आज आसमान में बादल दिखे तो हरई का मन हरा होने लगा था| लगभग २५ दिन हो गए थे और बारिश का कहीं नामोनिशान नहीं था| खेत में बुवाई के लिए काफी देर हो गयी थी लेकिन बिना पानी के बुवाई कैसे होती| खेत की जुताई के पैसे भी नहीं थे लेकिन उसने सोच रखा था कि बारिश हुई तो खुद ही फावड़े से खुदाई कर डालेगा| उसने दरवाजे पर पड़ी कुदाल उठाई और खेत की ओर निकल पड़ा| चारो तरफ फैले उदासी को चीरता हुआ वह गाँव के बाहर निकला और खेत में पहुंच गया|
एक बार आसमान की तरफ देखा उसने और जोर से फावड़ा चला दिया| ज़मीन तो जैसे पत्थर हो गयी थी और फावड़ा जोर की आवाज़ करता हुआ छटक गया| एक बार फिर उसने फावड़ा उठाया और उसी जगह फिर से चला दिया, अब थोड़ी मिटटी निकल आई थी| उसकी हिम्मत बढ़ी और फिर वो एक के बाद एक फावड़ा चलाने लगा , मिटटी ढीली होने लगी| थोड़ी थोड़ी देर में वो आसमान की ओर देखता , बादल तो बदस्तूर छाये थे लेकिन बारिश गायब| अब उसकी हिम्मत धीरे धीरे जवाब देने लगी, लेकिन उसने फावड़ा चलाना नहीं छोड़ा| शरीर पसीने और गर्मी से बदहाल हो गया , लेकिन उसे इंतज़ार था ऊपर से बरसने वाले पानी का जो उसके साथ साथ खेत की भी प्यास बुझाए|
एकदम से उसका फावड़ा एक पत्थर से टकराया और छिटक कर दूर जा गिरा| उसने निराशा से दूर पड़े फावड़े की ओर देखा और वहीँ बैठ गया| कुछ ही देर में उसे कुछ बूंदों का आभास हुआ जो ऊपर से गिर रहीं थी, उसकी मेहनत पर मानो प्रकृति भी अपनी स्वीकृति की मुहर लगा रही थी| अब पानी बरस रहा था और उसके आवाज़ के साथ उसका फावड़ा भी सम्मिलित स्वर निकाल रहा था| उस कीचड़ की शीतलता उसके तन के साथ साथ मन को भी आह्लादित कर रही थी|
एक बार आसमान की तरफ देखा उसने और जोर से फावड़ा चला दिया| ज़मीन तो जैसे पत्थर हो गयी थी और फावड़ा जोर की आवाज़ करता हुआ छटक गया| एक बार फिर उसने फावड़ा उठाया और उसी जगह फिर से चला दिया, अब थोड़ी मिटटी निकल आई थी| उसकी हिम्मत बढ़ी और फिर वो एक के बाद एक फावड़ा चलाने लगा , मिटटी ढीली होने लगी| थोड़ी थोड़ी देर में वो आसमान की ओर देखता , बादल तो बदस्तूर छाये थे लेकिन बारिश गायब| अब उसकी हिम्मत धीरे धीरे जवाब देने लगी, लेकिन उसने फावड़ा चलाना नहीं छोड़ा| शरीर पसीने और गर्मी से बदहाल हो गया , लेकिन उसे इंतज़ार था ऊपर से बरसने वाले पानी का जो उसके साथ साथ खेत की भी प्यास बुझाए|
एकदम से उसका फावड़ा एक पत्थर से टकराया और छिटक कर दूर जा गिरा| उसने निराशा से दूर पड़े फावड़े की ओर देखा और वहीँ बैठ गया| कुछ ही देर में उसे कुछ बूंदों का आभास हुआ जो ऊपर से गिर रहीं थी, उसकी मेहनत पर मानो प्रकृति भी अपनी स्वीकृति की मुहर लगा रही थी| अब पानी बरस रहा था और उसके आवाज़ के साथ उसका फावड़ा भी सम्मिलित स्वर निकाल रहा था| उस कीचड़ की शीतलता उसके तन के साथ साथ मन को भी आह्लादित कर रही थी|
No comments:
Post a Comment