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Monday, January 25, 2016

टूटती जंजीरें--

" कैसे हिम्मत पड़ी तुम्हारी मेरे कमरे में आने की, दिमाग तो नहीं ख़राब हो गया तुम्हारा", एकदम से उबल पड़े शर्माजी| शरीर कमजोर हो चला था और अचानक इतना गुस्सा आया तो बर्दास्त नहीं हुआ और वहीँ गिर पड़े| दौड़ कर लक्खी ने उनको उठाया और बेड पर लिटा दिया, चेहरे पर पानी के छींटे डाले और भाग कर मालकिन को बुलाने चली गयी|
मालकिन ने ही कहा था उसे धीरे से देखने के लिए कि वो जग रहे हैं या सो गए हैं| कई सालों से काम कर रही थी वो उनके घर, लेकिन शर्माजी ने कभी भी उसे अपने कमरे में घुसने नहीं दिया| जमींदारी तो कबकी ख़त्म हो गयी थी लेकिन दिमाग मानने को तैयार नहीं होता था उनका| मालकिन समझदार थीं और उन्होंने लक्खी को काम पर रख लिया था, आखिर बच्चे तो पास रहते नहीं थे तो इसी का सहारा था| लेकिन उन्होंने उसको शर्माजी के कमरे में जाने से मना किया था, और उनका काम खुद ही किसी तरह कर देती थीं|
मालकिन ने धीरे से उनका सर अपने गोद में रखा, लक्खी उनको दवा पिलाने लगी| धीरे धीरे उनकी तन्द्रा वापस आने लगी और सामने लक्खी को देखकर एक बार फिर कुछ बोलने को हुए तभी मालकिन ने उनके मुँह पर अपना हाथ रख दिया| अब पहली बार शर्माजी को भी महसूस हो रहा था कि जैसे दवा लक्खी ने नहीं उनकी अपनी बेटी ने ही पिलाई हो| उन्होंने अपना हाथ लक्खी की तरफ बढ़ाया और उसकी खुरदुरी हथेली को पकड़ कर अपनी ऑंखें मूँद लीं| उनकी हथेली पर इस समय तीनों के आँखों से गिरे आँसू मिल कर एकाकार हो रहे थे|

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