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Friday, January 29, 2016

ग़लतफ़हमी--

" अरे, बहुत दिन बाद दिखे आप, कहाँ गायब थे". कहते हुए वो बिलकुल पास खड़ी हो गयी| इस अप्रत्याशित घटना से वो चौंक गया और उस धुंधलके में उसको गौर से देखने लगा|
" अच्छा छोड़िये ये सब, चलिए चाय पीते हैं और फिर आप मुझे घर तक छोड़ दीजियेगा", थोड़ा और हैरान हो गया वो| बहुत कोशिशों के बाद भी पहचान नहीं पा रहा था लेकिन उस आग्रह को वो टाल भी नहीं पाया और बस स्टॉप से सामने की चाय की दुकान पर चल पड़ा| उसने उसका हाथ भी पकड़ रखा था जो उसे अजीब लगते हुए भी अच्छा लग रहा था|
" मैं पहचान नहीं पा रहा हूँ आपको, कहाँ मिले थे आपसे !", उसका प्रश्न अधूरा ही था कि वो दुकान पर बैठ कर अपना कपडा ठीक करने लगी|
" देखिये, मैं कभी नहीं मिली हूँ आपसे, लेकिन इस वक़्त आपके साथ की बहुत जरुरत है मुझे| मैं आपको सब कुछ बता दूंगी, बस थोड़ी देर और"| चाय पीते हुए वो बार बार सामने देख रही थी जहाँ किसी की परछाईं जैसी दिख रही थी उसको|
" वो सामने जो एक परछाईं दिख रही है आपको, वो मेरा मंगेतर है| मैं एक ऑफिस में काम करती हूँ और उसको कुछ दिनों से मुझपर शक हो गया है कि मेरा किसी और से अफेयर है| मैंने बहुत कोशिश की उसको समझाने की लेकिन वो समझ ही नहीं रहा है, बहुत अच्छी पोस्ट पर है तो घर वाले इस शादी को किसी भी हालत में तोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं| ऐसी स्थिति में मुझे आपकी मदद लेनी पड़ी, अब शायद वो खुद ही शादी तोड़ के मुझे मुक्त कर दे, मैं किसी ऐसे इंसान के साथ जिंदगी नहीं बिता सकती"|
अब उसे सब कुछ स्पष्ट हो गया, वो शुक्रिया बोल कर चली गयी| पर उसे खुद पर शर्म आने लगी, उसे भी तो थोड़ी देर पहले ग़लतफ़हमी हो गयी थी|

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