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Wednesday, January 6, 2016

समय के साथी--

बहुत कुछ बरस रहा था उनके मन में , शायद बाहर बरसते सावन से भी ज्यादा । लोग कुछ कर तो सकते नहीं , पर ऊँगली जरूर उठा सकते हैं । पिछला ३० वर्ष उनकी आँखों से गुजर गया । बच्चे छोटे थे तभी उनकी माँ गुजर गयी थी लेकिन दूसरी शादी नहीं की उन्होंने कि पता नहीं कैसा व्यवहार करे इन बच्चों के साथ । समय के साथ वो बड़े हुए और एक एक करके विदेश निकल गए । छोड़ गए उनको यहाँ विधवा शांता बाई की देख रेख में जो उनके लिए सब कुछ करती ।
कुछ ही महीनों पहले शांता बाई को भी बच्चों ने निकाल फेंका घर से , तब से वो यहीं रहने लगी । लेकिन लोगों की जबान का क्या , जितने मुँह , उतनी बातें । फोन पर बेटा भी कई बार इशारा कर चुका था कि लोग क्या कह रहे हैं , लेकिन उन्होंने टाल दिया था ।
आज जब बेटे ने फिर से फोन पर कहा कि उसे घर में क्यों रखा है तो उनके सब्र का बांध टूट गया । बेटे को तो उन्होंने अच्छे से समझा दिया कि अगर वो यहाँ नहीं रह सकता तो यहाँ की फिक्र भी ना करे । और ये तंय कर लिया कि , उसे छाँव जरूर देना है जिसने उनके सुःख दुःख में साथ दिया है ।

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