के कमरे में गयी जहाँ धनपतजी आराम से लेटे हुए थे और केयर टेकर उनसे सट कर कुछ बात कर रही थी|
" ले आ यहीं नाश्ता", और वो नाश्ता लेकर धनपतजी के पास पहुंची| जैसे ही झुककर उसने नाश्ता रखा, धनपतजी की नज़र ने उसका एक्सरे कर डाला| यूँ तो उसे आदत थी ऐसे निगाहों की, लेकिन कुछ देर पहले के सम्बोधन "बेटियों" की वजह से उसे घृणा सी हो गयी|
" तू यहीं बैठ और नाश्ता करा इनको, मैं आती हूँ", कह कर केयर टेकर निकल गयी|
" कोई दिक्कत तो नहीं है यहाँ तुमको", कहते हुए धनपतजी ने उसका हाथ पकड़ा तो उसके शरीर में एक दम बिजली सी दौड़ गयी| अभी धनपतजी का हाथ कुछ और ऊपर जाता कि उसने पूरी ताक़त से एक थप्पड़ लगाया और अंगारे बरसाते हुए बोली " तुम्हारे जैसे लोगों के पाप का ही नतीजा है ये नारी निकेतन, कम से कम बेटी बोलकर एक बाप की इज़्ज़त तो मत लुटाओ"|
वो बाहर निकल गयी थी, धनपतजी अपने गाल सहला रहे थे|  

ग़लतफ़हमी--

" अरे, बहुत दिन बाद दिखे आप, कहाँ गायब थे". कहते हुए वो बिलकुल पास खड़ी हो गयी| इस अप्रत्याशित घटना से वो चौंक गया और उस धुंधलके में उसको गौर से देखने लगा|
" अच्छा छोड़िये ये सब, चलिए चाय पीते हैं और फिर आप मुझे घर तक छोड़ दीजियेगा", थोड़ा और हैरान हो गया वो| बहुत कोशिशों के बाद भी पहचान नहीं पा रहा था लेकिन उस आग्रह को वो टाल भी नहीं पाया और बस स्टॉप से सामने की चाय की दुकान पर चल पड़ा| उसने उसका हाथ भी पकड़ रखा था जो उसे अजीब लगते हुए भी अच्छा लग रहा था|
" मैं पहचान नहीं पा रहा हूँ आपको, कहाँ मिले थे आपसे !", उसका प्रश्न अधूरा ही था कि वो दुकान पर बैठ कर अपना कपडा ठीक करने लगी|
" देखिये, मैं कभी नहीं मिली हूँ आपसे, लेकिन इस वक़्त आपके साथ की बहुत जरुरत है मुझे| मैं आपको सब कुछ बता दूंगी, बस थोड़ी देर और"| चाय पीते हुए वो बार बार सामने देख रही थी जहाँ किसी की परछाईं जैसी दिख रही थी उसको|
" वो सामने जो एक परछाईं दिख रही है आपको, वो मेरा मंगेतर है| मैं एक ऑफिस में काम करती हूँ और उसको कुछ दिनों से मुझपर शक हो गया है कि मेरा किसी और से अफेयर है| मैंने बहुत कोशिश की उसको समझाने की लेकिन वो समझ ही नहीं रहा है, बहुत अच्छी पोस्ट पर है तो घर वाले इस शादी को किसी भी हालत में तोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं| ऐसी स्थिति में मुझे आपकी मदद लेनी पड़ी, अब शायद वो खुद ही शादी तोड़ के मुझे मुक्त कर दे, मैं किसी ऐसे इंसान के साथ जिंदगी नहीं बिता सकती"|
अब उसे सब कुछ स्पष्ट हो गया, वो शुक्रिया बोल कर चली गयी| पर उसे खुद पर शर्म आने लगी, उसे भी तो थोड़ी देर पहले ग़लतफ़हमी हो गयी थी|

