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Monday, January 25, 2016

सफाई--

खर्र खर्र की आवाज़ से पता चल गया कि रग्घू काका झाड़ू लगाने आ गए हैं, चाहे कुछ भी जाए उनका नियम नहीं टूटता। कितने ही सालों से, शायद कई पीढ़ियों से उनका खानदान इसी काम से जुड़ा है, खुद को गन्दा करके भी पूरे मोहल्ले को साफ़ करना। झाड़ू लगाना, कचरा साफ़ करना और उसके बाद लोगों के बजबजाते नाबदान इत्यादि साफ़ करना। और साथ साथ वो भी काम करना जिसे करने की सोच रखना भी लोग सोच नहीं पाते।
कुछ दिन पहले का दृश्य उसे याद आ गया जब हाथ में कचरे का डब्बा लेकर वो बाहर निकला था और उसकी नज़र झाड़ू लगाते काका पर पड़ी थी। बड़ी तल्लीनता से वो झुक कर झाड़ू लगा रहे थे, उनका चेहरा धूल से अटा पड़ा था और रह रह कर खाँस रहे थे। तभी सामने के घर से कचरे से भरा एक पोलीथीन किसी ने फेंका जो उनके सामने गिर कर फ़ट गया। पूरा कचरा सड़क पर बिखर गया लेकिन काका ने झुक कर अपने हाथों से उसे बटोरना शुरू कर दिया। अपने हाथों से इतना गन्दा कचरा उठाते देखकर उसे बेहद अफ़सोस हो रहा था और उसे खुद कचरा लेकर आने पर शर्म आने लगी थी।
हाथ में चाय का प्याला और दो जोड़ी दस्ताने लिए वो काका की तरफ बढ़ा और उनके हाथ में दस्ताने पहना दिया| काका इस अप्रत्याशित उपहार को पाकर जड़ हो गए, उसने उनको चबूतरे पर बिठाया और चाय की प्याली पकड़ा दी| भरी आँखों से काका चाय पी रहे थे औए उसे लग रहा था जैसे उसने अपने आप की थोड़ी सफाई कर ली है|

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