मिश्रजी के छत पर पतंगे उड़ रही थीं, मकर संक्रान्ति का अवसर था और उनके बेटे के लिए इसके बिना रह पाना लगभग नामुमकिन ही था। पतंगें तो तक़रीबन हफ़्ता भर पहले से ही उड़ने लगती थीं और इस बार भी कुछ ऐसा ही था बस एक फ़र्क़ था, अहमद भाई का बेटा नहीं था उसके साथ। पिछले कई सालों से दोनों साथ साथ एक ही छत से पतंगें उड़ाते थे और उनका प्यार पतंग के डोर जैसा ही था जिसे जुदा कर पाना बहुत मुश्किल था। पूरे मुहल्ले की पतंगें दोनों मिलकर काटा करते थे और रह रह कर "भा कटे" की आवाज़ गूँजती रहती थी। एक दूसरे से सटा हुआ उनका घर सभी त्यौहार लगभग एक साथ ही मनाता था, एक बकरीद छोड़ कर। मिश्रजी शुद्ध शाकाहारी थे, हाँ बच्चों के बारे में ये नहीं कहा जा सकता था। एक अलिखित समझौता दोनों घरों के बीच था कि अहमद भाई के यहाँ जो भी पके, गोस्त या हड्डी मिश्रजी के घर की तरफ नहीं आनी चाहिए। ये समझौता पता नहीं कितने सालों से अछुण्ण था और सब कुछ सामान्य चल रहा था।
जब से प्रदेश में मंदिर मस्जिद विवाद हुआ था तबसे उनके शहर और मुहल्ले में भी एक अनदेखा और अन्जाना तनाव छाने लगा था। बाहर से तो कुछ भी नहीं दिखता था लेकिन अब दोनों को कुछ अंदेशा रहने लगा था। पहले भी कई मौलवी अहमद भाई के घर आया करते थे लेकिन मिश्रजी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। ऐसा ही कुछ अहमद भाई के साथ भी था लेकिन अब ऐसे लोगों के आने पर कुछ अजीब सा लगने लगा था दोनों को। अहमद भाई के यहाँ जो कुत्ता था वो दोनों घरों में बेरोकटोक घूमता था और मिश्रजी की गाय को रोटी अहमद भाई के यहाँ से भी आती थी। लेकिन अब पता नहीं क्यूँ अहमद भाई अपने कुत्ते को बाँधने लगे थे और रोटियाँ भी कम ही भेजते थे गाय के लिए। हाँ आपस की बातचीत में दोनों ही सामान्य बनने की पूरी कोशिश करते और ऐसा जताते जैसे कुछ भी तो नहीं बदला है।
संक्रान्ति से करीब एक महीना पहले अहमद भाई के घर गोश्त बना और कुत्ते को भी दिया गया था। बहुत दिन बाद उसे खुला छोड़ दिया तो वो पता नहीं कब गोश्त का टुकड़ा लेकर मिश्रजी के घर घुस गया। कुछ देर बाद वो वापस आ गया और अहमद भाई ने उसे बांध दिया। अगली सुबह मिश्रजी के चिल्लाने से उनकी आँख खुली और जैसे ही वो बाहर आये, मिश्रजी ने उनकी लानत मलामत करनी शुरू कर दी। थोड़ी देर बाद ही उनको समझ आया कि कुत्ते के चलते एक हड्डी मिश्रजी के बरामदे में पड़ी हुई थी और मिश्रजी इसे जानबूझ कर की गयी हरक़त समझ बैठे। अहमद भाई ने उनको समझाने की बहुत कोशिश की, माफ़ी भी मांगी लेकिन शीशे में पड़ी दरार पर ज्यादा जोर पड़ चुका था और शीशा चटक गया। उन दोनों के बच्चे भी स्थिति को समझ नहीं पाये और उन्होंने भी आपस में दूरी बना ली।
नया साल आया और दोनों परिवारों ने एक दूसरे को ज़बानी मुबारकवाद नहीं दी, हाँ मोबाइल से सन्देश जरूर भेज दिया था दोनों ने। अब संक्रान्ति पास आ रही थी और दोनों ही परिवार के बेटे अपने अपने छत पर पतंगें उड़ाने लगे, बस एक दूसरे की पतंगें काटते नहीं थे। मुहल्ले के बच्चे अब उनकी पतंगें भी काटने लगे थे और इसका अफ़सोस दोनों को ही हो रहा था लेकिन फिर भी दोनों छतों से पतंगें अलग अलग उड़ रहीं थीं। आज संक्रान्ति के दिन अहमद भाई भी छत पर आ गए और बेटे को पतंग उड़ाते और कटाते देखते रहे। थोड़ी देर बाद उनकी नज़र मिश्रजी के छत पर गयी जहां उनका बेटा अकेले पतंग उड़ा रहा था तो उनके दिल में कुछ चुभ सा गया। कुछ सोचकर उन्होंने अपने बेटे से पतंग की डोर ली और पतंग को मिश्रजी की छत की ओर उड़ा दी, उनकी पतंग ने एक दो बार हवा में गोता लगाया और फिर उन्होंने अपनी पतंग जानबूझकर कटवा दी। कटती पतंग पर मिश्रजी की भी नज़र पड़ी और उन दोनों के मुह से बेशाख्ता निकल गया " भा कटे ।" थोड़ी देर में ही दोनों बेटे साथ साथ पतंग उड़ा रहे थे और मोहल्ले के बच्चों की कटती पतंगों के साथ साथ "भा कटे" का सम्मिलित शोर उनकी छत से निकल रहा था।