Monday, January 25, 2016

एक अलग रिश्ता --

बेहद दुःखद ख़बर थी, रहमान नहीं रहा, फोन रखने के बाद भी वो बहुत देर तक सकते में रहा। अभी दो घंटे पहले ही तो लौटा था वो हॉस्पिटल से, ऐसी कोई बात लग तो नहीं रही थी, लेकिन अचानक एक अटैक आया और सब कुछ ख़त्म। मौत भी कितनी ख़ामोशी से दबे पाँव आती है, जिन्दगी को खबर ही नहीं होती और उसे शरीर से दूर कर देती है। तुरन्त कपड़े बदल कर कुछ रुपये, ए टी एम और बाइक की चाभी लेकर घर से निकल पड़ा। रास्ते भर पिछले कई साल उसके दिमाग में सड़क की तरह चलते रहे। चार साल पहले ही उसने ज्वाइन किया था इस ऑफिस में और धीरे धीरे रमता गया उसके ढर्रे में, शुरुवाती दिक्कतों में सबसे ज्यादा रहमान ने ही मदद की थी, लिहाज़ा वही सबसे करीबी दोस्त बन गया था। शुरू में उसने रहमान को बड़े भाई की तरह इज़्ज़त दी लेकिन कुछ दिनों में ही रिश्ता दोस्ती में बदल गया। उम्र का फ़र्क़ तो था दोनों के बीच में, रहमान उससे लगभग ८ साल बड़ा था और उसकी पत्नी और एक बेटी भी थी। रहमान की बीबी, जिसे वो भाभीजान कहता था, उसे हमेशा शादी के लिए छेड़ती रहती थीं लेकिन वो हंस के बात उड़ा देता था। एक बार उसने मज़ाक में कह दिया था कि काश आप की शादी नहीं हुई होती तो आपसे जरूर कर लेता, तो भाभी ने भी बहुत अफ़सोस से कहा था कि काश उनकी कोई छोटी बहन होती तो वो जबरदस्ती शादी करवा देतीं।
साल बीतते बीतते उसे पता चल गया था कि भाभीजान हिन्दू थीं, लेकिन रहमान ने कभी भी इसका जिक्र उससे नहीं किया था। उसे थोड़ा खटका था और उसने एक दिन पूछ ही लिया " आखिर इस बात को आप इतना छुपा कर क्यूँ रखते हैं, क्या समाज का डर है आपको।"
" समाज का डर तो नहीं है, होता तो शादी ही क्यूँ करता। दरअसल तुम्हारी भाभी के परिवार वालों को ये बिलकुल मंजूर नहीं था और उन्होंने पूरे तौर पर उनसे रिश्ता तोड़ लिया। हम पिछले ८ साल से इंतज़ार कर रहे हैं कि वो इसे क़ुबूल करें और फिर हम भी एक जश्न मनाएं। किसी लड़की के लिए इससे बड़ा दुःख और क्या  सकता कि उसकी सबसे बड़ी ख़ुशी में ही उसके माँ बाप शरीक न हों।"
कुछ कहते नहीं बना उससे, अगर बच्चों ने फैसला कर ही लिया तो क्या माँ पिता उसमे शामिल होकर उनकी खुशियों को दुगुना नहीं कर सकते, उलटे उनसे रिश्ता जरूर तोड़ लिया| समय बीतता रहा, वो उनके घर का स्थायी सदस्य बन गया था, सबसे मज़ा तो आता था उनकी प्यारी बेटी श्यामली के साथ बात करने में| कितने सवाल पूछती रहती थी उससे और वो भी बिना धैर्य खोये उसके सब सवालों का जवाब देता रहता था| टॉफ़ी ले जाना कभी नहीं भूलता था वो और अगर कभी गलती से भूल गया तो पहला सवाल यही होता था श्यामली का " मेरी टॉफ़ी कहाँ है, भूल गए न आप| ठीक है कोई बात नहीं, अगली बार दो लेते आना, और उसके चेहरे पर मुस्कान खिल जाती थी|"
कभी कभी तो रहमान भी चुहल कर देता " अरे जितना ख्याल तुम इसका रखती हो, उसका आधा भी मेरा रखती तो मुझे नहीं खलता| ये तो मेरे हिस्से का प्यार बाँटने लगा है" और भाभीजान मुस्कुरा कर उसके सर पर हाथ फेर देतीं|
इसी सोच में डूबा कब पहुँच गया दरवाजे पर, उसे खुद पता नहीं चला| भाभीजान के रोने की आवाज़ उसके दिल को चीर दे रही थी, रात वहीँ बीती और सुबह जनाजे को कब्रिस्तान ले जाने का प्रबंध हुआ और फिर सभी अंतिम संस्कार निपटाये गए| भारी मन से वापस लौटकर उसने सोचा कि भाभीजान को दिलासा दे दे लेकिन हिम्मत नहीं पड़ी उनके पास जाने की| बहुत देर तक तो वो बाहर ही बैठा रहा और फिर वापस अपने कमरे पर लौट आया| फिर धीरे धीरे वापस नौकरी पर जाना आरम्भ हो गया और हर दिन शाम को लौटते समय उनके घर जाना नहीं भूलता था| श्यामली भी अब सामान्य हो गयी थी और उसको देखते ही खुश हो जाती थी और उससे बात करते समय वो भाभीजान से भी दो चार बातें कर लेता था| इस बीच उनके मायके से कुछ लोग आये थे और वापस चलने को कह रहे थे लेकिन उन्होंने जाने से स्पष्ट इंकार कर दिया|
उसके लगातार प्रयास करने से भाभीजान को रहमान की जगह कंपनी नौकरी देने को तैयार हो गयी थी, अब सवाल था उनको तैयार करने का| पहले तो उन्होंने मना किया कि वो कुछ और नौकरी ढूँढ लेंगी लेकिन उसके समझाने पर तैयार हो गयीं| नौकरी तो वो पहले भी करती ही थीं, लेकिन श्यामली के जन्म के बाद छोड़ दिया था| बच्चे की परवरिश उन्हें ज्यादा जरुरी लगी और रहमान ने भी सहमति जताई थी| शुरूआती झिझक और दिक्कतों के बाद वो कंपनी के काम में रमने लगीं, वो भी यथासंभव उनकी मदद करता रहता था| श्यामली से मिलने और बात करने के लिए उसे किसी बहाने की जरुरत नहीं थी और वो हर रोज़ शाम को उनके घर चला जाता और अक्सर खाना खा कर ही लौटता क्योंकि श्यामली की बात वो टाल नहीं पाता था|
एक दिन वो श्यामली से बात कर रहा था, तभी उसके एक सवाल ने उसे विचलित कर दिया " चाचा, क्या पापा अब कभी नहीं आएंगे, मुझे उनसे बहुत सी बातें करनी है|"
" क्यों नहीं बेटे, जरूर आएंगे वापस और तुम्हारे लिए बहुत से तोहफे भी लाएंगे| कह तो दिया उसने लेकिन खुद ही अपने खोखले लगते शब्दों पर भरोसा नहीं था उसको| अचानक उसकी नज़र भाभीजान पर पड़ी और उनकी आँखों के नम किनारे देख कर उसकी भी ऑंखें नम होने लगीं| उसने श्यामली को प्यार से थपथपाया और फिर बिना कुछ कहे घर से निकल गया| रास्ते भर उसे श्यामली की बात परेशान करती रही और वो उसका जवाब ढूंढने का प्रयास करता रहा|
कुछ दिनों से वो महसूस कर रहा था कि स्टाफ के लोग उसे देख कर बात करते करते चुप हो जाते थे, गोया उसी के बारे में बात हो रही हो| पहले तो उसने ध्यान नहीं दिया लेकिन एक दिन एक बात उसके कान में भी पड़ी तो उसे धक्का सा लगा, कोई उसके और भाभीजान के बारे में बात कर रहा था| लोग ऐसा भी सोच सकते हैं, उसे विश्वास करना कठिन लग रहा था| कम से कम उसके और रहमान के रिश्ते को तो देखा है लोगों ने, फिर ऐसी सोच, दिमाग सुन्न हो गया उसका| शाम को श्यामली के सवालों का जवाब देने में वो अपने आप को बहुत उलझा महसूस कर रहा था, भाभीजान ने भी पूछा कि क्या बात है तो वो हंस के टाल गया|
रात को बहुत देर नींद नहीं आई उसे, बस वही सवाल उसे मथ रहा था| क्या लोग किसी रिश्ते को सच्ची निगाह से नहीं देख सकते, क्यूँ लोगों को हर रिश्ता गलत ही लगता है| इन्हीं सवालों में उलझा हुआ वो कब सो गया, उसे पता ही नहीं चला| सुबह उठकर उसने सोच लिया था कि आज भाभीजान से वो इस मामले में बात करेगा और ऑफिस चला गया| पुरे दिन उसने भाभीजान की तरफ देखा भी नहीं और शाम को श्यामली से बात करने पहुँच गया| भाभीजान को भी उसका व्यवहार कुछ अजीब लगा तो उन्होंने उसे बुलाया और पूछ लिया " क्या हुआ है तुमको कल से, इतनी चिंता किस बात की है| मुझे बताओ, शायद मैं हल कर सकूँ?
थोड़ी देर तक तो वो सोचता रहा कि कैसे पूछे इस सवाल को, फिर हिम्मत जुटा के उसने पूछ ही लिया " लोग हमेशा गलत ही क्यूँ सोचते हैं भाभीजान, क्या एक स्त्री और पुरुष में कुछ और रिश्ता नहीं हो सकता| क्या बिना किसी रिश्ते के ही दो लोग इतने करीब नहीं हो सकते|"
" ओह, तो ये बात है, मुझे तो पता ही था कि आज नहीं तो कल ये बात आएगी ही और लोग हमारे रिश्ते के बारे में पूछेंगे| क्या तुमको सच में लगता है कि हमारे बीच कोई रिश्ता नहीं है, क्या तुम्हें श्यामली यूँ ही इतनी अच्छी लगती है|" भाभीजान ने एक गहरी सांस लेते हुए उसके चेहरे की तरफ देखा|
उसे भी लग रहा था कि कोई तो रिश्ता जरूर है उनके बीच में| अचानक उसे अपनी माँ याद आ गयी, आज भी वो उसको याद आती रहती है| लेकिन जब भी वो भाभीजान के घर रहता है, उसे एक अजीब सा सुकून मिलता रहता है| फिर उसे लगा, भाभी भी तो माँ समान ही होती है और उसके मन में चल रहा अंतर्द्वंद मिट गया|
" आपसे तो मेरा बहुत गहरा रिश्ता है भाभीजान, मेरी जिंदगी में माँ की कमी तो आपने ही पूरी की है| अब मुझे किसी भी बात की परवाह नहीं है, लोगों की बात का जवाब मैं दे दूंगा|" कहते हुए उसकी आँखों से आंसू बह निकले, शयामली उसके गोद में आ बैठी और भाभीजान उसके सर पर हाथ फेरने लगीं| आज सब कुछ बहुत शांत और प्यारा लगने लगा उसको और एक बार फिर उसने माँ को मन ही मन याद करके श्यामली को अपने सीने से चिपका लिया| 

कुछ ग़ज़लें--

जब भी ढलता है सूरज, याद आते हो
जब भी मिलती है सूरत, याद आते हो
यूँ तो हर वक़्त गुम हूँ, फ़साने में अपने
जब भी मिलती है फ़ुरसत, याद आते हो
ढूँढ लाते हैं मिलकर , जमीं पर सितारे
जब भी दिखती है ग़ुरबत, याद आते हो
जब भी ढलता है सूरज, याद आते हो
जब भी मिलती है सूरत, याद आते हो !!
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मदद को भी ये एहसान बनाके रख देंगे
फ़र्ज़ को भी ये इम्तहान बनाके रख देंगे
मर्ज़ी गर चलने लगे इन हुक्मरानों की
जहाँ को भी ये शमशान बनाके रख देंगे
गूंजती है चहचहाहट आज भी इस बाग़ में
ख़ूनी शिकारी इसे वीरान बनाके रख देंगे
फिक्र भी तो कीजिये प्यारे वतन की अब
वर्ना किसी रोज मेहमान बनाके रख देंगे
मदद को भी ये एहसान बनाके रख देंगे
फ़र्ज़ को भी ये इम्तहान बनाके रख देंगे !!
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जब भी मिलते हैं, मुस्कुराते हैं
दिल का ये दर्द, यूँ छुपाते हैं
कोई चेहरे को पढ़ नहीं पाये
ऐसी मासूमियत, दिखाते हैं
दर्द कितने भी हों तरानों में
गीत खुशियों के ही वो गाते हैं
जब भी खाते हैं इक नया धोखा
आँख बहती हैं, खिलखिलाते हैं
जब भी मिलते हैं, मुस्कुराते हैं
दिल का ये दर्द, यूँ छुपाते हैं !!
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जब भी वो इस मकाँ से उठता है
गोया वो , आसमाँ से उठता है
करता है नेकी जो दुनियाँ में
बाखुदा, इस जहाँ से उठता है
वक़्त गुज़रा है पर नहीं समझे
कौन इस बागबाँ से उठता है
आग दिखती नहीं मकानों से
ये धुआँ सा, कहाँ से उठता है
जब भी वो इस मकाँ से उठता है
गोया वो , आसमाँ से उठता है !!
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वक़्त मिलता तो खुद को आजमाते
कौन दुश्मन है, ये समझ जाते
जख्म देते हैं चाहने वाले
इश्क़ करते तो ये समझ जाते
राह काँटों से भरी होती है
उसपे चलते तो ये समझ जाते
मेरा ही अक्स उनमें दिखता है
उनसे मिलते तो ये समझ जाते
लोग दौलत से परेशां क्यूँ हैं
अख्ज़ होते तो ये समझ जाते
वक़्त मिलता तो खुद को आजमाते
कौन दुश्मन है, ये समझ जाते !!
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ये ज़माने की रवायत है , परेशान न हो
लोगों की यूँ ही आदत है , परेशान न हो
ज़ख्म तो मिलते ही रहते हैं अब अपनों से
दोस्तों की ये हक़ीक़त है , परेशान न हो
बात तो उनकी ही होती है, जो क़ाबिल हैं
किसी अपने की नसीहत है , परेशान न हो
नहीं दिखते हैं नकाबों में असली चेहरे
हर तरफ आज ये हालात है , परेशान न हो
ये ज़माने की रवायत है , परेशान न हो
लोगों की यूँ ही आदत है , परेशान न हो !!

