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Monday, January 25, 2016

कुछ ग़ज़लें--

जब भी ढलता है सूरज, याद आते हो
जब भी मिलती है सूरत, याद आते हो
यूँ तो हर वक़्त गुम हूँ, फ़साने में अपने
जब भी मिलती है फ़ुरसत, याद आते हो
ढूँढ लाते हैं मिलकर , जमीं पर सितारे
जब भी दिखती है ग़ुरबत, याद आते हो
जब भी ढलता है सूरज, याद आते हो
जब भी मिलती है सूरत, याद आते हो !!
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मदद को भी ये एहसान बनाके रख देंगे
फ़र्ज़ को भी ये इम्तहान बनाके रख देंगे
मर्ज़ी गर चलने लगे इन हुक्मरानों की
जहाँ को भी ये शमशान बनाके रख देंगे
गूंजती है चहचहाहट आज भी इस बाग़ में
ख़ूनी शिकारी इसे वीरान बनाके रख देंगे
फिक्र भी तो कीजिये प्यारे वतन की अब
वर्ना किसी रोज मेहमान बनाके रख देंगे
मदद को भी ये एहसान बनाके रख देंगे
फ़र्ज़ को भी ये इम्तहान बनाके रख देंगे !!
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जब भी मिलते हैं, मुस्कुराते हैं
दिल का ये दर्द, यूँ छुपाते हैं
कोई चेहरे को पढ़ नहीं पाये
ऐसी मासूमियत, दिखाते हैं
दर्द कितने भी हों तरानों में
गीत खुशियों के ही वो गाते हैं
जब भी खाते हैं इक नया धोखा
आँख बहती हैं, खिलखिलाते हैं
जब भी मिलते हैं, मुस्कुराते हैं
दिल का ये दर्द, यूँ छुपाते हैं !!
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जब भी वो इस मकाँ से उठता है
गोया वो , आसमाँ से उठता है
करता है नेकी जो दुनियाँ में
बाखुदा, इस जहाँ से उठता है
वक़्त गुज़रा है पर नहीं समझे
कौन इस बागबाँ से उठता है
आग दिखती नहीं मकानों से
ये धुआँ सा, कहाँ से उठता है
जब भी वो इस मकाँ से उठता है
गोया वो , आसमाँ से उठता है !!
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वक़्त मिलता तो खुद को आजमाते
कौन दुश्मन है, ये समझ जाते
जख्म देते हैं चाहने वाले
इश्क़ करते तो ये समझ जाते
राह काँटों से भरी होती है
उसपे चलते तो ये समझ जाते
मेरा ही अक्स उनमें दिखता है
उनसे मिलते तो ये समझ जाते
लोग दौलत से परेशां क्यूँ हैं
अख्ज़ होते तो ये समझ जाते
वक़्त मिलता तो खुद को आजमाते
कौन दुश्मन है, ये समझ जाते !!
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ये ज़माने की रवायत है , परेशान न हो
लोगों की यूँ ही आदत है , परेशान न हो
ज़ख्म तो मिलते ही रहते हैं अब अपनों से
दोस्तों की ये हक़ीक़त है , परेशान न हो
बात तो उनकी ही होती है, जो क़ाबिल हैं
किसी अपने की नसीहत है , परेशान न हो
नहीं दिखते हैं नकाबों में असली चेहरे
हर तरफ आज ये हालात है , परेशान न हो
ये ज़माने की रवायत है , परेशान न हो
लोगों की यूँ ही आदत है , परेशान न हो !!

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