जब से प्रदेश में मंदिर मस्जिद विवाद हुआ था तबसे उनके शहर और मुहल्ले में भी एक अनदेखा और अन्जाना तनाव छाने लगा था। बाहर से तो कुछ भी नहीं दिखता था लेकिन अब दोनों को कुछ अंदेशा रहने लगा था। पहले भी कई मौलवी अहमद भाई के घर आया करते थे लेकिन मिश्रजी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। ऐसा ही कुछ अहमद भाई के साथ भी था लेकिन अब ऐसे लोगों के आने पर कुछ अजीब सा लगने लगा था दोनों को। अहमद भाई के यहाँ जो कुत्ता था वो दोनों घरों में बेरोकटोक घूमता था और मिश्रजी की गाय को रोटी अहमद भाई के यहाँ से भी आती थी। लेकिन अब पता नहीं क्यूँ अहमद भाई अपने कुत्ते को बाँधने लगे थे और रोटियाँ भी कम ही भेजते थे गाय के लिए। हाँ आपस की बातचीत में दोनों ही सामान्य बनने की पूरी कोशिश करते और ऐसा जताते जैसे कुछ भी तो नहीं बदला है।
संक्रान्ति से करीब एक महीना पहले अहमद भाई के घर गोश्त बना और कुत्ते को भी दिया गया था। बहुत दिन बाद उसे खुला छोड़ दिया तो वो पता नहीं कब गोश्त का टुकड़ा लेकर मिश्रजी के घर घुस गया। कुछ देर बाद वो वापस आ गया और अहमद भाई ने उसे बांध दिया। अगली सुबह मिश्रजी के चिल्लाने से उनकी आँख खुली और जैसे ही वो बाहर आये, मिश्रजी ने उनकी लानत मलामत करनी शुरू कर दी। थोड़ी देर बाद ही उनको समझ आया कि कुत्ते के चलते एक हड्डी मिश्रजी के बरामदे में पड़ी हुई थी और मिश्रजी इसे जानबूझ कर की गयी हरक़त समझ बैठे। अहमद भाई ने उनको समझाने की बहुत कोशिश की, माफ़ी भी मांगी लेकिन शीशे में पड़ी दरार पर ज्यादा जोर पड़ चुका था और शीशा चटक गया। उन दोनों के बच्चे भी स्थिति को समझ नहीं पाये और उन्होंने भी आपस में दूरी बना ली।
नया साल आया और दोनों परिवारों ने एक दूसरे को ज़बानी मुबारकवाद नहीं दी, हाँ मोबाइल से सन्देश जरूर भेज दिया था दोनों ने। अब संक्रान्ति पास आ रही थी और दोनों ही परिवार के बेटे अपने अपने छत पर पतंगें उड़ाने लगे, बस एक दूसरे की पतंगें काटते नहीं थे। मुहल्ले के बच्चे अब उनकी पतंगें भी काटने लगे थे और इसका अफ़सोस दोनों को ही हो रहा था लेकिन फिर भी दोनों छतों से पतंगें अलग अलग उड़ रहीं थीं। आज संक्रान्ति के दिन अहमद भाई भी छत पर आ गए और बेटे को पतंग उड़ाते और कटाते देखते रहे। थोड़ी देर बाद उनकी नज़र मिश्रजी के छत पर गयी जहां उनका बेटा अकेले पतंग उड़ा रहा था तो उनके दिल में कुछ चुभ सा गया। कुछ सोचकर उन्होंने अपने बेटे से पतंग की डोर ली और पतंग को मिश्रजी की छत की ओर उड़ा दी, उनकी पतंग ने एक दो बार हवा में गोता लगाया और फिर उन्होंने अपनी पतंग जानबूझकर कटवा दी। कटती पतंग पर मिश्रजी की भी नज़र पड़ी और उन दोनों के मुह से बेशाख्ता निकल गया " भा कटे ।" थोड़ी देर में ही दोनों बेटे साथ साथ पतंग उड़ा रहे थे और मोहल्ले के बच्चों की कटती पतंगों के साथ साथ "भा कटे" का सम्मिलित शोर उनकी छत से निकल रहा था।
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