टूटती जंजीरें--

" कैसे हिम्मत पड़ी तुम्हारी मेरे कमरे में आने की, दिमाग तो नहीं ख़राब हो गया तुम्हारा", एकदम से उबल पड़े शर्माजी| शरीर कमजोर हो चला था और अचानक इतना गुस्सा आया तो बर्दास्त नहीं हुआ और वहीँ गिर पड़े| दौड़ कर लक्खी ने उनको उठाया और बेड पर लिटा दिया, चेहरे पर पानी के छींटे डाले और भाग कर मालकिन को बुलाने चली गयी|
मालकिन ने ही कहा था उसे धीरे से देखने के लिए कि वो जग रहे हैं या सो गए हैं| कई सालों से काम कर रही थी वो उनके घर, लेकिन शर्माजी ने कभी भी उसे अपने कमरे में घुसने नहीं दिया| जमींदारी तो कबकी ख़त्म हो गयी थी लेकिन दिमाग मानने को तैयार नहीं होता था उनका| मालकिन समझदार थीं और उन्होंने लक्खी को काम पर रख लिया था, आखिर बच्चे तो पास रहते नहीं थे तो इसी का सहारा था| लेकिन उन्होंने उसको शर्माजी के कमरे में जाने से मना किया था, और उनका काम खुद ही किसी तरह कर देती थीं|
मालकिन ने धीरे से उनका सर अपने गोद में रखा, लक्खी उनको दवा पिलाने लगी| धीरे धीरे उनकी तन्द्रा वापस आने लगी और सामने लक्खी को देखकर एक बार फिर कुछ बोलने को हुए तभी मालकिन ने उनके मुँह पर अपना हाथ रख दिया| अब पहली बार शर्माजी को भी महसूस हो रहा था कि जैसे दवा लक्खी ने नहीं उनकी अपनी बेटी ने ही पिलाई हो| उन्होंने अपना हाथ लक्खी की तरफ बढ़ाया और उसकी खुरदुरी हथेली को पकड़ कर अपनी ऑंखें मूँद लीं| उनकी हथेली पर इस समय तीनों के आँखों से गिरे आँसू मिल कर एकाकार हो रहे थे|

सफाई--

खर्र खर्र की आवाज़ से पता चल गया कि रग्घू काका झाड़ू लगाने आ गए हैं, चाहे कुछ भी जाए उनका नियम नहीं टूटता। कितने ही सालों से, शायद कई पीढ़ियों से उनका खानदान इसी काम से जुड़ा है, खुद को गन्दा करके भी पूरे मोहल्ले को साफ़ करना। झाड़ू लगाना, कचरा साफ़ करना और उसके बाद लोगों के बजबजाते नाबदान इत्यादि साफ़ करना। और साथ साथ वो भी काम करना जिसे करने की सोच रखना भी लोग सोच नहीं पाते।
कुछ दिन पहले का दृश्य उसे याद आ गया जब हाथ में कचरे का डब्बा लेकर वो बाहर निकला था और उसकी नज़र झाड़ू लगाते काका पर पड़ी थी। बड़ी तल्लीनता से वो झुक कर झाड़ू लगा रहे थे, उनका चेहरा धूल से अटा पड़ा था और रह रह कर खाँस रहे थे। तभी सामने के घर से कचरे से भरा एक पोलीथीन किसी ने फेंका जो उनके सामने गिर कर फ़ट गया। पूरा कचरा सड़क पर बिखर गया लेकिन काका ने झुक कर अपने हाथों से उसे बटोरना शुरू कर दिया। अपने हाथों से इतना गन्दा कचरा उठाते देखकर उसे बेहद अफ़सोस हो रहा था और उसे खुद कचरा लेकर आने पर शर्म आने लगी थी।
हाथ में चाय का प्याला और दो जोड़ी दस्ताने लिए वो काका की तरफ बढ़ा और उनके हाथ में दस्ताने पहना दिया| काका इस अप्रत्याशित उपहार को पाकर जड़ हो गए, उसने उनको चबूतरे पर बिठाया और चाय की प्याली पकड़ा दी| भरी आँखों से काका चाय पी रहे थे औए उसे लग रहा था जैसे उसने अपने आप की थोड़ी सफाई कर ली है|

तिरंगे की शान--

पुलिस पदक लेने के बाद उसने एक बार अपने सीने पर टंगे मेडल को देखा और स्टेज से वापस जाते समय तिरंगे को एक तगड़ा सैल्यूट किया| सामने बैठी माँ को उसने देखा जो अपने आँसुओं को संभाल नहीं पा रही थी, और जाकर उसके सीने से लग गया| फिर उसने फोन निकाला और बड़े भाई को कॉल करने लगा|
" बहुत बहुत बधाई छोटे, हम सब को तुम पर गर्व है| मैं तो अब भी इंतज़ार कर रहा हूँ कि कब मौका मिले सीमा पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने का और मैं भी कोई मेडल टांगूं अपने सीने पर, लेकिन तुमने ठीक ही किया पुलिस की नौकरी करके| बड़ा मैं हूँ लेकिन मुझसे आगे निकल गए तुम|"
" भैया, इसका श्रेय तो माँ और आपको ही जाता है| पिताजी के शहीद होने के बाद मैं भी तो आप की तरह सेना में ही जाना चाहता था लेकिन माँ ने ही कहा कि देश के बाहर के दुश्मनों से लड़ने के लिए बड़ा बेटा तो है ही, लेकिन देश के अंदर जो दुश्मन हैं उनसे लड़ने वाला भी तो चाहिए| और आप ने भी सहमति जताई थी, जबकि आप की भी इच्छा यही थी कि मैं फ़ौज़ में ही जाऊँ|"
" हाँ, किसी भी हालत में अपने तिरंगे पर आँच नहीं आनी चाहिए, सीमा पर मैं संभालता हूँ, अंदर तुम सम्भालो, जय हिन्द|"
" जय हिन्द " उसने भी दृढ़ आवाज़ में कहा और फोन माँ की तरफ बढ़ा दिया| बड़े बेटे से बात करती माँ के चेहरे पर गर्व की आभा दमक रही थी और उसे माँ में भारत माँ नज़र आ रही थी|

Sunday, January 17, 2016

बराबरी--

" क्या ख़ाक बराबरी करोगी तुम नारियाँ हम पुरुषों की, हम हर मामले में तुमसे बीस हैं ", पुरुष के अहम ने ललकारते हुए कहा।
" अभी भी तुम यही कहोगे, मान क्यूँ नहीं लेते कि हम न सिर्फ तुमसे बराबरी पर हैं, बल्कि कई मामलों में तुमसे श्रेष्ठ भी हैं", नारी के शान्त मन ने जवाब दिया।
" अच्छा, जरा बताना कि तुम किस मामले में हमारे बराबर हो ?, पुरुष का अहम अभी भी गुरुर से भरा हुआ था।
" किस क्षेत्र में हम तुम्हारे बराबर नहीं हैं, हर मामले में तुमसे कंधे से कन्धा मिलाकर चलते है। और तुम्हे जन्म देकर पुरुष बनाने वाले भी तो हम ही हैं।"
" बराबरी के लिए तो तुमको आठ हाथों वाला अवतार लेना पड़ता है", व्यंग से पुरुष के अहम ने कहा।
" या तो तुम्हे दिखता नहीं और या तो तुम देखना ही नहीं चाहते। हमारे ये दो हाथ ही तुम्हारे आठ हाथ के बराबर हैं, लेकिन इसे मानने के बदले तुमने हमें ही आठ हाथ वाला बना दिया", नारी का मन अभी भी शांत था।
पुरुष के अहम को बात समझ में आ गयी, उसने धीरे से अपने दोनों हाथ नारी के आठ हाथों के सामने जोड़ दिए। अब उसे नारी के भी सिर्फ दो ही हाथ नज़र आ रहे थे जो उसके दो हाथों के समान थे।

