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Thursday, January 14, 2016

एक ही मंज़िल--

आज फिर से वही दोराहा सामने था, वक़्त ने फिर से ३० साल पहले की हालात में ला खड़ा किया था। पिता चाहते थे कि वो उनकी तरह एक सुरक्षित सरकारी नौकरी करे लेकिन उसकी महत्वाकांक्षा कुछ अलग और अपने दम पर करने की थी। पिता की नाराज़गी को दरकिनार कर दूर इस शहर में अपना व्यवसाय शुरू किया उसने और धीरे धीरे सफलता के सोपान चढ़ता हुआ एक बेहद सफल व्यवसायी बन बैठा।
लेकिन एकलौते बेटे की जिद ने, कि वो गाँवों में किसानो के बीच जाकर काम करना चाहता है, उसे धर्मसंकट में डाल दिया था। बहुत कोशिश की थी उसे समझाने की, लेकिन वो भी उसी का बेटा था, कैसा सुनता। बहुत आत्ममंथन के बाद उसने बेटे को बुलाया और बोला " एक ही शर्त पर सहमति दे सकता हूँ, तुमको मुझे भी इस काम में अपना भागीदार बनाना पड़ेगा", और फिर अपने वकील को फोन करके बोला " एक ट्रस्ट बनाना है किसानों के लिए, जल्दी से कागज़ात तैयार करिये।"
अब उसे दोनों रास्ते एक ही मंज़िल को जाते दिख रहे थे।

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