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Friday, January 29, 2016

समाजसेवा--

" यहाँ की बेटियों को पढ़ाई के साथ साथ कुछ काम काज भी सिखाना जरुरी है जिससे कि बाहर जाकर ये कुछ काम कर सकें ", समाजसेवी धनपतजी ने भाषण समाप्त करते हुए कहा| उनके साथ एक दो और गणमान्य लोग केयर टेकर के साथ मौजूद थे| कार्यक्रम समाप्ति के पश्चात सभी लड़कियाँ उन लोगो के लिए नाश्ते के प्रबंध में जुट गयीं|
इस नारी निकेतन को धनपतजी ने कुछ दान दिया था और उसी सम्मान में ये छोटा सा कार्यक्रम रखा गया था| एक ट्रे में नाश्ता लेकर वो केयर टेकर के कमरे में गयी जहाँ धनपतजी आराम से लेटे हुए थे और केयर टेकर उनसे सट कर कुछ बात कर रही थी|
" ले आ यहीं नाश्ता", और वो नाश्ता लेकर धनपतजी के पास पहुंची| जैसे ही झुककर उसने नाश्ता रखा, धनपतजी की नज़र ने उसका एक्सरे कर डाला| यूँ तो उसे आदत थी ऐसे निगाहों की, लेकिन कुछ देर पहले के सम्बोधन "बेटियों" की वजह से उसे घृणा सी हो गयी|
" तू यहीं बैठ और नाश्ता करा इनको, मैं आती हूँ", कह कर केयर टेकर निकल गयी|
" कोई दिक्कत तो नहीं है यहाँ तुमको", कहते हुए धनपतजी ने उसका हाथ पकड़ा तो उसके शरीर में एक दम बिजली सी दौड़ गयी| अभी धनपतजी का हाथ कुछ और ऊपर जाता कि उसने पूरी ताक़त से एक थप्पड़ लगाया और अंगारे बरसाते हुए बोली " तुम्हारे जैसे लोगों के पाप का ही नतीजा है ये नारी निकेतन, कम से कम बेटी बोलकर एक बाप की इज़्ज़त तो मत लुटाओ"|
वो बाहर निकल गयी थी, धनपतजी अपने गाल सहला रहे थे|  

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