कटी पतंग--

मिश्रजी के छत पर पतंगे उड़ रही थीं, मकर संक्रान्ति का अवसर था और उनके बेटे के लिए इसके बिना रह पाना लगभग नामुमकिन ही था। पतंगें तो तक़रीबन हफ़्ता भर पहले से ही उड़ने लगती थीं और इस बार भी कुछ ऐसा ही था बस एक फ़र्क़ था, अहमद भाई का बेटा नहीं था उसके साथ। पिछले कई सालों से दोनों साथ साथ एक ही छत से पतंगें उड़ाते थे और उनका प्यार पतंग के डोर जैसा ही था जिसे जुदा कर पाना बहुत मुश्किल था। पूरे मुहल्ले की पतंगें दोनों मिलकर काटा करते थे और रह रह कर "भा कटे" की आवाज़ गूँजती रहती थी। एक दूसरे से सटा हुआ उनका घर सभी त्यौहार लगभग एक साथ ही मनाता था, एक बकरीद छोड़ कर। मिश्रजी शुद्ध शाकाहारी थे, हाँ बच्चों के बारे में ये नहीं कहा जा सकता था। एक अलिखित समझौता दोनों घरों के बीच था कि अहमद भाई के यहाँ जो भी पके, गोस्त या हड्डी मिश्रजी के घर की तरफ नहीं आनी चाहिए। ये समझौता पता नहीं कितने सालों से अछुण्ण था और सब कुछ सामान्य चल रहा था।
जब से प्रदेश में मंदिर मस्जिद विवाद हुआ था तबसे उनके शहर और मुहल्ले में भी एक अनदेखा और अन्जाना तनाव छाने लगा था। बाहर से तो कुछ भी नहीं दिखता था लेकिन अब दोनों को कुछ अंदेशा रहने लगा था। पहले भी कई मौलवी अहमद भाई के घर आया करते थे लेकिन मिश्रजी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। ऐसा ही कुछ अहमद भाई के साथ भी था लेकिन अब ऐसे लोगों के आने पर कुछ अजीब सा लगने लगा था दोनों को। अहमद भाई के यहाँ जो कुत्ता था वो दोनों घरों में बेरोकटोक घूमता था और मिश्रजी की गाय को रोटी अहमद भाई के यहाँ से भी आती थी। लेकिन अब पता नहीं क्यूँ अहमद भाई अपने कुत्ते को बाँधने लगे थे और रोटियाँ भी कम ही भेजते थे गाय के लिए। हाँ आपस की बातचीत में दोनों ही सामान्य बनने की पूरी कोशिश करते और ऐसा जताते जैसे कुछ भी तो नहीं बदला है।
संक्रान्ति से करीब एक महीना पहले अहमद भाई के घर गोश्त बना और कुत्ते को भी दिया गया था। बहुत दिन बाद उसे खुला छोड़ दिया तो वो पता नहीं कब गोश्त का टुकड़ा लेकर मिश्रजी के घर घुस गया। कुछ देर बाद वो वापस आ गया और अहमद भाई ने उसे बांध दिया। अगली सुबह मिश्रजी के चिल्लाने से उनकी आँख खुली और जैसे ही वो बाहर आये, मिश्रजी ने उनकी लानत मलामत करनी शुरू कर दी। थोड़ी देर बाद ही उनको समझ आया कि कुत्ते के चलते एक हड्डी मिश्रजी के बरामदे में पड़ी हुई थी और मिश्रजी इसे जानबूझ कर की गयी हरक़त समझ बैठे। अहमद भाई ने उनको समझाने की बहुत कोशिश की, माफ़ी भी मांगी लेकिन शीशे में पड़ी दरार पर ज्यादा जोर पड़ चुका था और शीशा चटक गया। उन दोनों के बच्चे भी स्थिति को समझ नहीं पाये और उन्होंने भी आपस में दूरी बना ली।
नया साल आया और दोनों परिवारों ने एक दूसरे को ज़बानी मुबारकवाद नहीं दी, हाँ मोबाइल से सन्देश जरूर भेज दिया था दोनों ने। अब संक्रान्ति पास आ रही थी और दोनों ही परिवार के बेटे अपने अपने छत पर पतंगें उड़ाने लगे, बस एक दूसरे की पतंगें काटते नहीं थे। मुहल्ले के बच्चे अब उनकी पतंगें भी काटने लगे थे और इसका अफ़सोस दोनों को ही हो रहा था लेकिन फिर भी दोनों छतों से पतंगें अलग अलग उड़ रहीं थीं। आज संक्रान्ति के दिन अहमद भाई भी छत पर आ गए और बेटे को पतंग उड़ाते और कटाते देखते रहे। थोड़ी देर बाद उनकी नज़र मिश्रजी के छत पर गयी जहां उनका बेटा अकेले पतंग उड़ा रहा था तो उनके दिल में कुछ चुभ सा गया। कुछ सोचकर उन्होंने अपने बेटे से पतंग की डोर ली और पतंग को मिश्रजी की छत की ओर उड़ा दी, उनकी पतंग ने एक दो बार हवा में गोता लगाया और फिर उन्होंने अपनी पतंग जानबूझकर कटवा दी। कटती पतंग पर मिश्रजी की भी नज़र पड़ी और उन दोनों के मुह से बेशाख्ता निकल गया " भा कटे ।" थोड़ी देर में ही दोनों बेटे साथ साथ पतंग उड़ा रहे थे और मोहल्ले के बच्चों की कटती पतंगों के साथ साथ "भा कटे" का सम्मिलित शोर उनकी छत से निकल रहा था।

