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Wednesday, January 6, 2016

हक़--

एक बार और उसने जोर लगाया और खड़ा हो गया , जब तक भीड़ कुछ समझे वो अपनी पूरी ताकत लगा कर भागा। कपड़े फट चुके थे और शरीर खून से सराबोर लेकिन फिर भी न जाने कहाँ से दम आ गया था उसमे भागने का। किसी भी तरह से इस भीड़ से निकल भागना चाहता था वो, अपने बच्चे के लिए, अपने बूढ़े बाप के लिए, बीमार पत्नी के लिए और अपने गाँव के लिए जिसे वो छोड़ कर यहाँ आया था कि अपने परिवार का भरण पोषण कर सके।
अपना घर छोड़ने का फैसला आसान नहीं था उसके लिए, गाँव में एक झोपड़ा था उसका , थोड़े से खेत भी थे। पिता अब लाचार हो गए थे और बिस्तर पर पड़े रहते, उसकी पत्नी पूरा ख्याल रखने की कोशिश करती उनका। बेटा भी अब स्कूल जाने लायक हो गया था और सब ठीक ही चल रहा था। लेकिन अचानक पत्नी बीमार पड़ी और उसकी दवा में जो थोड़े खेत थे वो भी चले गए। इलाज़ लम्बा चलना था तो पैसों के इंतज़ाम लिए शहर आ गया। तमाम बनते मकानों ने उसको ठिकाना और दो पैसे देने शुरू कर दिए और वो सुनहरे भविष्य की आस में वहीँ रुक गया। थोड़े पैसे इकट्ठे हो गए थे और कुछ दिन बीत भी गए थे तो वो सुबह गाँव निकलने की सोच कर सो गया।
सुबह शोर सुनकर उसकी आँख खुली और उसने झट से अपना बैग उठा लिया। उस अधबने मकान से जैसे ही बाहर निकला, एक भीड़ ने उसे घेर लिया और जबतक कुछ समझे, लोग उसके ऊपर लाठी डंडे चलाने लगे। कुछ लोगों के हाथ में उसका कपड़ा आया और वो भी तार तार हो गया, अब तक उसे समझ आ गया था कि अगर वो भागा नहीं तो उसका बचना मुश्किल है। बैग को हाथ में पकड़े हुए वो भागा तभी एक इंट का टुकड़ा उसके सर पर लगा और वह जमीन पर गिर पड़ा।
थोड़ी देर में ही उसकी सांस उसका साथ छोड़ने लगी, लेकिन पीछे से आता शोर उसे भागने की ताक़त दे रहा था। उसने एक बार पलट के देखा और फिर दुगने ताक़त से भागा, ऐसा लग रहा था जैसे उसका परिवार उसकी ताक़त बन गया था। जैसे जैसे वो शहर के बाहर निकलता गया, उसकी पकड़ अपने बैग पर मजबूत होती गयी। आखिर इस बैग पर उसके परिवार का हक़ जो था।  
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एक बार और उसने जोर लगाया और खड़ा हो गया , जब तक भीड़ कुछ समझे वो अपनी पूरी ताकत लगा कर भागा। कपड़े फट चुके थे और शरीर खून से सराबोर लेकिन फिर भी न जाने कहाँ से दम आ गया था उसमे भागने का। किसी भी तरह से इस भीड़ से निकल भागना चाहता था वो, अपने बच्चे के लिए, अपने बूढ़े बाप के लिए, बीमार पत्नी के लिए और अपने गाँव के लिए जिसे वो छोड़ कर यहाँ आया था कि अपने परिवार का भरण पोषण कर सके।
अपना घर छोड़ने का फैसला आसान नहीं था उसके लिए, गाँव में एक झोपड़ा था उसका , थोड़े से खेत भी थे। पिता अब लाचार हो गए थे और बिस्तर पर पड़े रहते, उसकी पत्नी पूरा ख्याल रखने की कोशिश करती उनका। बेटा भी अब स्कूल जाने लायक हो गया था और सब ठीक ही चल रहा था। लेकिन अचानक पत्नी बीमार पड़ी और उसकी दवा में जो थोड़े खेत थे वो भी चले गए। इलाज़ लम्बा चलना था तो पैसों के इंतज़ाम लिए शहर आ गया। तमाम बनते मकानों ने उसको ठिकाना और दो पैसे देने शुरू कर दिए और वो सुनहरे भविष्य की आस में वहीँ रुक गया। थोड़े पैसे इकट्ठे हो गए थे और कुछ दिन बीत भी गए थे तो वो सुबह गाँव निकलने की सोच कर सो गया।
सुबह शोर सुनकर उसकी आँख खुली और उसने झट से अपना बैग उठा लिया। उस अधबने मकान से जैसे ही बाहर निकला, एक भीड़ ने उसे घेर लिया और जबतक कुछ समझे, लोग उसके ऊपर लाठी डंडे चलाने लगे। कुछ लोगों के हाथ में उसका कपड़ा आया और वो भी तार तार हो गया, अब तक उसे समझ आ गया था कि अगर वो भागा नहीं तो उसका बचना मुश्किल है। बैग को हाथ में पकड़े हुए वो भागा तभी एक इंट का टुकड़ा उसके सर पर लगा और वह जमीन पर गिर पड़ा।
थोड़ी देर में ही उसकी सांस उसका साथ छोड़ने लगी, लेकिन पीछे से आता शोर उसे भागने की ताक़त दे रहा था। भागते भागते एक एक करके सबका चेहरा उसके सामने गुजरने लगा, मुस्कुराता बेटा, चेहरे पर पीली मुस्कान लिए पत्नी, उदास पिता और हरा भरा गाँव का रास्ता| उसने एक बार पलट के देखा और फिर दुगुने ताक़त से भागा, ऐसा लग रहा था जैसे उसका परिवार उसकी ताक़त बन गया था। अचानक सामने से आती भीड़ से एक गोली निकली और वो कटे पेड़ की तरह लुढक गया|
भीड़ किसी और तरफ जा चुकी थी, उसका शरीर औंधे मुह खून से तरबतर पड़ा था| लेकिन उसकी पकड़ अपने शरीर के नीचे दबे बैग पर उसी तरह मजबूत थी, आखिर इस बैग पर उसके परिवार का हक़ जो था।    

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