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Wednesday, January 6, 2016

मिलते रंग--

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उसने शाल ग्रहण किया और फिर कुछ कहने के लिए माइक पकड़ लिया| मन में जज्बातों का बवंडर आ जा रहा था क्यूंकि इस संस्था के साथ उसका जुड़ाव बहुत पुराना था| शुरुवाती दौर में जब वो अकेला दूसरे मज़हब का कर्मचारी था तो उसे थोड़ी घबराहट होती थी| लोग अगर किसी भी बारे में बात कर रहें हों , उसे लगता जैसे उसके ही बारे में बात हो रही है| हमेशा उसे चेहरे और पीठ पर लोगों की निगाहें चुभती महसूस होतीं| ऐसा नहीं था कि ये सब अकारण था, उसने सुना भी था कई बार उसके बारे में चर्चा होते हुए| लेकिन जब उससे बात होती तो लोग कुछ भी महसूस नहीं होने देते, तो वो सब भुलाने की कोशिश करता| इन वर्षों में कितनी ही बार धार्मिक तनाव हुआ और हर ऐसी घटना के बाद उसे लगता जैसे निगाहें और तेज चुभने लगी हैं| लेकिन हर बार उस कार्यालय में एक शख्स उसे तसल्ली देता था और हमेशा कहता था कि जितना तुम इन चीजों के बारे में सोचोगे, उतना ही ये चुभती नजरें महसूस होंगी| इन्हीं सब से गुजरता हुआ वो अपने कार्य में पूरी ईमानदारी से लगा रहा और आज सेवानिवृत्ति की तारीख भी आ गयी|
सबसे पहले उसने समस्त स्टाफ का धन्यवाद किया और फिर उपरवाले का शुक्रिया अदा किया| फिर उसने उस शख्स को बुलाया और उसका हाथ पकड़कर बोला " मेरे कश्मकश के समय में आपने जो सलाह दी, शायद उसी का नतीजा है कि मैं अपनी नौकरी पूरा कर पाया| मुझे अकेले होने के चलते बहुत बार गलत ख़यालात आये लेकिन आपने उन पलों में जो महसूस किया और जिस तरह से मेरी हिम्मत बढाई, उसका क़र्ज़ तो मैं कभी नहीं चुका पाउँगा| हाँ, इतना जरूर कहना चाहूंगा कि हम इन चीजों से पूरी तौर से परे तो नहीं रह सकते लेकिन किसी ऐसे शख्स को जरूर तलाशें जिससे बात करके आपको सही रास्ता दिखे|"
अपने गले में पड़ी एक माला उतार कर उसने उनको पहना दी और उनके गले लग गया| उसका हरा कुरता उनके सफ़ेद शर्ट से मिलकर केशरिया रंग का दिखने लगा था|

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