मन का अँधेरा--कहानी

बस खड़ी थी और उसमें कुछ सवारियाँ बैठी भी हुई थीं, कण्डक्टर उसके पास ही खड़ा होकर लख़नऊ लख़नऊ की आवाज़ लगा रहा था। मैंने किनारे कार खड़ी की और नीचे उतर गया, दूसरी तरफ से मुकुल भी उतर गया था। उसका झोला पिछली सीट पर ही पड़ा था जिसे मैंने उठाने का अभिनय किया, मुझे पता था वो उठाने नहीं देगा। झोला उठाकर वो बस की तरफ चलने को हुआ तभी मैंने उसके कन्धे पर हाथ रखा और उसे धीरे से दबा दिया, मुकुल ने पलटकर देखा और उसकी आँखे भीग गयीं।
"कुछ दिन रुके होते तो अच्छा लगता", मैं अपनी खोखली आवाज़ को ही पहचान नहीं पा रहा था।
"इच्छा तो मेरी भी थी लेकिन कल कोर्ट में केस है, तुम तो जानते ही हो। पिताजी लड़ते लड़ते भगवान को प्यारे हो गए और मुझे विरासत में थोड़े खेतों के साथ ये बड़ा मुक़दमा भी दे गए। अगली बार जरूर कुछ दिन रुकने के लिए आऊँगा, आखिर तुम कोई गैर तो हो नही।"
बस अब तक हिलने लगी थी और मैंने मुकुल का हाथ पकड़ा और बस के दरवाज़े तक ले गया। मुकुल ने एक बार और मेरा हाथ पकड़ा और बस में चढ़ गया। जब तक बस आँखों से ओझल नहीं हो गयी, मुकुल अपना हाथ खिड़की से निकालकर हिलाता रहा।
वापस आते समय जैसे एक बोझ उतरा महसूस कर रहा था मैं, हालाँकि कल मुझे भी लख़नऊ जाना था और अपनी सरकारी कार से ही जाना था लेकिन मैंने जाहिर नहीं होने दिया मुकुल को। एक और दिन उसे रोकने की हिम्मत नहीं थी मुझमे, हालाँकि मैंने अपने आप को दिलासा देने लिए पत्नी का कारण ढूँढ लिया था। आज रविवार के दिन सुबह सुबह उसका आना और उसपर पत्नी की प्रतिक्रिया, जिसे सिर्फ मैंने देखा था, के बाद किसी भी हालत में उसे रोकने की हिम्मत नहीं थी मुझमे।
"दिन का खाना तो खिला दूँगी मैं लेकिन रात में रोका तो खुद ही बनाकर खिलाना अपने गँवार दोस्त को", पत्नी ने बिना किसी शिकन के स्थिति स्पष्ट कर दी थी। मैंने भी हाँ में सर हिलाते हुए बस इतना ही कहा था "थोड़ा धीरे बोलो, सुनाई पड़ता है बाहर"। अपना पैर पटकते हुए और मुझे मेरी स्थिति का एहसास दिलाती हुई वो बाथरूम में घुस गयी।
पिछले महीने जब मैं गाँव पिताजी के श्राद्ध के लिए गया था, तब मुकुल ने पूरे पाँच दिन तक दिन रात मेरे हर काम को अपना समझ कर किया था। रोज़ उसके घर से ही नाश्ता और खाना आता था, दिन में कई बार चाय भी। जो संतुष्टि उसे मुझे आराम से रहते हुए देख कर होती थी, शायद वो ख़ुशी मैंने माँ के बाद किसी की भी आँखों में देखी थी। उसकी पत्नी का घूँघट डाल के मेरे सामने आना लेकिन पूरे अधिकार से मुझे खाने इत्यादि के लिए पूछना मुझे अंदर तक सुकून दे जाता था। उसके दोनों बच्चे भी खूब घुल मिल गए थे और चलते समय मैंने उन सब को जौनपुर आने का निमन्त्रण दे दिया था। उस समय मेरे अंदर कोई भी अलग भावना नहीं थी, लेकिन जैसे जैसे मैं जौनपुर पहुँचता गया, वो भावना धीरे धीरे ख़त्म होती गयी।
"ये सब क्या उठा लाये हो गाँव से, हमें भी गँवार समझ रखा है क्या", और कुछ बोलूँ उससे पहले ही बाई को उठाकर सारी चीजें पकड़ा दी जो मुकुल की बीबी ने बच्चों के लिए बनाकर दी थी। वो आखिरी प्रहार था मेरे दिमाग पर और मैं सब कुछ भूल जाने की दिशा में बढ़ चुका था।
लेकिन आज दिन में पत्नी के द्वारा कहे गए इस वाक़्य ने तो मुझे जैसे हजारों वाट का झटका दे दिया "कितना अच्छा खाना बनाती हैं आपकी पत्नी, बच्चे तो आजतक याद करते हैं आपके द्वारा भेजे गए सारे सामान को"। मुकुल की आँखों से आंसू निकल पड़े थे और उसने बीबी की कुटिल मुस्कान नहीं देखी। इतना अच्छा अभिन्य तो किसी फिल्म में भी देखने को नहीं मिला था मुझे|
अचानक दसवीं की परीक्षा मुझे याद आ गयी, अपने गाँव से तीस किलोमीटर दूर था परीक्षा केंद्र। हम दोनों ही परीक्षा केंद्र से थोड़ी दूर एक और गाँव, जिसमे उसकी बहन थी, में रुके हुए थे। उसकी बहन उससे ज्यादा मेरा ख्याल रखती थी और आखिरी दो परीक्षा देने के लिए तो वो ही मुझे अपनी साइकिल पर बिठा कर ले जाता था। पता नहीं मेरे पैरों में क्या हो गया था कि मुझसे चलते भी नहीं बन रहा था और उसने बिना चेहरे पर शिकन लाये अपनी परीक्षा ख़त्म होने के बाद मुझे भी परीक्षा केंद्र पहुँचाया था। बस एक ही बात कहता था मुकुल, तुमको बहुत आगे तक पढ़ना है और बड़ा अफ़सर बनना है, मैं तो बस इस परीक्षा के बाद खेती बाड़ी में लग जाऊँगा।
सचमुच वो खेती बाड़ी में लग गया और मैं पढ़ता गया। कुछ ही साल बाद शहर में आकर धीरे धीरे मैं अपनी अलग दुनियाँ में मशगूल होता गया और वो गाँव में रहकर मेरे लिए दुआएँ माँगता रहा। अपनी शादी में भी उसने मुझे बुलाया था लेकिन मैं परीक्षा के चलते नहीं जा पाया , उसने इस बात का जरा भी बुरा भी नहीं माना। नौकरी मिल जाने के बाद मैं गाँव चला गया, पिताजी का आग्रह था कि जब तक ज्वाइन नहीं करना है तब तक गाँव रह लो। कभी कभी तो मुझे ऐसा लगता जैसे नौकरी मेरी नहीं मुकुल की लगी हो, इतना खुश और इतनी सारी कल्पनाएँ करता था वो जैसे सब उसे ही करना हो।
मेरी नौकरी लगते ही बड़े बड़े घरों से रिश्ते आने लगे थे और पिताजी ने आर्थिक रूप से जो सर्वश्रेष्ठ रिश्ता था, उसे स्वीकार कर लिया था| बड़े घर के चलते पत्नी द्वारा लाये गए सामानों की कीमत के आगे कहीं मेरी अपनी कीमत शुरुआत से ही कम हो गयी थी जो बढ़ते वक़्त के साथ साथ और कम होती गयी| मेरी शादी में भी वो पूरे जोश से शामिल हुआ था और अपनी भाभी के लिए, उसने बहुत कीमती तोहफ़ा ख़रीदा था। मुझे ख़ुशी के साथ साथ आश्चर्य भी हुआ था, दरअसल मैंने सोचा भी नहीं था कि मुकुल इतना पैसा खर्च कर सकता है। तोहफ़ा तो मैंने भी दिया था उसकी पत्नी को लेकिन उसकी हैसियत के हिसाब से दिया था, न कि मेरे हैसियत के हिसाब से। शादी के बाद भी एकाध बार वो आया था और तब सब ठीक ही बीता था। लेकिन जैसे जैसे मैं तरक्की की सीढियाँ चढ़ता गया, मुझसे ज्यादा मेरी पत्नी को पुराने लोग खटकने लगे। पिताजी का भी देहान्त हो गया और कोई वज़ह नहीं बची थी गाँव जुड़े रहने की, तो मैंने गाँव की अधिकांश खेती बाड़ी बेच दी थी। थोड़े से खेत जो बहुत दूर थे गाँव से और जिनको बेचने पर बहुत मुश्किल से कुछ मिलता, वो खेत मैंने बटाई पर दे दिए। चाहता तो उस खेतों को मुकुल को दे सकता था, मन में आया भी था लेकिन पत्नी ने कड़ाई से मना कर दिया।
"मुकुल को देने मतलब समझते हो, कुछ भी नहीं मिलेगा और भविष्य में खेत भी जायेंगे हाथ से", पत्नी ने समझाया तो कुछ बोलते नहीं बना मुझे| लेकिन उस समय तक थोड़ी सी लिहाज़ बची हुई थी मुझमे। और इसी लिए मैंने कुछ इस तरह से उससे पूछा कि उसने मना कर दिया और मेरे मन से भी बोझ उतर गया।
साल में एक बार मेरी सरकारी कार गाँव चली जाती थी और जो कुछ भी मिलता उसे लेकर आ जाती। लगभग हर बार मुकुल के घर से कुछ न कुछ आता था और अधिकतर वो बाई के हिस्से चला जाता। रिश्ते को निःस्वार्थ निभाने का जो ज़ज्बा उसमे था वो कभी कम नहीं हुआ, हाँ मैं जरूर महंगाई से सिकुड़ते वेतन की तरह अपनी खोल में सिकुड़ता चला गया। एक बार मुझे पता चला था कि उसका खेत का मुक़दमा लखनऊ चल रहा है और मेरा एक दोस्त उस समय वहाँ जिला जज था। उस रात को खाने के समय मैंने पत्नी से कहा "मुकुल के मुक़दमे का पता लगाकर लखनऊ वाले दोस्त को बोल देता हूँ, शायद कुछ मदद ही कर दे"।
"मुझे पता था कि वो क्यों हर बार कुछ न कुछ भेज देता है, आखिर काम जो निकलवाना था। आज तो मुक़दमे के लिए कहा है, कल बच्चे की पढ़ाई के लिए और आगे चलकर पत्नी की बीमारी का भी बहाना होगा। कोई जरुरत नहीं है ये सब करने की, जितना हो सके दूर ही रहो उससे।"
अब आगे और कुछ कहने की हिम्मत नहीं बची थी मुझमे, हाँ एक डर जरूर बैठ गया था मन में कि कहीं वो मुकुल से कुछ कह न दे। खैर समय बीतता गया, मैं अपने आप को एक अच्छा पति साबित करता गया और अंदर ही अंदर अपने इंसान को मारता गया। लेकिन आज सुबह उसके फोन ने बहुत मुश्किल में डाल दिया था जब उसने कहा कि वो मिलने आ रहा है। फोन आने के बाद पत्नी की घूरती निगाह जिसमे चेतावनी स्पष्ट नज़र आ रही थी, और मेरे मन में भी घूमता प्रश्न कि आखिर किस काम से आ रहा है। जब तक वो घर पर रहा, मैंने कोई भी मौका नहीं दिया मुकुल को कि वह कुछ कह सके।
घर पहुँच कर जैसे ही मैं कार से निकला, पत्नी ने गौर से देखा और जब मुझे अकेले उतरते देखा तो राहत की साँस लेते हुए अन्दर चली गयी। मैं भी अखबार लेकर ड्राइंग रूम में बैठने आया, तभी मेरी निगाह मेज पर रखे कागज़ के टुकड़े पर पड़ी। उसे खोल कर देखा तो ५०० के दो नोट उसमे रखे थे और एक पंक्ति लिखी हुई थी " बच्चों के लिए कुछ खरीद देना।"

मेरी आँखों में आंसू आ गए, मैंने अख़बार को थोड़ा ऊपर उठा लिया। बाहर फैला अँधेरा, मेरे मन के अँधेरे के साथ धीरे धीरे बढ़ने लगा था।
   
             

Thursday, January 14, 2016

एक ही मंज़िल--

आज फिर से वही दोराहा सामने था, वक़्त ने फिर से ३० साल पहले की हालात में ला खड़ा किया था। पिता चाहते थे कि वो उनकी तरह एक सुरक्षित सरकारी नौकरी करे लेकिन उसकी महत्वाकांक्षा कुछ अलग और अपने दम पर करने की थी। पिता की नाराज़गी को दरकिनार कर दूर इस शहर में अपना व्यवसाय शुरू किया उसने और धीरे धीरे सफलता के सोपान चढ़ता हुआ एक बेहद सफल व्यवसायी बन बैठा।
लेकिन एकलौते बेटे की जिद ने, कि वो गाँवों में किसानो के बीच जाकर काम करना चाहता है, उसे धर्मसंकट में डाल दिया था। बहुत कोशिश की थी उसे समझाने की, लेकिन वो भी उसी का बेटा था, कैसा सुनता। बहुत आत्ममंथन के बाद उसने बेटे को बुलाया और बोला " एक ही शर्त पर सहमति दे सकता हूँ, तुमको मुझे भी इस काम में अपना भागीदार बनाना पड़ेगा", और फिर अपने वकील को फोन करके बोला " एक ट्रस्ट बनाना है किसानों के लिए, जल्दी से कागज़ात तैयार करिये।"
अब उसे दोनों रास्ते एक ही मंज़िल को जाते दिख रहे थे।

ज़ल्लाद--

आज के अखबार में छपी एक छोटी सी खबर ने उसे बेचैन कर रखा था| खबर थी कि ज़ल्लाद नहीं होने से कई खूंख्वार सज़ायाफ्ता फाँसी पर नहीं चढ़ाये जा रहे| उसे पिछली कई घटनाएँ याद आने लगीं, उसके शहर में घटे उस जघन्य बलात्कार के अपराध में मौत की सजा पाये अपराधी अभी भी कालकोठरी में पड़े थे, कुछ आतंकवादी भी जिन्हें बहुत पहले ही इस दुनियाँ से चले जाना चाहिए था, वो भी किसी अप्रत्याशित रिहाई की आस लगाये पड़े हुए थे|
अचानक उसे उस ज़ल्लाद का चैहरा भी याद आ गया जिसे उसने कभी अखबार में देखा था और उसके चेहरे को देखकर घरवालों की घृणित प्रतिक्रिया भी याद आ गयी|
स्नातक पास वो आज भी नौकरी के लिए तमाम जगह प्रयासरत था लेकिन शायद सिफारिश की कमी उसके आड़े आ रही थी| वो फैसला नहीं कर पा रहा था कि क्या करे, तभी एक और खबर पर उसकी नज़र पड़ी " पैसे के प्रलोभन से तमाम नौजवान आतंकवादी गतिविधियों में शामिल", और उसके अंदर चलता द्वन्द समाप्त हो गया| जब नौजवान पैसे के लिए ऐसे जघन्य कामों में शामिल होने से नहीं कतरा रहे तो ऐसे खूंख्वार अपराधियों को मौत के घाट उतारने के लिए अगर उसे कुछ पैसे मिलते हैं तो इसमें गलत क्या है|
अब उसे उस जल्लाद का चेहरा बेहद धवल नज़र आ रहा था और उसने घरवालों की प्रतिक्रिया को नकार दिया था|  

Wednesday, January 6, 2016

हक़--

एक बार और उसने जोर लगाया और खड़ा हो गया , जब तक भीड़ कुछ समझे वो अपनी पूरी ताकत लगा कर भागा। कपड़े फट चुके थे और शरीर खून से सराबोर लेकिन फिर भी न जाने कहाँ से दम आ गया था उसमे भागने का। किसी भी तरह से इस भीड़ से निकल भागना चाहता था वो, अपने बच्चे के लिए, अपने बूढ़े बाप के लिए, बीमार पत्नी के लिए और अपने गाँव के लिए जिसे वो छोड़ कर यहाँ आया था कि अपने परिवार का भरण पोषण कर सके।
अपना घर छोड़ने का फैसला आसान नहीं था उसके लिए, गाँव में एक झोपड़ा था उसका , थोड़े से खेत भी थे। पिता अब लाचार हो गए थे और बिस्तर पर पड़े रहते, उसकी पत्नी पूरा ख्याल रखने की कोशिश करती उनका। बेटा भी अब स्कूल जाने लायक हो गया था और सब ठीक ही चल रहा था। लेकिन अचानक पत्नी बीमार पड़ी और उसकी दवा में जो थोड़े खेत थे वो भी चले गए। इलाज़ लम्बा चलना था तो पैसों के इंतज़ाम लिए शहर आ गया। तमाम बनते मकानों ने उसको ठिकाना और दो पैसे देने शुरू कर दिए और वो सुनहरे भविष्य की आस में वहीँ रुक गया। थोड़े पैसे इकट्ठे हो गए थे और कुछ दिन बीत भी गए थे तो वो सुबह गाँव निकलने की सोच कर सो गया।
सुबह शोर सुनकर उसकी आँख खुली और उसने झट से अपना बैग उठा लिया। उस अधबने मकान से जैसे ही बाहर निकला, एक भीड़ ने उसे घेर लिया और जबतक कुछ समझे, लोग उसके ऊपर लाठी डंडे चलाने लगे। कुछ लोगों के हाथ में उसका कपड़ा आया और वो भी तार तार हो गया, अब तक उसे समझ आ गया था कि अगर वो भागा नहीं तो उसका बचना मुश्किल है। बैग को हाथ में पकड़े हुए वो भागा तभी एक इंट का टुकड़ा उसके सर पर लगा और वह जमीन पर गिर पड़ा।
थोड़ी देर में ही उसकी सांस उसका साथ छोड़ने लगी, लेकिन पीछे से आता शोर उसे भागने की ताक़त दे रहा था। उसने एक बार पलट के देखा और फिर दुगने ताक़त से भागा, ऐसा लग रहा था जैसे उसका परिवार उसकी ताक़त बन गया था। जैसे जैसे वो शहर के बाहर निकलता गया, उसकी पकड़ अपने बैग पर मजबूत होती गयी। आखिर इस बैग पर उसके परिवार का हक़ जो था।  
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एक बार और उसने जोर लगाया और खड़ा हो गया , जब तक भीड़ कुछ समझे वो अपनी पूरी ताकत लगा कर भागा। कपड़े फट चुके थे और शरीर खून से सराबोर लेकिन फिर भी न जाने कहाँ से दम आ गया था उसमे भागने का। किसी भी तरह से इस भीड़ से निकल भागना चाहता था वो, अपने बच्चे के लिए, अपने बूढ़े बाप के लिए, बीमार पत्नी के लिए और अपने गाँव के लिए जिसे वो छोड़ कर यहाँ आया था कि अपने परिवार का भरण पोषण कर सके।
अपना घर छोड़ने का फैसला आसान नहीं था उसके लिए, गाँव में एक झोपड़ा था उसका , थोड़े से खेत भी थे। पिता अब लाचार हो गए थे और बिस्तर पर पड़े रहते, उसकी पत्नी पूरा ख्याल रखने की कोशिश करती उनका। बेटा भी अब स्कूल जाने लायक हो गया था और सब ठीक ही चल रहा था। लेकिन अचानक पत्नी बीमार पड़ी और उसकी दवा में जो थोड़े खेत थे वो भी चले गए। इलाज़ लम्बा चलना था तो पैसों के इंतज़ाम लिए शहर आ गया। तमाम बनते मकानों ने उसको ठिकाना और दो पैसे देने शुरू कर दिए और वो सुनहरे भविष्य की आस में वहीँ रुक गया। थोड़े पैसे इकट्ठे हो गए थे और कुछ दिन बीत भी गए थे तो वो सुबह गाँव निकलने की सोच कर सो गया।
सुबह शोर सुनकर उसकी आँख खुली और उसने झट से अपना बैग उठा लिया। उस अधबने मकान से जैसे ही बाहर निकला, एक भीड़ ने उसे घेर लिया और जबतक कुछ समझे, लोग उसके ऊपर लाठी डंडे चलाने लगे। कुछ लोगों के हाथ में उसका कपड़ा आया और वो भी तार तार हो गया, अब तक उसे समझ आ गया था कि अगर वो भागा नहीं तो उसका बचना मुश्किल है। बैग को हाथ में पकड़े हुए वो भागा तभी एक इंट का टुकड़ा उसके सर पर लगा और वह जमीन पर गिर पड़ा।
थोड़ी देर में ही उसकी सांस उसका साथ छोड़ने लगी, लेकिन पीछे से आता शोर उसे भागने की ताक़त दे रहा था। भागते भागते एक एक करके सबका चेहरा उसके सामने गुजरने लगा, मुस्कुराता बेटा, चेहरे पर पीली मुस्कान लिए पत्नी, उदास पिता और हरा भरा गाँव का रास्ता| उसने एक बार पलट के देखा और फिर दुगुने ताक़त से भागा, ऐसा लग रहा था जैसे उसका परिवार उसकी ताक़त बन गया था। अचानक सामने से आती भीड़ से एक गोली निकली और वो कटे पेड़ की तरह लुढक गया|
भीड़ किसी और तरफ जा चुकी थी, उसका शरीर औंधे मुह खून से तरबतर पड़ा था| लेकिन उसकी पकड़ अपने शरीर के नीचे दबे बैग पर उसी तरह मजबूत थी, आखिर इस बैग पर उसके परिवार का हक़ जो था।    

मिलते रंग--

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उसने शाल ग्रहण किया और फिर कुछ कहने के लिए माइक पकड़ लिया| मन में जज्बातों का बवंडर आ जा रहा था क्यूंकि इस संस्था के साथ उसका जुड़ाव बहुत पुराना था| शुरुवाती दौर में जब वो अकेला दूसरे मज़हब का कर्मचारी था तो उसे थोड़ी घबराहट होती थी| लोग अगर किसी भी बारे में बात कर रहें हों , उसे लगता जैसे उसके ही बारे में बात हो रही है| हमेशा उसे चेहरे और पीठ पर लोगों की निगाहें चुभती महसूस होतीं| ऐसा नहीं था कि ये सब अकारण था, उसने सुना भी था कई बार उसके बारे में चर्चा होते हुए| लेकिन जब उससे बात होती तो लोग कुछ भी महसूस नहीं होने देते, तो वो सब भुलाने की कोशिश करता| इन वर्षों में कितनी ही बार धार्मिक तनाव हुआ और हर ऐसी घटना के बाद उसे लगता जैसे निगाहें और तेज चुभने लगी हैं| लेकिन हर बार उस कार्यालय में एक शख्स उसे तसल्ली देता था और हमेशा कहता था कि जितना तुम इन चीजों के बारे में सोचोगे, उतना ही ये चुभती नजरें महसूस होंगी| इन्हीं सब से गुजरता हुआ वो अपने कार्य में पूरी ईमानदारी से लगा रहा और आज सेवानिवृत्ति की तारीख भी आ गयी|
सबसे पहले उसने समस्त स्टाफ का धन्यवाद किया और फिर उपरवाले का शुक्रिया अदा किया| फिर उसने उस शख्स को बुलाया और उसका हाथ पकड़कर बोला " मेरे कश्मकश के समय में आपने जो सलाह दी, शायद उसी का नतीजा है कि मैं अपनी नौकरी पूरा कर पाया| मुझे अकेले होने के चलते बहुत बार गलत ख़यालात आये लेकिन आपने उन पलों में जो महसूस किया और जिस तरह से मेरी हिम्मत बढाई, उसका क़र्ज़ तो मैं कभी नहीं चुका पाउँगा| हाँ, इतना जरूर कहना चाहूंगा कि हम इन चीजों से पूरी तौर से परे तो नहीं रह सकते लेकिन किसी ऐसे शख्स को जरूर तलाशें जिससे बात करके आपको सही रास्ता दिखे|"
अपने गले में पड़ी एक माला उतार कर उसने उनको पहना दी और उनके गले लग गया| उसका हरा कुरता उनके सफ़ेद शर्ट से मिलकर केशरिया रंग का दिखने लगा था|

समय के साथी--

बहुत कुछ बरस रहा था उनके मन में , शायद बाहर बरसते सावन से भी ज्यादा । लोग कुछ कर तो सकते नहीं , पर ऊँगली जरूर उठा सकते हैं । पिछला ३० वर्ष उनकी आँखों से गुजर गया । बच्चे छोटे थे तभी उनकी माँ गुजर गयी थी लेकिन दूसरी शादी नहीं की उन्होंने कि पता नहीं कैसा व्यवहार करे इन बच्चों के साथ । समय के साथ वो बड़े हुए और एक एक करके विदेश निकल गए । छोड़ गए उनको यहाँ विधवा शांता बाई की देख रेख में जो उनके लिए सब कुछ करती ।
कुछ ही महीनों पहले शांता बाई को भी बच्चों ने निकाल फेंका घर से , तब से वो यहीं रहने लगी । लेकिन लोगों की जबान का क्या , जितने मुँह , उतनी बातें । फोन पर बेटा भी कई बार इशारा कर चुका था कि लोग क्या कह रहे हैं , लेकिन उन्होंने टाल दिया था ।
आज जब बेटे ने फिर से फोन पर कहा कि उसे घर में क्यों रखा है तो उनके सब्र का बांध टूट गया । बेटे को तो उन्होंने अच्छे से समझा दिया कि अगर वो यहाँ नहीं रह सकता तो यहाँ की फिक्र भी ना करे । और ये तंय कर लिया कि , उसे छाँव जरूर देना है जिसने उनके सुःख दुःख में साथ दिया है ।

नयी कोंपल--

सुबह वो जैसे ही बाहर निकला , पिताजी को बगीचे की घास साफ़ करते देख दंग रह गया | ये क्या हो गया उनको , अच्छे भले तो घर में रहते हैं और किसी काम को करने के लिए कहा भी नहीं जाता उनको , फिर ये अचानक क्या हुआ |
" पापा , क्या कर रहे हैं आप , किसने कहा आपको ये सब करने को | ६० साल तक तो आपने खूब काम किया , अब तो आपके आराम करने के दिन हैं , लाईये दीजिये इसे ", कहते हुए उसने उनके हाथ से खुरपा ले लिया |
" मुझे किसी ने नहीं कहा लेकिन मुझे खुद लग रहा था कि मैं अनुपयोगी होता जा रहा हूँ | बाहर जाने नहीं देते कि कहीं गिर पड़ न जाऊँ, कोई काम करने नहीं देते तुम लोग , और सब्जी तक नहीं लाने देते कि लोग क्या कहेंगे "|
" अगर ऐसी बात है तो आज से ही इस गार्डन की जिम्मेदारी आपकी , आप जो करना चाहें , कीजिये यहाँ "|
बगीचे के फूलों से कम नहीं लग रही थी पापा के चेहरे की मुस्कान , उसे लगा जैसे बगीचे के किनारे वाले बूढ़े पेड़ पर नयी कोंपलें आ गयी हैं |

मार्गदर्शन-

आज एक बार फिर उनका कोचिंग संस्थान सुर्ख़ियों में था , बहुत से बच्चे हालिया संपन्न प्रतियोगिता परीक्षा में सफल हुए थे | कई बच्चों के अभिभावक इकट्ठा थे और उनको दिल से धन्यवाद दे रहे थे | बच्चे भी नतमस्तक थे उनके समर्पण और मार्गदर्शन से क्योंकि किस बच्चे को किस तरह की तैयारी करानी है , ये उनको बखूबी पता था |
एक बेहद गरीब बच्चे के पिता ने उनका हाथ पकड़ा और उसकी आँखों से आंसू बह निकले " आपका ये एहसान हम जिंदगी भर नहीं भूल पाएंगे , हम तो सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि हमारा बच्चा भी कुछ बन पायेगा लेकिन !"|
" अरे , शिक्षक का तो फ़र्ज़ है बच्चों को उनकी मंज़िल तक पहुँचाना ", और मुस्कुरा कर उन्होंने हाथ जोड़ दिया |
दूसरे शहर में पढ़ते अपने बेटे को तो ड्रग्स से नहीं बचा पाये थे | इसलिए अंतिम सांस तक बच्चों को सही मार्गदर्शन देकर मंज़िल तक पहुँचाना ही अब उनका प्रायश्चित था |

बच्चा--

जैसे ही वो घर में घुसा , पत्नी का तमतमाया चेहरा देख कर समझ गया कि आज भी बाबूजी ने कुछ गड़बड़ किया है। कितनी बार उसको समझा चुका है कि अब उनकी उम्र काफी हो गयी है और ऐसे में उनका अपने ऊपर काबू नहीं रहता, लेकिन वो समझती ही नहीं। उसे देखते ही उसने ऊँची आवाज़ में चिल्लाना शुरू कर दिया जिसे अनसुना करके वो सीधे बाबूजी के कमरे में घुस गया। उम्मीद के अनुरूप ही उनका बिस्तर गीला था और वो लाचारी से उसकी तरफ देख रहे थे। उसने सहारा देकर उनको कुर्सी पर बैठाया और चद्दर उतारकर नया चद्दर बिछा दिया।
बाबूजी को वापस लिटाकर वो बेडरूम में गया और कपड़े बदल रहा था कि बच्चे के रोने से उसका ध्यान बंट गया। उसने भी कपड़ा गीला कर दिया था और उसे दिक्क़त महसूस हो रही थी। अचानक उसने बच्चे पर जोर जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया, पत्नी भागते हुए अंदर आई और उस पर भड़क गयी।
" क्या हो गया है तुमको, इतना भी नहीं सोचते कि वो बच्चा है और उसे कुछ समझ नहीं आता अभी ", और उसने बच्चे को उठाकर सीने से लगा लिया।
उसने पत्नी की तरफ देखते हुए शांत स्वर में कहा " बाबूजी को भी अब समझ में नहीं आता है ", और बाहर निकल गया।

बदलती सोच --

उसका दिल बहुत भर आया था आज , ऐसे लोगों को चुना था हमने | जिनसे उम्मीद थी कि वो लड़ेंगे हमारे लिए , वो तो अपने लिए ही लड़ते हैं | सिर्फ अपनों का ख्याल और समाज को ठेंगे पर रखना , शायद यही आज की राजनीति रह गयी है | लेकिन क्या सारी गलती उनकी ही है , हम भी तो नहीं उतरना चाहते इस कार्य में , गलत और गन्दा समझते हैं इसे | फिर तो शायद यही होगा , गलत जगह गलत लोग जायेंगे तो गलत ही करेंगे |
एक निश्चय पनपने लगा उसके दिमाग में , इस बार वो खुद लड़ेगा चुनाव और जूझेगा इस गन्दी व्यवस्था से | क्या होगा अगर हार जायेगा , जमानत भी नहीं बचेगी उसकी लेकिन ये बोझ तो नहीं रहेगा सीने पर कि खुद क्यूँ नहीं किया कुछ |
हाँ , अब इस सोच से बाहर निकलना होगा कि ये जगह गन्दी है तो हम नहीं जायेंगे | सफाई करना भी तो हमारी ही जिम्मेदारी है और गलत का विरोध करना भी | और इस व्यवस्था के अंदर रहकर विरोध करना ज्यादा कारगर होगा , सोचते हुए उसने टी वी बंद किया और बाहर की खुली हवा में सांस लेने निकल गया|

देने का सुख--

दिन भर की पिकनिक के बाद लौटते समय बच्चों ने पिज़्ज़ा खाने के लिए कहा लेकिन मना कर देने से बहुत उदास थे । त्यौहार के दिन उदासी ठीक नहीं लग रही थी , अचानक उसके दिमाग में कुछ आया और उसने बच्चों को कुछ रुपये दिए और उनको सोसाइटी के गेट कीपर्स को दे आने के लिए कहा ।
लौट कर आने के बाद बच्चों का चेहरा खिला हुआ था , कुछ देने के बाद पाने वाले के चेहरे की ख़ुशी ने अपनी फरमाईस पूरी न होने से हुई उदासी को बहुत पीछे छोड़ दिया था ।

पुराना दर्द --

आज फिर से पुराना दर्द उभर आया था , किसी तरह से प्रयास करके पास के मेज पर रखी दवा खायी और बिस्तर पर लेट गया | किनारे वाली अलमारी में रखा फोटो धूल खाकर काफी जर्द हो गया था लेकिन फिर भी उसे देखकर एक मुस्कान खिंच आती थी उसके चेहरे पर | ये लगभग बीस साल पहले की फोटो थी जब बेटा विदेश जा रहा था | उसी के पीछे उसकी और पत्नी की भी तस्वीर भी रखी थी जिसमे दोनों ऐसे बैठे थे जैसे जबरदस्ती बैठाये गए हों |
हां , जबरदस्ती ही तो बैठाये गए थे दोनों क्यूंकि उसने कभी भी पत्नी को स्वीकार नहीं किया था | न तो वो उसकी अपनी कल्पना के अनुरूप थी और न हीं माँ पिता की अवहेलना कर सकता था | पर एकलौते पुत्र पर सब कुछ लगा कर जैसे वो कुछ साबित करना चाहता था | पत्नी ने कई बार दबी जबान में कहा भी कि एकलौता है तो क्या , उसकी हर जिद्द मत पूरा करो , लेकिन जितना ही वो कहती , उतना ही वो उसको खुली छूट देता गया | बेटा आगे बढ़ता गया , पत्नी की जिंदगी पीछे छूटती गयी , एक समय आया जब बेटा बाहर किसी और देश निकला और पत्नी ने भी किसी और दुनिया में जाने की राह पकड़ ली | फिर जैसे जैसे बेटे से बातचीत घटने लगी , वैसे वैसे उसे पत्नी की उपस्थिति महसूस होने लगी | लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और उसने अपनी अलग दुनियां में जाने की तैयारी कर ली थी |
पत्नी के अंतिम संस्कार में बेटा आया तो जरूर था लेकिन उसके हाव भाव ने जाहिर कर दिया था कि अब यहाँ उसका कुछ नहीं रहा | उसकी बात करने की हर कोशिश को नकारता हुआ बेटा उसकी बात काटकर बाहर निकल जाता | जल्दी जल्दी सब निपटाकर बेटा निकल गया और छोड़ गया उसके लिए वो सूनापन जिसे कभी उसने पत्नी के लिए रख छोड़ा था |
एकबार फिर वो उठा , अपनी और पत्नी की तस्वीर उठाकर उसकी धूल साफ़ की और धीरे से उसे आगे रख दिया | अब अपने सीने पर पड़े बोझ से उसे थोड़ी राहत महसूस होने लगी |

नफ़रत की हार--

जेल से बाहर निकलते ही पुरानी बातें जेहन में ताज़ा हो गयीं । एक एक से गिन गिन के बदला लेगा और खासकर अपने उस पड़ोसी रहमत को तो किसी हाल में जिन्दा नहीं छोड़ेगा । आखिर उसी की गवाही पर तो जेल हुई थी नहीं तो मज़ाल थी किसी और की उसके ख़िलाफ़ जाने की । उस दंगों के माहौल में तो उसे सारे विधर्मी ही जान के दुश्मन दिखाई देते थे और जेल के ५ सालों में भी यही सब सीखता रहा था वो ।
अपने पुराने जरायम के दिनों के साथी के यहाँ से उसने हथियार लिया और चल पड़ा अपने पुराने मोहल्ले की ओर । लेकिन ये जगह तो कुछ और ही लग रही थी , एक स्कूल खुल गया था उस जगह जहाँ उसने आगजनी की थी और फिर उसकी निगाह पड़ी उस बच्ची पर जो एक बुज़ुर्ग को पानी पिला रही थी । जैसे जैसे उस बच्ची के बोतल से पानी उन बुज़ुर्ग की बोतल में गिर रहा था , वैसे वैसे उसकी नफ़रत की आग पर पानी पड़ रहा था । उसकी पकड़ हथियार पर ढीली पड़ गयी , एक बच्चे का निश्छल प्यार उसकी नफ़रत पर कई गुना भारी पड़ गया था ।

सुकून--

" तू आ गया मेरा बच्चा ", कांपते हांथों और धुंधलाई आँखों से देखते हुए माँ के हाथ उसके चेहरे पर घूम रहे थे | अचानक उसकी आँखों से टपकी बूँद माँ के हथेली पर पड़ी और माँ ने उसकी आँख पोंछ दी |
" रोते नहीं मेरे बच्चे , तू आ गया , अब मुझे चैन की सांस मिली | अब सुकून से तेरे पापा के पास जा पाऊँगी ", कहते हुए माँ ने एक बार फिर अपना हाथ उसके सर पर फेर दिया | पता नहीं कितनी देर तक उसने माँ का हाँथ अपने हांथों में थामे रखा , उसके अश्क़ माँ का दामन भिगोते रहे | अपना पिछला जीवन उसकी सोच में गुजरता गया , सब कुछ तो पा लिया था उसने, बढ़िया नौकरी , खुशहाल परिवार , लोगों की रेलपेल और प्रदूषण से मुक्त ये नया देश | फिर भी एक कमी सी क्यूँ हमेशा रहती थी उसके अंदर, आज माँ के हाथ जैसे उसे बता रहे थे | माँ के हाँथ तो हमेशा थे उसके सर पर लेकिन उसके हाँथ नहीं थे माँ के हांथों में |
उसने गौर से माँ के चेहरे को देखा, वो कितनी संतुष्ट दिखाई दे रही थी | आखिर उसके पापा के पास जाते समय अपने बच्चे का हाथ जो था उसके हाथों में |

जीतने का जज़्बा--

हाथ में ड्रिप से बूँद बूँद खून चढ़ रहा था और जिंदगी भी हौले हौले मौत को दूर खदेड़ रही थी | अर्धबेहोशी की हालत में भी उसकी तन्द्रा जैसे बरकरार थी , यूँ लगता था जैसे वापस तैयारी कर रहा हो जंग लड़ने की | एक पैर उड़ चूका था और शरीर बुरी तरह जख्मी , लेकिन दो आतंकवादियों को मार गिराने का गर्व जैसे उसके चेहरे पर चमक रहा था | ऐसा मरीज अब तक नहीं देखा था उस हस्पताल में डॉक्टरों ने जो मौत को इस तरह खुले आम चुनौती दे रहा हो | उन्होंने तो सोचा भी नहीं था कि यह जख्मी मरीज कुछ मिनट भी जीवित रहेगा |
डॉक्टर ने एक बार फिर नब्ज चेक की और एक और दवा का इंजेक्शन ड्रिप में लगा दिया | अगल बगल के बिस्तरों पर पड़े मरीज जो कल तक अपने दर्द से पूरे वार्ड को ग़मज़दा रखते थे , आज खामोश थे | वहाँ खड़े अधिकारी ने डॉक्टर से बात की और उसे महानगर के सुपर स्पेशियलिटी हस्पताल में ले जाने की तैयारी में लग गए | जैसे ही कुछ जवान उसे स्ट्रेचर पर डाल कर ले जाने लगे और वहाँ मौजूद हर शख्स के हाथ उसके जज़्बे को सलाम करने के लिए उठ गए |

कीचड़ का सुख--

आज आसमान में बादल दिखे तो हरई का मन हरा होने लगा था| लगभग २५ दिन हो गए थे और बारिश का कहीं नामोनिशान नहीं था| खेत में बुवाई के लिए काफी देर हो गयी थी लेकिन बिना पानी के बुवाई कैसे होती| खेत की जुताई के पैसे भी नहीं थे लेकिन उसने सोच रखा था कि बारिश हुई तो खुद ही फावड़े से खुदाई कर डालेगा| उसने दरवाजे पर पड़ी कुदाल उठाई और खेत की ओर निकल पड़ा| चारो तरफ फैले उदासी को चीरता हुआ वह गाँव के बाहर निकला और खेत में पहुंच गया|
एक बार आसमान की तरफ देखा उसने और जोर से फावड़ा चला दिया| ज़मीन तो जैसे पत्थर हो गयी थी और फावड़ा जोर की आवाज़ करता हुआ छटक गया| एक बार फिर उसने फावड़ा उठाया और उसी जगह फिर से चला दिया, अब थोड़ी मिटटी निकल आई थी| उसकी हिम्मत बढ़ी और फिर वो एक के बाद एक फावड़ा चलाने लगा , मिटटी ढीली होने लगी| थोड़ी थोड़ी देर में वो आसमान की ओर देखता , बादल तो बदस्तूर छाये थे लेकिन बारिश गायब| अब उसकी हिम्मत धीरे धीरे जवाब देने लगी, लेकिन उसने फावड़ा चलाना नहीं छोड़ा| शरीर पसीने और गर्मी से बदहाल हो गया , लेकिन उसे इंतज़ार था ऊपर से बरसने वाले पानी का जो उसके साथ साथ खेत की भी प्यास बुझाए|
एकदम से उसका फावड़ा एक पत्थर से टकराया और छिटक कर दूर जा गिरा| उसने निराशा से दूर पड़े फावड़े की ओर देखा और वहीँ बैठ गया| कुछ ही देर में उसे कुछ बूंदों का आभास हुआ जो ऊपर से गिर रहीं थी, उसकी मेहनत पर मानो प्रकृति भी अपनी स्वीकृति की मुहर लगा रही थी| अब पानी बरस रहा था और उसके आवाज़ के साथ उसका फावड़ा भी सम्मिलित स्वर निकाल रहा था| उस कीचड़ की शीतलता उसके तन के साथ साथ मन को भी आह्लादित कर रही थी|